श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 646, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
भागीरथ्यै नमः भागीरथीमा० ॥ ८२ ॥ रक्तपरिधौ सरस्वत्यै नमः सरस्वत्तीमा० ॥८३ । कृष्णपरिधौ यमुनायै नमः यमुनामा० ॥ ८४ । एवमेव रमारामाभद्रदेवतावाहन कार्यम् । रमारामाभद्रे मुद्रायमेव विशेषः । आदौ रमामावाह्य राममावाहयेत् । एवमावाहनं कृत्वा षोडशोपचारैः पूजयेत् । शेषा- न्नेन दिग्बलिः कार्यः ॥ इति आनन्दरामायणान्तर्गतरामोभद्रदेवतास्थापनविधिः ।
अथ रामनवमीकथा
श्रीरामदास उवाच
शिष्य यद्यत्प्रियं तस्मै रामाय तद्वदाम्यहम् । मासेषु चैत्रमासस्तु राघवस्यातिवल्लभः ॥ १ ॥ पक्षयोः सितपक्षस्तु प्रियोऽस्ति राघवस्य हि सर्वासु तिथिषु श्रेष्ठा नवमी राघवप्रिया ॥ २ ॥ सूर्यवंशसमुद्भूतस्तत्सम्बन्ध भानुवासरः । प्रियोऽतिराघवस्यैव नक्षत्रेषु पुनर्वसुः ॥ ३ ॥ चंपकः पुष्पजातौ हि तुलसी वै तथैव च । अथवा नवकं चापि पुष्पाणां राघवप्रियम् । ४ ॥ जातिश्चंपकमन्दारौ तुलसी मुनिमालती । दमनः केतकी सिह्ली पुष्पाणां नवकं स्मृतम् ॥ ५ ॥ तथा नवविधं चान्नं राघवस्यातिवल्लभम् । मोदको लड्डुको मडो पूणंगर्भश्च फेणिका ॥ ६ ॥ घटकः पर्पटः खाद्यं घृतपक्वं नवं त्विति । एतानि नव भक्ष्याणि राघवस्य प्रियाणि हि ॥ ७ ॥ अथवाऽन्यत्प्रवक्ष्यामि दिव्यान्ननवकं शुभम् । मोदको लड्डुको मडो वटकः फेणिका तथा ॥ ८ ॥ दरान्नमोदनः शाकं पायसं नवकं शुभम् । अन्यच्छृणुष्व भो शिष्य मन्नान्नं राघवप्रियम् ॥ ९ ॥ एकाशीतिकुडवं च गोक्षीरं तण्डुलास्तथा । सपादद्विकुडवांश्च मुद्राय सितुषांस्तथा ॥ १० ॥ कुडवस्त्वेक एवाथ मुक्तेग कुडवा नव । त्रिकुडवं मधु प्रोक्तं घृतं च कुडवद्वयम् ॥ ११ ॥ मरीचं कुडवाष्टांशमितं नारीफलं तथा । कुडवस्त्वेक एवाथ जातीपत्रिमथैत च ॥ १२ ।
यमुनाजीका आवाहन कर ॥ ८१ ॥ बाहरकी लाल परिधिमेंमसे श्वेत परिधिम भागीरथी गंगाजीका
आवाहन करे ॥ ८२ ॥ रक्त परिधिम सरस्वतीजीका आवाहन करे ॥ ८३ ॥ काला परिधिमें यमुनाका आवाहन
कर ॥ ८४ ॥ रमा और रामक अभय भी इसी तरह आवाहन करना चाहिए । रमारामक भद्रकी मुद्रामे ही
विशेषता है । पहले रमाका आवाहन करके रामका आवाहन करना चाहिए । इस तरह आवाहन करके
षोडशोपचारसे पूजन कर और बाकी बचे अन्नसे दिग्बलि दे ॥
इति रामतोभद्रदेवतास्थापनविधिः ।
श्रीरामदासने कहा - हे शिष्य ! रामचन्द्रजीका जो जो वस्तुयें प्रिय हैं, अब उन्हें बतलाता हूँ । सब महीनोंमें चैत्रका महीना रामको प्रिय है ॥ १ ॥ शुक्ल कृष्ण इन दोनों पक्षोंमें रामको शुक्लपक्ष प्रिय है। सब तिथियोंमें नवमी तिथि प्रिय है ॥ २ ॥ सूर्यवंशमें रामका जन्म हुआ था । इसलिये उन्हें रविवार विशेष प्रिय है । सब नक्षत्रोंमें उन्हें पुनर्वसु नक्षत्र प्रिय है । ३ । फूलोंमें चम्पक तथा तुलसी प्रिय हैं । नौ पुष्प रामको विशेष प्रिय हैं ॥४॥ जैसे जूही, चम्पा, मन्दार, तुलसी, वैजयन्ती, मालती, दमनक, केतकी और सिह्ली इन्ही फूलोंको एकत्र करके रामचन्द्रको अर्पित करना चाहिये । ५। उसी तरह नौ प्रकारका अन्न भी भगवान्को प्रिय है। वे नवों ये हैं-मोदक, लडडूुक, मण्ड, पूरनपूड़ी, बटुक, बताशापेड़ी, पापड़, खाजा घीमें बना हुआ पकवान, ये नौ भी भक्ष्य पदार्थ रामचन्द्रजीको प्रिय हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ अब दूसरे नौ प्रकारके खाद्य पदार्थ बतलाते हैं-मोदक, लड्डुक, मड, बटुक, फेणिका, भात, शाक, पर्पट और पायस ये ही नौ वस्तु हैं । हे शिष्य ! अब रामको दूसरे प्रिय अन्न बतलाते हैं ॥ ८ । ९ ॥ एकाशी कुडव गौका दूध, उतना ही चावल, सवा दो कुडव छिलका उतारी हुई मूंग ॥ १० ॥ एक कुडव चीनी तीन कुडव मधु, दो कुडव घी, एक कुडवका अष्टमांश काली मिर्च, एक कुडव नारियलकी गरी, एक कडवका अष्टमांश जावित्री, इनको मिलाकर बनाया हुआ पाक रामचन्द्रजीको प्रिय है । इसलिये लोगोंको चाहिये कि ये पदार्थ बनाकर भगवान्को अर्पण करें ॥ ११ ॥ १२ ॥