भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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६१८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

निर्यगूर्ध्वं पञ्च पञ्च रेखाः कार्या सुलोहिताः । सन्कोष्ठेषु परिधयः षट् षडन्ते त्रयः स्मृताः । २३४॥ त्रिद्वयङ्खलिंगरचना चतुर्विंशतिपादिका । वापी त्रिंशद्द्वादशपदा षट्त्रिशद्द्विदशाङ्ककम् ॥२३५॥ भद्रं भद्रं पीतमन्यद्भद्रपार्श्वे प्रकल्पयेत् । प्रथमं नवपादं स्याद्द्वितीयं षट्पदान्वकम् ॥२३६॥ वापीपार्श्वे च त्रिपदा श्रृंखला लोहिता भवेत् । प्रतिपार्श्वे भवेदेतरङ्गला पञ्चपादिका ॥२३७॥ एकादशपदा वल्ली त्रिपदश्चन्द्र ईरितः चतुर्विंशपदेनैव लिंगं परमसुन्दरम् । २३८॥ मध्ये चन्द्रः शृंखला च त्रिपदा षट्पदा लता । भद्रमर्कपदं लिंगमष्टाविंशत्पदामकम् , लिंगमस्तकपार्श्वस्थे पदानि पीतकानि तु ॥२३९॥ लिंगं कृष्णं सिता वापी भद्रं रक्त सितं शशी शृंखला कृष्णहरिता वल्ली वणास्त्वेवंविगर्हिताः॥२४०॥ परिधिः पीतवर्णः स्यात्पदान्यङ्गानि तु यथेष्ट रञ्जयेदेतद्द्वाचां शिलिंगसाधनम् । २४१॥ पीतशुक्लरक्तकृष्णा बाह्याः परिधयः क्रमात् । प्रकारान्तरमन्यद्वा शृणु शिष्य ब्रवीम्यहम् । २४२॥ चन्द्राद्विपदसंख्यासु भवेत्तत्पञ्चगभितम् लिंगंषट् त्रिग्नयेन्पडने परिघ्री मतौ । २४३। तयोर्ध्वाग्लिंगपंक्तिद्वयं सम्यक् प्रकल्पयेत् । अष्टादशपदं लिंगं वापी त्रिदशपादिका । २४४॥ त्रिपदोऽब्जः श्रृंखला च पञ्चपादेञ्चवल्लरी । प्रथमा युगलिंगान्या पंक्तिर्लिङ्गद्वयान्विता ॥२४५॥ अष्टा भद्रं नवपदं परं भद्रं तु षट्पदम् । परिध्यन्ते त्रयस्त्रिंशत्कोष्ठैर्लिङ्गं प्रकल्पयेत् । २४६॥ मूलस्कन्धौ सप्तसप्तपदज्ञौ षट्पदैः शिरः । पंचपंचपदैः पार्श्वों कटि. शुभोन्त्रिपादतः । २५७॥ चतुर्दिक्षु ङ्गस्त्यस्य चतुर्भद्रं नवाधिकम् । चंद्रोऽत्र त्रिपदो ज्ञेयः शृंखला द्विपदा स्मृत । २४८। वल्लरी पंचपादा स्याच्छृङ्खलाऽन्या त्रिपादतः । लिंगस्कन्धगताः कोष्ठाः पीताः कार्याः शुभावहाः २४९॥


सीधी और तिरछी लाल वर्णकी पांच-पांच रेखायें खींच। उसके कोष्ठकोंमें छः परिधियां और छः परिधिके आगे फिर तीन परिधि बनावे । २३४ । चौबास पदम तंत्र, दो अथवा नौ लिंग बनाना होगा । बहत्तरह पादकी वापी बनेगी। छत्तीस, बीस, नौ इन संख्याकेके भद्र बनावे ।। २३५ ।। उन भद्रोंके पास ही दूसरे पीत वर्णके दो भद्रोंकी रचना करे। जिसमें पहला नौ पादका और दूसरा छः पादका रहेगा ।। २३६ । वापीके पास तीन पादकी लाल श्रृंखला रहेगी। इस प्रकार हर एकमम पांच-पाँच पादका श्रृंखलाय रहेगी ॥ २३७ । इसमें ग्यारह पादकी वल्लरी और तीन पादकी लता रहेगी। बारहपादका सित चन्द्रमा । २३८ ॥ मध्यमे एक चन्द्रमा, तीन पादकी शृंखला और छ पादकी लता रहेगी । बारह पादका भद्र और अठ्ठाइस पादका लिंग बनेगा । लिंगके मस्तकपर तथा बगलम पीले वर्णके कुछ खाली कोष्ठक भी रहेंगे ॥ २३९ ॥ इसमें लिंग कृष्ण, वापी उज्ज्वल, लाल भद्र, उज्ज्वल चन्द्रमा काली शृंखला, हरित वर्णकी वल्लरी ये वर्ण रहेंगे । २४० ॥ इसकी परिधि पीत वर्णकी रहेगी। बाकी जितने कोष्ठक बचे, उनका अपने इच्छानुसार जैसा चाहे वैसा रङ्ग दे। पच्चीस लिंग इस भद्रके प्रधान साधन माने गये हैं । २४१ । बाहरका परिधियाँ पीला सफेद लाल तथा काली रहेगी हे शिष्य ! अब मैं तुम्हें इसी भद्रका प्रकारान्तर बतला रहा हूँ । २४२ । एकचालिस वादोंमे पच्चीस लिङ्ग और छः लिगके बाद दो परिधि बनावे ॥ २४३ ।। उन दोनो परिधियांके पहले दो पंक्तियोंमे लिङ्गोंकी रचना करे। इसमें अठारह पादका लिंग बनेगा और बारह पादकी वापी बनायी जायगी ॥ २४४ तीन पादका कमल और पाँच-पाँच पादके शिव तथा वल्लरीकी रचना की जाएगी। पहिली पंक्तिमें चार और अन्य पंक्तियोंम दो लिंग रहा करेंगे । २४५ ॥ पहला भद्र नौ पादका रहेगा । बाकी सब भद्र छः छः पादके रहेंगे । परिधिके बाद तैंतीस पादका लिंग बनावे । २४६ ॥ इसके मूल स्कन्ध सात सात पादके रहेंगे। छः पादका मस्तक, पांच पांच पादका पार्श्वभाग और तीन पादकी कटि बनेगी ।। २४७ ।। शिवके चारो ओर नौ-नौ पादके चार भद्र बनाये जायेंगे। इसमें चन्द्रमा तीन पादका, शृंखला दो पादकी, वल्लरी पाँच पादकी और दूसरी शृंखला तीन पादकी रहेगी । लिंगके स्कन्धवाले ख ती कोष्ठके पीले रङ्गसे रङ्ग दिये