भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 637

सर्गः ५] मनोहरकाण्डम् ५२१

अष्टमूर्त्तिस्वरूपं सद्भुवनादिनामभृत्। स्वस्वरूपस्वरूपेण मायया भाति सर्वतः। २८१॥
ज्योतिर्लिङ्गद्विषट्कं च द्वादशादित्यनामकम्। दशेंद्रियमनोबुद्धिनामभिर्भाति सन् स्फुटम् ॥२८२॥
दशेंद्रियाणि च प्राणपञ्चकं भोग्यपंचकम्। क्षेत्रज्ञतुच्छमात्मैव पंचविंशमतो बुधः ॥२८४॥
लक्षणां चतुरशीति भोगायतनविस्तरः। तस्यैव कल्प्यते भ्रान्त्या कर्मनिर्गुणभेदतः ॥२८५॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिं च भोगस्थानानि चात्मनः। भोगो भोक्ता भोजयिता सर्वं ब्रह्मैव न पृथक् ॥२८६॥
अध्यात्ममधिदैवं च अधिभूतमिति त्रिधा। स्थूलं सूक्ष्मं कारणं च सर्वं ब्रह्मैव न पृथक् ॥२८७॥
एतज्ज्ञानं च ध्यानं च त्रिवेकश्च विरागिता। जीवेश्वरजगद्ज्ञानमात्मैवेति न तु पृथक् ॥२८८॥
सर्वं खल्विदमिति चेदं सर्वं यदयमात्मता। ब्रह्मैवेदं सर्वमिति श्रुतयः प्रवदंति हि ॥२८९॥
अयं सिद्धस्य विषयो यन्मर्त्यान्मनि दर्शनम्। आरुरुक्षुः शांतशमन्वितस्तुः सर्वतो भवेत् ॥२९०॥
स्वदेशे प्राप्तपुरुषं निवघ्नंति वशीकृतम्। तैनामो विषयाः प्रोक्ता मुमुक्षुस्तांश्च विवर्जयेत् ॥२९१॥
विविक्तसेवी लघ्वाशीत्यादि आहत वचः। किं बहुकेन विधिना समाप्त शास्त्रहृद्गतम्। २९२॥
दत्तं मे गुरुणा किमप्यजडमानन्दामृतमव्यय
यत्संब्वात् इदं वदाम्यरुमहं न्यंचाशु नष्टं तमः।
आपूर्णं सहसोदितं मह ऋत गभीरमव्याहृतं
येनाच्छादितमिन्दुसूर्यपवन विध विशेषात्मकम् ॥२९३॥
तिर्यगूर्ध्वगता रेखाश्चत्वारिंशत्समाः शुभाः। तासामेकांक्रकोष्ठेषु परिधीं द्वौ प्रकल्पयेत् ॥२९४॥
समाप्ते प्रथमाभ्यास्तु ततो वाणांतकोष्ठके, तन्मध्यं रुद्ररुद्रषु पदष्वष्टादशः पदः ॥२९५॥

आठ प्रकृतियों ये शास्त्रोंने बतलायी गयीं हैं। २८१॥ उन आठों मूर्त्तिका स्वरूप सद्भूवन आदि नामों से विख्यात है और मायावश ये आठ वानुश्रुक नामस भी श्रामिहत हान है ॥ २८२॥ आठ ज्योतिर्लिंग, द्वादश आदित्य, दस इन्द्रियां, मन और बुद्धि इन नामोंसे भी वह विभुम स्पष्ट दिखायी देता है। २८३॥ दस इन्द्रियाँ, पाँच प्राणवायु, भोग्यपंचक और चार प्रकारका चित्त यह सब मिलकर वह पच्चीस प्रकारका माना गया है ॥२८४॥ चौरासी लाख योनियां ही उसके भोगरूपी घरका विस्तार है। भ्रान्तिवश या गुण-कर्मके भेदसे उसमें इन सबका कल्पना की जाती है॥ २८५॥ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति ये आत्माके भोगस्थान हैं। भोग, भोक्ता, भोज्य ये सब वह ब्रह्म ही है और कोई नहीं॥ २८६॥ अध्यात्म, अधिदेव, अधिभूत, स्थूल और सूक्ष्मका कारण एकमात्र ब्रह्म ही है॥२८७॥ यह ज्ञान, ध्यान, विवेक, विरागिता, जीव, ईश्वर, जगत्का भान यह सब वह आत्मा ही है और कोई नहीं ॥ २८८॥ "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" "यदयमात्मा' 'ब्रह्मैवेदम्' ये श्रुतियाँ भी इसी बातकी पुष्टि करती हैं॥ २८९॥ संसारके सब वस्तुओक अपनी आत्मामे देखना, यह विषय सिद्धपुरुषाका है। जो प्राणी सिद्धिके शिखरपर चढ़ना चाहता हो। उसे चाहिये कि वह शान्त, दान्त (इन्द्रियोंका दमन करनेवाला) और तितिक्षु बने ॥ २९०॥ अपने देशमे आये हुए पुरुषको ये सांसारिक विषय बाँध लेते हैं। इसीसे इन्हें लोग विषय (विशेषेण विन्वन्तं तिविषयाः। अर्थात् भली-भाँति पकड़ लेनेवाल) कहते हैं। मुमुक्षु प्राणीको चाहिए कि इनका परित्याग कर दे । २९१ । "एकान्त स्थानमे रहे, थोड़ा खाय" इत्यादि बात भगवानने गीतामें स्वयं कही है। यहाँ विशेष विधि विधान बतलानेकी आवश्यकता नहीं है। हृदयमे ज्ञानका प्रकाश होते ही सारे शास्त्र समाप्त हो जाते हैं॥ २९२॥ यदि किसी सद्गुरुने कृपा करके जड़तारहित आनन्दामृतक ज्ञानरूप वस्तु दे दी हो 'वह' 'हृणं सब एक हैं। यह भाव उत्पन्न होनेसे हृदयका अज्ञानान्धकार नष्ट हो गया। एक अनिर्वचनीय प्रकाश और चन्द्रमा-सूर्य तथा पवनपर भी आधिपत्य जमानेवाली गतिसे सहसा यह विश्व आलोकित हो उठा, तब और किसी उपदेशकी आवश्यकता ही क्या है? ॥२९३॥ सीधी और टेढ़ी चालीस रेखायें बराबर-बराबर खींचे। उनके उनतालीस कोष्ठकोंमें दो परिधियें बना दे॥ २९४॥ इस