भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६२५

ऊर्ध्वे भद्रे रविपदे पदैःषड्भिः शिताः । आत्मनोऽभिमुखाः सर्व्वं कार्यं ह्यष्ट शुभावहाः ॥३४८॥
त्रयोदशांघ्रिका वापी तस्यां पश्चिमे स्मृता । पूर्व्वे त्वेका द्वे शकले शेषं सर्वं तु पूर्व्ववत् ॥३४९॥
तिर्य्यग्भद्रे वेदपदे षट्पून्योर्ध्ववल्लरी । दक्षिणोत्तरतश्चापि वापीनां शकलाष्टकम् ॥३५०॥
उभयोर्लिङ्गयोर्माला मा त्रिभर्नेत्रनैः स्मृता । सर्व्वत्र नेत्रे द्वे त्र्ये दक्षिणोत्तरयोस्त्रिभिः ॥
पृथक् चत्वारि भद्राणि अधोभद्रे चतुष्पदे ॥३५१॥
दक्षिणोत्तरदिग्भागे पूर्व्ववन्नृपौ च संनयेत् । उल्लङ्गे मध्ये तु परिधिः पञ्चविंशैर्जलेरुहम् ॥३५२॥
शृङ्खला द्विपदा मध्ये वल्ली षट्पादजा स्मृता । वाप्यः पञ्चपदैर्ज्ञेया भद्रं वेदपदान्मकम् ॥३५३॥
सिता वापी शिवः कृष्णः पद्ममद्रे च लोहिते । तिर्य्यग्भद्रं लिंगपाले परिधी पीतवर्णकौ ॥३५४॥
नेत्रेन्दू धवलौ कृष्णा शृङ्खला हरिता लता । पदत्रयं हि वाप्यूर्ध्वं तथारुचि पूरयेत् ॥३५५॥
पीतशुक्लरक्तकृष्ण बहिः परिवयः स्मृताः । अष्टलिंगात्मकं ज्ञेयं लिंगतोभद्रमुत्तमम् ॥३५६॥
अथवान्यौ द्वौ प्रकारौ प्रोच्येते शृणु तापसि । द्वात्रिंशच्चरणेष्वेवं चतुर्लिङ्गं तथाऽष्टकम् ॥२५७॥
युक्त्या विरचयेत्तत्र विशेषोऽथ निरूप्यते । प्राग लिंगं चतुर्विंशपदमृतेष्टवापिका ॥३५८॥
भद्रं विंशपदं चान्यल्लिंगमष्टादशात्मकम् । भद्र नवपदं शेषं यावदवधि योजयेत् । ३५९॥
रेखास्त्वष्टादश प्रोक्ताश्चतुर्लिंगसमुद्भवे । कोणेष्विन्द्विपदः श्वेतस्त्रिपदः कृष्णशृङ्खला । ३६०॥
वल्ली सप्तपदा नीला भद्रं रक्तं चतुष्पदम् । भद्रपार्श्वे महालिंगं कृष्णमष्टादशैः पदैः ॥३६१॥
शिवपार्श्वे तु वापीं च कुर्य्यात्पञ्चपदां सिताम् । पदमेकं तथा पीतं भद्रं वाप्यस्तु मध्यतः ॥३६२॥
शिरसि शृङ्खला पार्श्वे कुर्य्यात्पीतं पदत्रयम् । लिंगानां स्कन्धतः कोष्ठा विंशत्यो रक्तवर्णकाः । ३६३॥

तीन पादका चन्द्रमा रहेगी और चौद पादकी श्रृंखला बनायी जायगी। बारह पादकी वापी और छः छः पादके छः भद्र बनेंगे ॥ ३४७। ऊपरके दोनों भद्र बारह पादके रहेंगे और अट्ठारह पादके भद्र बनाये जायेंगे। इन सबको अपने अभिमुख बनावे । ३४८ ॥ तेरह पादोंकी कुल वापियाँ रहेंगी। तिसमें पश्चिमकी ओर तीन वापी, पूर्वकी ओर एक वापी तथा दो खण्डवापी बनायी जायगी। शेष सब पूर्ववत् रहेंगे ॥ ३४९ ॥ इसमें बेड़ा भद्र चार पादका और तीन पादकी ऊर्ध्ववल्ली रहेगी। दक्षिण और उत्तरकी ओर खण्डवापियें रहेंगी ॥ ३५० ॥ तीन नेत्रोंसे इन दोनों लिङ्गों की माला बनाया जायगा दक्षिण और उत्तर दो-दो और तीन-तीन पादोंके दो नेत्र बनेंगे। चार भद्र पृथक् बनाये अर्थोंगे और उनमें नीचेवाले दोनों भद्र चार पादके रहेंगे ॥ ३५१ ॥ दक्षिण और उत्तरकी ओर दा वल्लियोंकी योजना की जायगी। तीन पादसे मध्यमे परिधि बनेगी और पच्चीस पादका कमल बनेगा । ३५२ ।। इसमें शृङ्खला दो पादकी और मध्यमें छ पादसे वल्ली बनायी जायगी। पाँच पादकी वापियां बनगी और चार पादका भद्र बनेगा ॥ ३५३ ।। इसकी वापियां सफेद, शिव कृष्ण, पद्म और भद्र रक्तवर्णके रहेंगे। तिरछा भद्र लिङ्ग माला तथा दोनों परिधियां पीत वर्णकी रहेगी ॥ ३५४ ।। नेत्र तथा इन्दु ये दोनों सफेद रहेंगे। शृङ्खला काली और लता हरी रहेगी। वापीके ऊपरवाले तीन पादोंको जैसी अपनी रुचि हो, उस प्रकार रंगकर बनावे ॥ ३५५ ॥ इसके बाहरकी परिधियां क्रमशः पीली, सफेद, लाल तथा काली रहेगी। यह मैंने तुमको अष्टलिङ्गात्मक लिंगतोभद्र बतलाया ॥ ३५६ ।। अब इसके अन्य दो प्रकार बतलाते हैं, उन्हें भी सुन लो । बत्तीस चरणोंसे चार या आठ लिंग युक्तिपूर्वक बनावे। अब उसमें जो विशेषतायें हैं, उन्हें बतलाते हैं। आदिवाली पंक्तिमें चौबीस पादकी अट्ठ रह वापिएं बनगी । ३५७ ।। ३५८ ।। बीस पादका भद्र बनेगा। दूसरा लिंग अट्ठारह पादका बनेगा। नौ पादका भद्र बनेगा। बाकी सब पहलेके समान बनेंगे ॥ ३५९ ।। चतुर्लिङ्गात्मक भद्रमें अट्ठारह रेखायें होंगी। इसमें भी कोणका चन्द्रमा तीन पादका और कृष्ण वर्णकी शृंखला रहेगी । ३६० ।। सात पादसे नील रङ्गकी बल्लरी, चार पादसे रक्त वर्णका भद्र औच भद्रके पास अट्ठारह पादस कृष्ण वर्णका महालिंग बनाय ॥ ३६१ ॥ शिवके पास पाँच पादकी सफेद वापी बनाये ।