भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ५ ] मनोहरकाण्डम् ५२७


पदानि शेषभूतानि यत्र क्व च भवन्ति हि । तानि तत्र यथायोग्यं धिया सम्यङ्नियोजयेत् ।२१७॥
यद्वा तुर्यपरिध्यूर्ध्वमेकादशपदारुणम् । परिधि स्यात्तयोर्मध्ये कोणे चन्द्रो यथोदितः ।२१८॥
शृङ्खला दशपादा स्याद्वल्ली स्यादेकविंशतिः । शृङ्खलान्या रुद्रपदा भद्रं त्रिंशत्पदान्मकम् ॥२१९॥
एकषष्टिपदैर्वापी सम्यग्बुद्धया प्रकल्पयेत् । अथवा द्वे पदे चान्ये संयोज्य गिरिशिस्तुषु ।२२०॥
पदेषु रचयेद्बुद्ध्या लिंगानां पंक्तयः क्रमात् । नवसप्तसमीपेचेका शेषं पूर्वं यथोदितम् ।२२१॥
विशेषस्तत्र भद्रेषु षड्लिंगे षोडशात्मकम् । एकलिंगे विंशपदं द्वाभ्यामन्यत्र चाधिकम् ॥२२२ ।
पूर्ववत्सर्वतोभद्र पद्मवर्णास्तु पूर्ववन् । पीतशुक्लरक्तकृष्णा बहिः परिधयः स्मृताः ॥२२३ ।
एतदष्टोत्तरशतं लिंगतोभद्रमीरितम् । प्रकारान्तरमन्यच्च शृणु शिष्य ब्रवीमि यत् ॥२२४ ।
तिर्यगूर्ध्वं गता रेखा नवाशीतिद्दिजाः स्मृताः । तत्कोष्ठैश्चतुर्विधर्नेत्राग्निकोष्ठकं रचयेद्दिजा ॥२२५॥
सर्वतोभद्रक रड्य परित परिधिर्मतः । ततो रसरमानि स्युश्चतष्परिधयः शुभाः ॥२२६।
तत्र चतुर्षु पार्श्वेषु कोणेषुद्वित्रिपदः स्मृतः । शृङ्खला पञ्चभिर्वल्ली त्वेकादशपदा मता ॥२२७॥
लिंगं चतुर्विंशपदं वापी त्वष्टादशा भवेत् । नव सप्त तथा पंचयुगनेत्रमिताः शिवाः ॥२२८।
पञ्चपंक्तय एव स्युर्वापिकैकाधिका ततः । तुर्यलिंगानि द्वे वाप्यौ त्रयोदशपदान्मिके ॥२२९ ।
षडर्काकैरमरसभद्रसंख्या क्रमाद्भवेत् । सर्वतोभद्रके वापी युगनेत्रमिता तथा ॥२३०॥
नरुकोष्ठमितं भद्रं शेषं सर्वं तु पूर्ववत् । ततोऽन्तःपरिधिः कार्यस्तत्र पद्म समुद्धरेत् ॥२३१ ।
श्वेतोऽब्जः शृङ्खला कृष्णा नीला बह्निकिशाऽरुणा । भद्रं वापि सिता कृष्ण लिंग परिधयोऽन्तिमाः २३२.।
पीतशुक्लरक्तकृष्णा ज्ञेयाः पीतश्च मध्यमाः । एतदष्टोत्तरशतं लिंगतोभद्रमीरितम् ॥२३३॥


इनमें जहाँ कोई कोष्ठक बाकी बच जाय, उसे अपनी इच्छासे जिस रंगसे चाहे रंग दे ॥ २१७ । अथवा चौथी परिधिके ऊपर ग्यारहवें पदके आगे एक परिधि बनाये । उसके बीचवाले कोणमें उस प्रकारसे चंद्रमा बनाये ॥ २१८ ॥ इसमें पहली शृङ्खला दस तथा दूसरी ग्यारह पादकी बनेगी और भद्र तीस पादका रहेगा ॥ २१९ ॥ एकसठ पादकी बापी बनेगी । उन सबको अच्छी तरह मन लगाकर बनावे । अथवा और दो पादोंकी योजना करके सातवें और दसवें पादमें अपनी बुद्धिसे लिंगोंकी रचना करे । नौ, आठ, छः, तीन और एक यह उनकी संख्या रहेगी । बाकी सब पूर्ववत् रहेगा ॥ २२० ॥ २२१ ॥ इन भद्रमम छः लिंगवाले भद्रमें एक सोलह पादका और दूसरा बीस पादका लिंग रहेगा। इसमे अधिक लिंगवाले भद्रमें पूर्ववत् सर्वतोभद्रकी रचना होगी । इसके बाहरकी परिधियाँ पीत, रक्त तथा कृष्ण वर्णकी रहेंगी ॥ २२२ ॥ २२३ ॥ यह मैने तुम्हे अष्टोत्तरशत लिंगतोभद्रका प्रकार बतलाया । अब दूसरा प्रकार बतलाता हूँ सुनो ॥ २२४ ॥ खडी और बेड़ा कुल नवासी रेखाएँ खींचे । उसके आनेवाले चार, दो तीन कोष्ठकोंसे सुन्दर सर्वतोभद्र बनावे । उसके चारों ओर परिधि रक्खे । इसके अनन्तर छ, छः पादोंके बाद परिधियोंकी रचना करे ॥ २२५ ॥ २२६ ॥ उसके चारों तरफके कोनोंमें तीन-तीन पादक चन्द्रमा बनावे । पाँच पादसे शृङ्खला और ग्यारह पादकी बल्ली बनावे ॥२२७॥ चौबीस पादका लिंग और अट्ठारह पादकी वापी बनानी होगी । इसमें नौ, सात, पाँच, चार, दो क्रमशः शिव बनाये जायेंगे ॥ २२८ ॥ इसमें कुल पाँच पंक्तियाँ रहेंगी और वापियोंकी संख्या एक-एक करके बढ़ती जाएगी । इसमें चार लिंग और तेरह-तेरह पादकी दो वापियाँ रहेंगी । २२९ ॥ छः, नौ, बारह, छः, छः, इस क्रमसे भद्रकी संख्या रहेगी । सर्वतोभद्रमे चार और दो वापी बनेंगी ॥ २३० ॥ इनम नौ कोष्ठकका भद्र बनेगा । बाकी सब बात पहलेके समान रहेगी । इस प्रकार भद्रकी रचना कर लेनेके बाद उसके भीतर परिधि बनाकर कमलकी रचना करे ॥ २३१ ॥ कमलका रंग सफेद रहेगा और उसकी शृङ्खला काली रहेगी । बल्लरियाँ नीली तथा भद्र लाल रहेगा । बापी सफेद लिंग काला और अन्तिम परिधियाँ पीला, सफेद, लाल तथा कृष्ण वर्णकी रहेंगी । यह भी एक प्रकारका अष्टोत्तरशत लिंगतोभद्र बतलाया ॥ २३२ ॥ २३३ ॥ अथवा