भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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६१६आनन्दरामायणे[ सर्गः ६

षडधिक्रांशीतिरेखास्तियंगूर्ध्वं प्रकल्पयेत् । पञ्चाशीति पदानि स्युः पंक्यस्तत्र सर्वतः ।।१९९।।
तत्र षट् षत् पदान्ते स्यादाग्नीध्रिः शिवार्ककः । मन्त्रेणेनेन विधिना चतुःषष्टिरथाः क्रमात् ।।२००।।
तेषु वै पंक्तिकोष्ठेषु लिंगादि रचयेद्भिषक् । कोणेषु त्रिपदश्चन्द्रस्तदादि शृंखला मता ।।२०१।।
ततो वह्नी ततो भद्रं वापी लिंगं क्रमं तृणम् । तत्र प्रथमपंक्तौ तु शृंखला पञ्चपादिका ।।२०२।।
एकादशपदा वह्नी भद्रञ्च षट्पदात्मकः । भद्रमेकपदं वाप्री त्रिषट् कोष्ठैः प्रकल्पयेत् ।।२०३।।
ईशानम्मन्मिते कार्य एवं ते षट्‌संस्थया । भवन्ति वाप्यो दश वा भद्रञ्चपममीप्सितम् ।।२०४।।
द्वितीयपंक्तौ वापी तु त्रयोदशपदा मता । भद्रं तु षट्पदास्पदं ज्ञेयं पूर्वं मयीन्दिनम् । २०५।
अष्टौ लिंगानि वाष्यन्तू सर्वांन्त न०सदिताः । तृतीयायां तुर्यपदं भद्रं ज्ञेयं तु पूर्ववत् ।।२०६।
अष्टौ वाप्यः सत दृगाः क्रमज्ञा स्युः समुद्धृताः । द्वे वाप्यौ वह्नि मन्मन्ते त्रिभिः कोष्ठैस्तु मंस्मृते ।।२०७।।
चतुर्थपंक्तौ वाप्यस्तु पञ्च शक्रं त्रयम् । भद्रं द्विदशकं ज्ञेयं पूर्ववदुद्धरेत् ।।२०८।
चतुर्थपंक्तिपर्यन्तं वाष्यान्ते परिधिर्भवेत् तम्पक्तौ शृंखले न्यूने पर्यैकेकेन वह्नरी ।।२०९।।
द्वभ्यां पदाभ्यां चन्द्रस्तु यथापूर्वं प्रकल्पयेत् । भद्रद्वयं षट्पदं त्वन्यं भद्रं नवात्मके ।।२१०।
त्रयोदशपदैर्वापी मत्र तत्र प्रकल्पयेत् । भद्रयोरूर्ध्वं स्याद्भद्रद्वयं षट्पदं शुभम् ।।२११।
समुन्दानि पदान्येव शृङ्खलार्थे नियोजयेत् । सम्योपरि परिधिस्तत्र बाप्यान्ते परिकल्पयेत् ।।२१२।।
उभयान्तरे वापी त्रयोदशपदाम्मिका ।।२१३।।
भद्रद्वयं षट्पदं शेषं सर्वं यथोदितम् । अन्तिमङ्गन्तः पञ्चपञ्चपदैः पम समुद्धरेत् ।।२१४।।
रक्तं वा निरवणे च श्वेतश्चन्द्रोऽसितर मना । शृंखला हरिता वह्नी पीतं सच्छृङ्खलाद्वयम् ।।२१५।
रक्तं भद्रं सिता वापी लिंगं कृष्णं प्रकल्पितम् । लिङ्गस्कथगताः कोष्ठाः शोभाकोष्ठाः प्रकल्पयेत् २१६।


हे शिष्य अब मै तुझको अथागान्तर बतला रहा हूँ सुनो ॥ १९८ ॥ सीधी और टेढ़ी छियासी-छियासी रेखायें खींच ऐसा करनेपर उत्तर व दक्षिण पचास पचास पदकी एक एक पंक्तियां तैयार होंगी ॥ १९९ ॥ उसमें छ-छः पादके बाद दोनों तरफ परिधि रहेगी। इस रीतिस क्रमशः चार परिधियां बनेंगी उनकी पंक्ति तथा कोष्ठकमे अपनी बुद्धिके अनुसार लिंग आदिकी रचना कर । प्रत्येक कोनेमे तीन-तीन पादका इन्दु बनावे और उसके आदिमें शृंखलाकी रचना करे ॥ २००, २०१ ॥ फिर उसके बाद वह्नी, फिर छः पादकी शृंखला, एक पादका भद्र और अठारह कोष्ठकी वापी का निर्माण कर ॥ २०२ ॥ २०३ ।। उतना ही सबके शिव बनावे। इस प्रकार दस वापिय और दश भद्र बनगे ।। २०४ ।। इस पंक्तिमें तेरह पादका वापी बनेगी, सोलह पादका भद्र बनेगा । बाक़ी सब चीज पहली पंक्तिके समान रहेगा । २०५ । तीसरी पंक्तिम आठ लिंग, दो वापिय और चार पादका एक भद्र रहेगा। बाक़ी सब चीज पूर्ववत् रहेगा ।। २०६, आठ वापि, सात शिव एवं मन्ममे तीन पादकी दो वापी बनेगी । २०७ । चौथी पंक्तिमें चार वापी, सात शङ्कर, बारह भद्र बनेंगी। बाक़ी सब पहली पंक्तिके समान रहेगा ।। २०८ । चौथी परिधिके ऊपर पांचवी परिधिके बाद भी परिधि रहेगा। इस पंक्तिके पूर्व पंक्तिकी अपेक्षा एक कम शृंखला रहेगी और एक पादका वह्नी घटाया जायगी । २०९ । तदनन्तर पहलेकी तरह दो पादोंका चन्द्रमा बनावे । छः छः पादका दो भद्र बनावे । बाकी दो भद्र नौ नौ पदके रहेंगे । २१०।। अपने अपने स्थानपर तरह-तरह पादकी वापी बनावे। दोनों भद्र के ऊपर छः छः पादके दो भद्र बनाव ॥ २११ ॥ शृंखलाके लिये बने पादोंको नियुक्त करे । उनके ऊपर पाँच पादके अनन्तर परिधिकी रचना करे । २१२॥ उन दोनोंके बीच तेरह पादका एक वापी बनायी जायगी ।। २१३।। छः पादके बाद दो भद्र बनावे । बाक़ी सब पूर्ववत् रक्खे । अन्तिम पंक्तिम पाँच-पाँच पदके कमल बनावे । उसका वर्ण लाल अथवा बहुरंगा रहे । चन्द्रमा सफेद और शृङ्खला काल वर्णाका रहेगी। इसी प्रकार उलटी हुयी, उसकी दोनों शृङ्खलायें पीली, लाल भद्र, सफेद वापी और काला लिंग रहेगा। लिंगके स्थानगतके कोष्ठक या भाके लिये रहेंगे ॥ २१४-२१६॥