श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 635, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ५] मनोहरकाण्डम् १९९
अन्यानि शेषभूतानि पदानि पूरयेद्धिया । यथेच्छं वै परिध्रित्य कुर्याद् वेदिमिता बहिः ॥ २५०॥ पञ्चविंशतिसंख्यैस्तैः प्रकारैर्द्वा मयोदितौ । अतिप्रियौ शङ्कराय शान्तयो द्विजसत्तम ! ॥२५१॥ नमस्कृत्य महद्वक्ष गुरुपादारविन्दयोः संसारात्मकं वक्ष्ये कथामध्यात्मसङ्ग्रहाम् ॥२५२॥ पञ्चविंशतिसंख्याक लिङ्गतोभद्रमीरितम् । केनांचित् कल्पितं तन्किं तन्च वक्तुमुच्यते स्फुटम् २५३॥ लिङ्गतोभद्रमित्येतस्मिकन्नपर्थेऽद्भवेत् । लिङ्गं गमकमिथ्याहुर्ज्ञानं ज्ञापकमित्यपि ॥२५४॥ पीयूषवापनाद्वार्वी भद्रं भद्रमभीप्सताम् । माध्यशब्दाः प्रसिद्धा हि वर्तन्ते साधनेष्वपि । २५५॥ तस्मिन् शुक्लमुखं नीलमित्यादिश्रुतिसम्मतात् । कूर्चा अपि परिभ्रम्यमाणार्थे भवन्ति हि ॥ २५६॥ सङ्कल परम् लिङ्गं मङ्गलं भद्रवाचकम् । मङ्गलं मङ्गलानां च शिवं शान्तमिति स्फुटम् ॥२५७॥ लीयते यत्र भूतानि निगच्छन्ति यतः पुनः । तेन लिङ्गं परं व्योम निष्कलः परमः शिवः ॥२५८॥ सत्त्वं रजस्तमोवर्णत्रय मायामु दीरितम् । मनश्चन्द्रो महामोहः शृङ्खला स्नेहवल्लिका ॥ ५९॥ तैरिदं सर्वतरङ्गैश्च वेष्टितं घटव्योमवत् । तिर्यगूर्ध्वमहङ्कारः प्रसूतः पञ्चतन्तुवन् । २६०॥ तेन स्थानानि जातानि लक्षाणां चतुरशीति । गुणास्तेषु प्रपूर्यन्ते यथा चित्रपटो भवेत् ॥२६१॥ आसीदेकं पुरा तत्त्वं तस्मिन्कामाविनियोगतः । कामो बहुधा भवति भवेयमिति सादरम् ॥२६२॥ एकः सन्निभि चान्यान् स्वयमकुरुतेति च । इन्द्रो मायाभिरिति च एकधा बहुधेति हि ॥२६३॥ ऊनूश्च श्रुतयः प्राप्यो ब्रह्मणो भवन प्रति । तज्जनानिति च श्रुत्या न ततोऽस्मि हि क्रिञ्चन ॥२६४॥ यद्यप्येदं तथाप्यस्मिन् स्थितिर्ब्रह्मणो भवेत् । यावदहंकृतो भादनावगम्यर आयतः ॥२६५॥ भिद्योऽहमिति हृद्ग्रन्थो न समस्तस्तदाशयः । रावेने जगद्यंनु याति स्वप्नो निद्रानुगो यथा । २६६॥
भावेंगे ॥ २४८ ॥ २४९ ॥ बाकी जितने कोष्ठ खाली बचें, उन्हें अपने इच्छानुसार रङ्ग दे। बाहरकी ओट स्वच्छ से चार परिघियां बनाये । २५०। ये दोनों प्रकार मैने पच्चीस शिवके बतलाये हैं। हे द्विजसत्तम ! ये दोनों यह शिवके गो परम प्रसन्न करनेवाले हैं ॥ २५१ ॥ अब मै अपने गुरुके महत्पदाश्रयम्प चरणकमलको प्रणाम करके संसारात्मक एक आध्यात्मिक कथा सुनाऊंगा । २५२। किसीने पञ्चविंशति लिङ्गतोभद्र- का रचना क्यों की ? अब उसका स्पष्ट तत्त्व बतलाता हूँ ॥ २५३ ॥ पहले 'लिङ्गतोभद्र' इस शब्दका अर्थ बताते हुए कहते हैं कि लिङ्ग गमक, ज्ञान अथवा ज्ञापक नामसे पुकारा जाता है। २५४ ॥ पीयूष (अमृत) का वपन करनेसे वाणीका वाणी 'भद्र नाम पड़ा है। भद्र यानी कल्याणका समीक्षण करनेसे 'भद्र' का भद्र नाम रक्खा गया है। प्रत्येक मन्त्रनाम उक्त साध्य शब्द बतलाये जाते हैं ॥ २५५ ॥ "तस्मिन् शुक्लमुखं नीलम्" आदि श्रुतियोंके कथनानुसार उपमन्त्रोंके विशेषणोंकी आवश्यकता पडती है ॥ २५६ ॥ वह परतत्त्व ही लिङ्ग एवं मङ्गलमय, वह भद्र शब्दसे अभिहित होता है। मङ्गलका भी मङ्गल करनेवाला शिव अर्थात् शान्त कहलाता है । २५७ ॥ प्रलयके समय जिसमें सब प्राणी लय हों और सृष्टिकालमें उसीमेसे निकल आयें उसीको 'लिङ्ग' कहते हैं। ऐसा कौन है ? वह परम व्योम, कलारहित तथा परम मङ्गलकारी शिव है ॥ २५८॥ सत्त्व, रज और तम ये तीन वर्ण मायाके जान्स वेष्टित है। इसमें मन चन्द्रमा, महामोह शृङ्खला और स्नेह वल्लिकायें हैं ॥ २५६। इन सबसे अन्तः इसी तरह वेष्टित है, जैसे व्योम (आकाश) से घट-पट आदि जगत्के पदार्थ वेष्टित रहते हैं। उनपर भी रङ्गके समान अहङ्कारने उसे चारो ओरसे घेर रक्खा है । २६०॥ इसीसे चौरासी लख योनियोंकी उत्पत्ति हुई है। उनमें गुणका उसी तरह समावेश हो जाता है, जैसे एक कपड़ेपर कई रङ्ग बना दिये जायें जिसमें उसका रङ्ग विचित्र प्रकारका हो जाय । २६१॥ सृष्टिके पहले केवल एक तत्त्व वाली वस्तु था। आगे चलकर उससे बहुत प्रकारकी कामनायें उत्पन्न हुई। तब उसे अकेले बहुतसे मायायोगोंसे अपने इच्छानुसार उस अकेले रूपसे बहुतर रूप बना लिये ॥ २६२। २६३ ॥ इसके अनन्तर श्रुतियोंने ब्रह्माकी उत्पत्तिके लिए 'तज्जनान्' इस भूमिसे उस ब्रह्माको प्रार्थना की तब ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई ॥ २६४॥ यद्यपि ये सब कार्य हुए हैं। तथापि मोहवश इसमें ब्रह्मकी स्थिति नहीं हो सकती। जबतक