भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 636, कुल 811 में से

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पृष्ठ 636
६२०आनन्दरामायणे[सर्ग ५

एतदर्थं विरक्तः सन् जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् । आश्रयेत्सद्गुरुं प्राज्ञं सूक्ष्मद्रष्टारं निरामयम् ॥२६७॥
तेन प्रबोधितः सिद्धमात्मानं मन्यतात्मनि । जानीयाद्ब्रह्मभावेन जगत्स्वप्नं स्थितं सदा ॥२६८॥
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे संस्थितोऽमलः । एकोऽद्वितीयः परमो नान्तः प्रज्ञादिलक्षणः ॥२६९॥
अक्षरः सच्चिदानन्दोऽजरोऽमर उत्तमः । निर्विकारो निराकारो निरामय उदीरितः ॥२७०॥
अलिङ्गोऽरूप एवासावेकत्वान्गणनात्परः । मायया लिङ्गरूपीव स्नेह इत्यभिधीयते ॥२७१॥
पुरुषश्च प्रकृतिश्च व्यक्तोऽहंकार एव च । चतुर्लिङ्गानि प्रोक्तानि लक्षणानि शिवस्य च ॥२७२॥
कार्यकारणभूतानामेकमेव हि पञ्चकम् । सत्त्वं रजस्तम इति वसुलिङ्गानि चात्मनः ॥२७३॥
दशेन्द्रियाणि च मनो बुद्धिश्चाद्वादशकं स्मृतम् । लिङ्गानां परमेशस्य विवंचोऽत्र प्रतिष्ठितः ॥२७४॥
इति कारणलिङ्गानि कार्यलिङ्गानपनेकशः । शतं सहस्रमयुतं कोटिशः सति संख्यया ॥२७५॥
सर्वाणि ज्ञापकान्येव शिवस्य परमात्मनः । वस्तुतस्तु परं तत्त्वं सजातीयादिहीनकम् ॥२७६॥
विचारे वर्तमाने तु तन्त्वाद्येव पटादि न । एवं सर्वं शिवो भाति न सर्वं शिव एव हि ॥२७७॥
बिन्दुनादमकारादि मात्रत्रयमुदीरितम् । आत्मेव पञ्चधा साक्षान्नवा ब्रह्मेसरो हरिः ॥२७८॥
विधिर्दुद्रौ एव पञ्च सद्योजातादिरूपकः । शुद्धः साक्षी तथा प्राज्ञस्तैजसो विश्व एव च ॥२७९॥
सच्चित्सुखरूपं नामरूपे ब्रह्मव केवलम् । जातं पञ्चात्मकं नान्यद्ब्रह्मैवेदमिति श्रुतिः ॥२८०॥
प्रधानं महदहं च पञ्चतन्मात्रकं च तत् । अष्टप्रकृतिरित्युक्तंच्छास्त्रेषु परिगीयते ॥२८१॥

बर्हभाव है, तभीतक इस संसारका विस्तार है।२६४। "यह" इस दृष्टिसे भिन्न होते ही न संसार रहता है और न उसका आश्रय ही रह जाता है। तेजके विलीन होने पर जगत्का भी नाश हो जाता है। जैसे कि निद्राका नाश होनेके साथ ही स्वप्न भी नष्ट हो जाता है ॥२६५॥ इसलिये जिज्ञासुको चाहिए कि वह विरक्त साक्षात् ब्रह्मस्वरूप तथा दोष लोभाङ्गरहित किसी सद्गुरुका शरण ले ॥२६७॥ जब कि उनके उपदेशसे वह प्रबुद्ध हो जाय और अपने आत्मारूप ही सिद्ध हो जाय, तब अपने जगत्स्वरूप चित्तको ब्रह्मभावसे देखे ॥२६८॥ सब प्राणियोंके हृदयमें वह अमल ईश्वर निवास करता है। वह एक, अद्वितीय और सर्वश्रेष्ठ है। न उसका अन्त है और न प्रज्ञा आदि लक्षणोंसे ही वह जाना जा सकता है ॥२६९॥ वह अक्षर (कभी नष्ट न होनेवाला), सच्चिदानन्द, अजर, अमर और सबसे श्रेष्ठ विद्वान् है। इसीलिये यह निर्विकार, निराकार और निरामय कहलाता है ॥२७०॥ उसका न कोई रूप है, न लिङ्ग है। यह अकेला रहकर भी गणनासे परे है। वह अपनी मायाके साथ लिङ्गरूपसा दीखता है किन्तु वास्तवमें रहता है अकेला ही ॥२७१॥ पुरुष, प्रकृति, व्यक्त, अहंकार, ये चिह्न उस लिङ्गरूप ब्रह्माको पहचाननेके लिए बताए हैं ॥२७२॥ प्राणियोंके कार्य, कारण, सत्त्व, रज, तम इनको भी कुछ लोग आत्माका लक्षण बताते हैं ॥२७३॥ कुछ लोग दश इन्द्रिय तथा मन और बुद्धि, इन बारहको भी उसके चिह्न बतलाते हैं। इस प्रकार यहाँ उस परमेश्वरके लिङ्गोंका विचार किया गया है ॥२७४॥ ऊपर बतलाये हुए सब चिह्न कार्यके हैं। इनके अतिरिक्त कारणके भी बहुतसे लिङ्ग हैं। इन लिङ्गोंकी संख्या सैकड़ा, हजार, दस हजार एवं करोड़ों पर्यंत है ॥२७५॥ उस मङ्गलमय परमात्माकी तो संसारकी समस्त वस्तुएँ ही ज्ञापक हैं। लेकिन वास्तवमें बड़ा सर्वप्रधान तत्त्व है और उसका कोई सजातीय और विजातीय नहीं है ॥२७६॥ अच्छी तरह विचार हो जानेपर यही निश्चित होता है कि वह केवल तन्तु ही है, पट आदि नहीं ॥२७७॥ जिस तरह बिन्दु-नादसे वह अकारादि मात्रत्रया-त्मक कहा जाता है। उसी तरह वह ब्रह्मा, ईश्वर या हरि अकेला रहता हुआ भी पाँच प्रकारका है ॥२७८॥ सद्योजातादि रूपोंद्वारा विधि (ब्रह्मा) और शिव भी पाँच ही पाँच प्रकारका है। वह स्वयं शुद्ध, साक्षी, प्राज्ञ, तैजस तथा विश्वरूप है ॥२७९॥ नाम और रूपके भेदसे वह सत्, चित् तथा आनन्द तीन प्रकारका है। किन्तु वह अकेला ही है। 'ब्रह्मैवेदम' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है कि वह अकेला ब्रह्म ही पाँच प्रकारका हुआ था ॥२८०॥ प्रधान, महत्, अहङ्कार, पांच तन्मात्रायें और

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