भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 638, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 638

६२२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

लिंगमेकं खंडवाप्यौ तुर्यतुर्यपदामिके । अष्टकोष्ठात्मकं भद्रं प्रोक्तं पश्चाच्चतुष्टये । २९६ । शृङ्खला द्विपदा चन्द्र स्त्रिपदा वल्लरी तथा । पञ्चाशः स्मृता वल्ल्यो त्रिपञ्चेषु नियोजयेत् । २९७ । द्वितीये त्रिपदश्चन्द्रः शृङ्खला वेदपादिका । वल्ली नवपदा भद्रत्रयं नवपदात्मकम् ॥ २९८ ॥ अष्टादशपदं वाप्योद्वयं पार्श्वे तु शृङ्खले द्विपदे रक्तवर्णे च भद्रं तुर्यपदं हरित् । २९९ । प्रतिपार्श्व भवेदेतत्प्रथमायःसु योजयेत् । प्रतिपार्श्वे चतुर्लिंगं वापोनां पञ्चकं तथा । ३००॥ अष्टादशपदं लिंगं वापी त्रयोदशात्मिका । भद्रं ग्यष्टैर्द्वयं वल्ली रुद्रपदामिका । ३०१॥ शृङ्खला पञ्चभिः पादैःखपदश्चंद्र ईरितः । लिंगोपस्थिता वीथी नीलवल्ल्या नियोजयेत् । ३०२॥ यद्वा रमते परिधि विधाय तदनन्तरम् । त्रिलिंगमेक लिंगं यद्दयोः पक्त्योः प्रकारयेत् । ३०३॥ आदौ चन्द्रकलं भद्र षट्कर्मपदैः स्मृतम् । शृङ्खलापञ्चभिर्वल्ली रुद्रकोष्ठा समीरिता ॥३०४॥ वापीचतुष्टय पूर्व पर वार्णद्वयं स्मृतम् । पूर्ववत्सकलं शेष बाह्याः परिधयः क्रमात् ॥३०५॥ पीतशुक्लरक्तकृष्णा ज्ञेयाः सङ्ख्याधिका शुभाः । एतन्मर्पेन्द्र लिंगाख्यं पीठं सम्यगुदाहृतम् । ३०६ । अथवाऽस्मिंस्त्रिकोष्ठानि वर्धयित्वा क्रमेण तु । पञ्चाते परिधी कार्या तत्रलिंगानि योजयेत् । ३०७॥ प्रथमे त्रीणि लिंगानि द्वितीये चैकमादितम् । चतुर्विशंत्पदैर्लिंग वाप्यष्टादशपादजा । ३०८॥ आदौ वेदमिला वाप्यो द्वे वाप्यो च द्वितीयके । आदौ नवपदं भद्र द्वितीयेऽर्कपदं स्मृतम् । ३०९॥ चंद्रवल्ल्यादिपूर्वोक्तं मध्ये लिंगं प्रकारयेत् । अष्टाविंशतिभिः पादैः शिरः कटिः ॥३१०। अर्कअर्कपदं खंडवाप्यौ द्विपदशृङ्खलाः । पञ्चपादा स्मृता वल्ली त्रिपदा पीतशृङ्खला । ३११॥ अर्कपदेचतुर्दिक्षु मध्ये भद्रचतुष्टयम् । चतस्र त्रिपदः कोणे शिवमस्तक शशंके ॥३१२॥

कोष्ठकोंके बाद पहली परिधि बनाकर बाकी परिधियां पांच पांच कोष्ठकोंके बाद बनावे। उनके बीचमें एक सौ छब्बीस पादोंमेंसे अट्ठारह-अट्ठारह पादका एक एक लिंग बनावे। फिर चार-चार पदकी दो खण्डवापियां बनावे। इसके बाद बगल अष्टकोष्ठात्मक भद्र बनावे ॥ २९६ । २९७ । इसके बाद दो पादकी शृङ्खला एकसे चन्द्रमा और तीन पादकी वल्लरी बनाकर इसके तीन बगलमें पाँच-पाँच पादकी वल्लरियां बनावे ॥ २९७ ॥ दूसरी परिधिमें तीन पादका चन्द्रमा, चार पादकी शृङ्खला, नौ पादकी वल्लरी, नौ-नौ पादके तीन भद्र, तरह पादकी दो वापियें, बंगलमे दो लाल शृङ्खलायें और चार पादमे हरे भद्रकी रचना करे । २९८ ॥ २९९ । यह क्रम प्रत्येक पार्श्वभागमें रहेगा प्रत्येक पार्श्वभागमें चार लिंग होंगे तथा, अट्ठारह पादका लिंग, तेरह पादकी वापी, छै पादका भद्र, बारह पादकी वल्ली, फिर पाँच पादकी वल्लरी और तीन पादका चन्द्रमा बनेगा। लिंगके ऊपरकी वीथी नीली रहेगी और उसके साथ-साथ वल्लरी भी नीली रहेगी ॥ ३०० ॥ ३०१ ॥ ३०२ । अथवा छः कोष्ठकन द्वार परिधि बनाकर तीन लिंग या एक लिंग दोनों पंक्तियोंमे बनावे ॥ ३०३ । पहले सोलह पदका भद्र बनाकर पन्द्रह पादोंकी शृङ्खला और बारह कोष्ठकोंमेंसे पाँच पादकी वल्ली बनावे ॥ ३०४ ॥ पहले चार वापी और फिर द वापियोंकी रचना करे । बाकी सब पूर्ववत् रहेंगे और बाहरकी परिधियां क्रमश पीली, सफेद, लाल और काली रहेगा। यह सप्तन्दुलिंगात्मक पीठ मैने अच्छी तरह बतलाया । ३०५ ॥ ३०६ । अथवा इसी पीठमें दो कोष्ठक और बढ़ाकर छः के बाद दो परिधि बनावे और इस प्रकार लिंगोंकी योजना करे । ३०७ । प्रथम पंक्तिम तीन और दूसरीमें एक लिंग बनावे । इसी पीठमें चौबीस पादका लिंग बनेगा और अट्ठारह पादकी वापी बनेगी । ३०८ ॥ आदिये चार वापियें और दूसरेमे दो वापी रहेगी। आदिम नो पादका भद्र बनेगा और दूसरेमे बारह पादका भद्र बनेगा । चन्द्रमा तथा वल्लरी आदि पूर्वोक्त नियमके अनुसार ही रहेंगे और मध्यमें लिंगकी रचना की जायगी। उसमे अट्ठाइस पाद रहेंगे और चार पादमे शिर तथा कमरकी रचना होगी बारह-बारह पादसे दो खण्डवापियां बनायी जायेगी । दो पादकी शृङ्खलायें बनेंगी । पाँच पादकी वल्ली बनायी जायगी तीन पादसे पीतवर्णकी शृङ्खला बनेगी ॥ ३०९ ॥ ३१० ॥ ३११ । बारह पादसे चारों ओरको शृङ्खला बनेगी।