भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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६२६आनन्दरामायणे[ सर्गः ५

परिधिः पीतवर्णस्तु पदैः षोडशभिः स्मृतः । पदैस्तु नवभिः पश्चात्पद्मं चित्रं सकर्णिकम् ॥ ३६५॥
तिर्यगूर्ध्वं गता रेखाः कार्याः स्निग्धाम्बुयोद्भव । कोणेन्दुस्त्रिपदः कार्यः श्रृंखला त्रिपदा स्मृता ॥३६६॥
वल्ली च षट्पदा नीला रक्तं भद्रं प्रकस्पयेत् । पदैर्द्वादशभिः स्पष्टमुत्तरे पूर्वदक्षिणे । ३६६॥
पश्चिमायां महारुद्रमष्टत्रिंशत्तिकोष्ठके । लिंगशार्यं तथा मूर्ध्नि षाट् कोष्ठान्त्तु पीतकाः ॥३६७॥
लिंगमेकं तथा गौर्यास्तिलकं प्रोक्तमण्डले । पूजयेन्मण्डले चैव तस्य गौरी प्रसीदति । ३६८॥
प्रागुदीच्यां गता रेखाः कुर्यादेकोनविंशतिः । खण्डेन्दुस्त्रिपदः कोणे शृङ्खला पञ्चभिः पदैः । ३६९॥
एकादशपदा वल्ली भद्रं तु नवभिः पदैः । चतुस्त्रिंशत्पदा वापी परिधिर्विंशकैः पदैः । ३७०॥
मध्यं षोडशभिः कोष्ठैः पद्ममष्टदलं स्मृतम् । श्वेतेन्दुशृंखला कृष्णा वल्ली नीलेन पूरयेत् ॥३७१॥
भद्रारुणं सिता वापी पाते परिधिकर्णिके ।
रक्तं वा चित्रितं पद्मं बाह्याः सत्त्वरजस्तमाः । सर्वतोभद्रकं चेदं कल्प्यं सर्वकर्मसु ॥३७२॥
एवं लिंगतोभद्राणां रचनाः कथिता मया । एताः शिवपरा ज्ञेया न योग्या विष्णुपूजने ॥३७३॥
रामलिंगात्मकं योग्यं श्रीविष्णोर्गौरयस्य च । पूजने त्वेक एवात्र तद्विस्तारेण कथ्यते । ३७४॥
शिवस्य पूजने लिंगमुपाश्यं परिचिंतयेत् । उपासिका राममुद्रा ज्ञेया तद्वद्भवानपि ॥३७५॥
लिंगतोभद्रवच्चात्र समावाद्यातिबुद्धिदः । रामतोभद्रक यच्च ज्ञेयं विष्णुपदं हि तत् । ३७६॥
रमा रामेति वर्णव्यंक्तिह्वितं भद्रकं कृतम् । धिया देवीपरं तच्च ज्ञातव्यं सर्वकर्मसु । ३७७।

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे रामशसविष्णुपूजन-संवादे रामलिंगतोभद्राणां तथा लिंगतोभद्राणां रचनाप्रकारकथनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


एक पादका एक पीला भद्र बनावे। मध्यमें वापी, मस्तकपर शृंखला, बगलमे पीले रंगके तीन बाद और लिङ्ग, स्कन्धमे लाल वर्णके बास कोष्ठक बनावे ॥ ३६२ । ३६३ ॥ सोलह पादोंसे पीत वर्णकी परिधि ओर उसके आगे नौ पादोंसे विविध वर्णकी कर्णिकायुक्त कमल बनावे ॥ ३६४ ॥ तांबी ओर सीधी तरह रेखाये खींचे। कोणम तीन पादका चन्द्रमा बनावे ॥ ३६५ । पीले वर्णसे छः पादकी वल्ली और रक्त वर्णका भद्र बनावे । फिर उत्तर पूर्व दक्षिण तथा पश्चिम कोणमें बारह पादोंसे अट्ठाईस काष्ठकोमे महारुद्रका निर्माण करे। लिङ्गके बगलमें तथा मस्तकके बाठ कोष्ठकोंका पीले रंगसे रखे ॥ ३६६-३६७ ॥ इसके मण्डलम गौरीका लिङ्ग बनावे। जो प्राणी इस मण्डलका पूजन करता है, उसपर गौरी प्रसन्न होता है । ३६८ ॥ पूर्व और उत्तरकी ओर १९ रेखाये खींचे । कोणमें तीन पादका चन्द्रमा बनावे। पाँच पादकी श्रृंखला, ग्यारह पादकी वल्ली और नौ पादं से भद्रकी रचना करे । चौंतीस पादकी वापी और बीस पादकी परिधि बनावे । ३६९ । ३७० ॥ मध्यमे सोलह पादका अष्टदल कमल बनावे । इस भद्रम चन्द्रमा सफेद, श्रृंखला काली, बल्ली नीली, भद्र लाल, वापी सफेद, परिधि पीले वर्णकी, कर्णिका लाल और विविध वर्णका कमल बनावे। बाहिर सत्त्व, रज और तम रहेगा । इस सर्वतोभद्रको सब कामोंमें बनाना चाहिए ॥ ३७१ ॥ ३७२ ॥ यह सब लिङ्गतोभद्रकी रचनाका प्रकार मैने बतलाया है। ये सब शिवकी पूजाम ही काम देगे विष्णुपूजनमें नहीं ॥ ३७३ ॥ विष्णुकी पूजाम श्रीरामलिंगातोभद्रका ही उपयोग करना चाहिए। प्रत्येक पूजनमं एक देवताकी ही प्रधानता रहती है। इसी बातको अब विस्तारपूर्वक बतला रहे हैं ॥ ३७४ ॥ शिवकी पूजामें लिङ्ग उपास्य रहता है। इसलिये उसीका ध्यान करना चाहिए । इसमें उपासिका राममुद्रा है और लिंगतोभद्रके समान ही इसमें भी आवाहन किया जाता है । रामतोभद्र विष्णुपदरक है ॥३७५॥३७६॥ इसम रमा राम ये वर्ण चिह्नित किये हुए रहते हैं। इसलिए कुछ लोग रामतोभद्रको देवीपरक भी कहते हैं । अस्तु, कहनेका भाव यह है कि यह भद्र सब कामोंमें प्रयुक्त किया जा सकता है ॥ ३७७ ॥ इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे बाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥