श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 614, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५५८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
महिमातिशयस्तस्य तद्भावा भाव्यशेषकम् । अगोचरं च सर्वेषां ध्यायमानोऽनुपश्यति ॥२०८॥ वेद हि तं गुहायां योऽविद्याग्रंथिं भिनत्त्यसः । कृपया वृणुते ब्रह्म यं कश्चित् सुमधस्करम् ॥२०९॥ तेनैव लभ्यतं साक्षान्नान्यथा यत्नतोऽपि हि । अथवा य परब्रह्म प्राप्तुमिच्छेन्न भावकः ॥२१०॥ तेनैव हेतुना लभ्यो नान्यथा साधनान्तरैः । दलहीनादिर्भानेदं लभ्यते तैस्तु लभ्यते ॥२११॥ मन्थामयोगतः सत्त्वं शुद्धं येषां विचारतः । ते परान्तेन कालेन परिमुच्यन्ति नान्यथा ॥२१२॥ यथा नद्यः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपतः । तथा विद्वान्कलावैद्यप्रतिष्ठाणं च भक्ष्यम् ॥२१३॥ प्रारब्धकर्मणां साक्षान्मोक्षमप्युपतेभवेत् । यो वेद परं ब्रह्म स ब्रह्म भवतीति च ॥२१४॥ सर्वं ममुदितं दृश्यानन्दामत्रकाचदूषणम् । पूर्णमदः पूर्णामिदं काण्डकाया सनातनः ॥२१५॥ आदिमध्यावसानेषु पूर्णं ब्रह्मव निश्चितम् । पूर्णं पराक्षरूपेण ज्ञातं तत्पदमक्षिरम् ॥२१६॥ प्रत्यक्षं त्वपदारूप्येन स्थितं भूतमयेषु च । पूर्णातिरूपज्ञान्पूर्णं सोपाधिकमिहोच्यते ॥२१७॥ सम्पूर्ण शाखग्राम्दृष्ट्यां स्वाविद्यानाशतः स्वयम् । प्रत्यग्दण्डमय लक्ष्यावाशेषविशद्रिग ॥२१८॥ विगतापाधिकं सर्वं पूर्णमेवावशिष्यते । तद्रामं परमं ब्रह्म योगिध्येयं सनातनम् ॥२१९॥ सर्वधर्मानवेधंन श्रुतिगान परात्परम् । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥२२०॥ मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव २२१ इत्याह भगवान् साक्षाद्वेदाव तज्जलानांते । एवं मयामु श्रुतिषु स्मृत्यादिषु यदीरितम् ॥२२२॥
लय सा हो जायगा क्योंकि समस्त विश्व उसका स्वरूप है ... कि जैसे धनुर्धारी एक लक्ष्य-फोड़ धनुषसे लक्ष्य बंधना सीखता है। उसीतरह व ध र-२... ब्रह्मके लिए आत्मसमर्पण करना सुगम ॥ २०७ ॥ उस ब्रह्मकी बड़ी महिमा है। उसका जन्म बहुत दूर सकता है। वह सबसे छुपा हुआ है, किन्तु ध्यान द्वारा देखा भी जा सकता है॥ २०८ ॥ जो प्राणी हृदयके उस बन्द हुए ब्रह्मको जान लेता है, वह अविद्याका कठिन पाश काट... सा है। वही प्राणी इन सबनाम उसे साक्षात् उस प्राण... प्राप्त हो सकता। इसके अतिरिक्त जिस किसी भी साधन द्वारा ईश्वरको प्राप्त करनेका अभिलाषी प्रयत्नपूर्वक साधनासे ही वह प्राप्त हो सकता है अन्यथा कदापि नहीं ॥ ... प्राप्त कर सकता। बहुधा, उद्धारका हित सकता है, विचार द्वारा जिसका चित्त एवं पवित्र व शुद्ध हो जाता है, वे सब लोग महापदको प्राप्त होकर कल्पके अन्तमें मुक्त होते हैं ... । जिस तरह कि नदियाँ नाम और रूपके साथ अन्तमें समुद्रमें जाकर मिल जाती हैं उसी प्रकार कलाके मोहका त्याग तथा कलाकी प्रतिष्ठामें लीन हो जाता है ॥ २१३ ॥ वह अपने प्रारब्ध कर्मोंके भोगनेके पश्चात् ऐसा प्राप्त होता है कि जो उस परब्रह्मको जानता है वह साक्षात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २१४ ॥ ... संसार बना है, वह सब ही चिदानन्दरूप ब्रह्म ही है। काण्डक श्रुति भी संसारके लिए इस प्रकार कहा गया है कि बस, वह ही पूर्ण है बाकी सब अपूर्ण है ॥ २१५ ॥ आदि, मध्य और अन्तमें सब पूर्ण ही पूर्ण है वह निर्विकल्प है पराक्षर रूप भी वही पूर्ण माना जा चुका है। २१६ ॥ वह प्रत्यक्षमें सब प्राणमयमें रहता है। इस पूर्णके निरूपणसे वह सोपाधि कहा जाता है ॥ २१७ ॥ वह शास्त्र और शाखा इन भारोंसे स्वयं अपनी अविद्यानावका नाश करता हुआ उपनिषद्की आलोक आधारपर सब काम करता है ॥ २१८ ॥ जबकि उसकी उपाधि नष्ट हो जाती है तो वह पूर्णरूपसे शेष होकर अकेला रह जाता है। जो दुख हरण करनेवाला है, वे योगियोंके ध्येय एकमात्र राम हैं ॥ २१९ ॥ समस्त धर्मोका निर्णय करते हुए श्रुतियों द्वारा भगवान्ने स्वयं यह कहा है कि मैं इस संसारका प्रभव (उत्पन्नकर्ता), और प्रलय (नाशक) हूँ ॥ २२० ॥ हे धनंजय मुझसे परे और कुछ है ही नहीं। यह समस्त विश्व मुझमें उसी तरह पिरोया हुआ है, जैसे धागेमें मणियाँके दाने पिरोये रहते हैं ॥ २२१ ॥ ऐसा भगवान्ने वेदोंमें कहा है। उसी तरह श्रुतियों और स्मृतियोंमें भी कहा है कि परब्रह्म राम जी