भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 645

सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६२९


गौतमाय नमः गौतममावाहयामि ॥४२॥ ईशान्यां भरद्वाजाय नमः भरद्वाजमावाहयामि ॥४३॥ पूर्वे विश्वामित्राय नमः विश्वामित्रमावाहयामि ॥४४॥ आग्नेय्यां कश्यपाय नमः कश्यपमावाहयामि ॥४५॥ दक्षिणे जमदग्नयेनमः जमदग्निमावाहयामि ॥४६॥ नैर्ऋत्यां वसिष्ठाय नमः वसिष्ठमावाह- यामि ॥४७ पश्चिमे अत्रये नमः अत्रिमावाहयामि ॥४८। वायव्यां अरुन्धत्यै नम अरुन्धतीमावा- हयामि ॥४९॥ पुनः पूर्वादििक्रमेण पूर्वे विश्वामित्रसमीपे ऐन्द्यैनमः ऐन्द्रीमावाहयामि ॥५०॥ आग्नेय्यां कौमार्यै नमः कौमारीमावाहयामि ॥५१। दक्षिणे ब्राह्मयै नमः ब्राह्मीमावाहयामि ॥५२॥ नैर्ऋत्यां वाराह्यै नमः वाराहीम० ॥५३। पश्चिमे चामुंडायै नमः चामुंडाम० ॥५४ वायव्ये वैष्णव्यै नमः वैष्णवीमा ॥५५॥ उत्तरे माहेश्वर्यै नमः माहेश्वरीमा० ॥५६। ईशान्य विनायक्यै नमः वैनाय- कीमा० ॥५७॥ अष्टदलमध्ये सूर्याय नमः सूर्यमा० ॥ ५८ ॥ बाह्यपूर्वाद्यष्टदिक्षु यथास्थानेषु पूर्वे सोमाय नमः सोममा० ॥५९॥ आग्नेय्यां भौमाय नमः भौममा० । ६०॥ दक्षिणे बुधाय नमः बुधमा० ॥ ६१ नैर्ऋत्यां बृहस्पतये नमः बृहस्पतिमा० ॥ ६२ ॥ पश्चिमे शुक्राय नमः शुक्रमा० ॥६३। वायव्यां शनैश्चराय नमः शनैश्चरमा० । ६४। उत्तरे राहवे नमः राहुमा० ॥६५॥ ईशान्यां केतवे नमः केतुमा० ॥ ६६। एता देवताः सर्वतोभद्रे प्रतिष्ठाप्य ततः परिधिभूतपंक्तौ सुषेणाय नमः सुषेणमा० ॥६७॥ सर्वेषु लिंगेषु रुद्राय नमः रुद्रमा०। ६८। सर्वासु वापीषु नलाय नमः नलमा० ॥६९॥ सर्वसु भद्रेषु सुग्रीवाय नमः सुग्रीवमा० ॥७०॥ सर्वेषु तिर्यग्भद्रेषु गवयाय नमः गवयमा० ॥७१॥ सर्वासु पीतश्रृंखलासु अंगदाय नमः अंगदमावा० ॥ ७२ ॥ सर्वासु कृष्णश्रृंखलासु विभीषणाय नमः विभीषणमा० ॥७३। सर्वासु वल्लीषु जाम्बवते नमः जाम्बवन्तमा० ।७४॥ सर्वेषु खण्डेषु मैंदाय नमः मैंदमा० ॥ ७५॥ सर्वासु परिधिषु द्विविदाय नमः द्विविदमा० ॥७६॥ मुद्रायां रामजानकीभ्यां नमः रामजानकीमा० ॥७७। मुद्रायाः पश्चिमे पीतपरिधौ लक्ष्मणाय नमः लक्ष्मणमा० ॥७८। मुद्राया उत्तरे भरताय नमः भरतमा० ॥७९॥ मुद्राया दक्षिणे शत्रुघ्नाय नमः शत्रुघ्नमा० ॥८०। मुद्रायाः पुरत वायुपुत्राय नमः वायुपुत्रमा० ॥८१॥ बहिश्चिपरिधिषु श्वेतपरिधौ


समीप अंगुष्ठका आवाहन करे ॥४१॥ तदनन्तर सोमके उत्तर ओर रुद्र के पास गौतमका आवाहन करे ॥४२॥ ईशान कोणमे भरद्वाजका, पूर्वमें विश्वामित्रका, आग्नेयमे कश्यपका, दक्षिणमे जमदग्निका, नैर्ऋत्यमे वसिष्ठका, पश्चिममे अत्रिका और वायव्यकोणमे अरुन्धतीका आवाहन करे ॥४३-४६। फिर पूर्व आदि दिशाओके क्रमसे पूर्वमें विश्वामित्रके समीप ऐन्द्रीका आवाहन करे ॥५०। आग्नेय कोणमें कौमारीका, दक्षिणमे ब्राह्मीका, नैर्ऋत्यमे वाराहीका पश्चिममे चामुण्डाका, वायव्यमे वैष्णवीका, उत्तरमें माहेश्वरीका और ईशान कोणमे वैनायकीका आवाहन करे ॥५१-५७॥ अष्टदलके मध्यमे सूर्यका आवाहन करे, बाहरके पूर्व आदि आठो दिशाओमे यथास्थान निम्नलिखित देवताओका आवाहन करे पूर्वमे सोमका आग्नेय कोणमे भौमका, दक्षिणमे बुधका, नैर्ऋत्यमे बृहस्पतिका, पश्चिममे शुक्रका वायव्यमें शनैश्चरका, उत्तरमें राहुका और ईशान कोणमे केतुका आवाहन करे ॥५८-६६॥ सर्वतोभद्रमें इन देवताओंकी स्थापना करके परिधिभूत पंक्तियामे सुषेणका आवाहन करे ॥ ६७॥ सब लिंगोंमे रुद्रका सब वापियोंमे नलका, सब भद्रोंमे सुग्रीवका, सब तियं भद्रोमें गवयका, सब पीत श्रृंखलाओमें अङ्गदका और सब कृष्ण श्रृंखलाओमें विभीषणका आवाहन करना चाहिए ॥ ६८-७३॥ सब वल्लियोंमें जाम्बवन्तसे जाम्बवान्का आवाहन करे ॥७४॥ उसी प्रकार सब खण्डोंम मैंदका, सब परिधियोंमे द्विविदका, मुद्रामें राम और जानकीका आवाहन करे ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ मुद्राकी पश्चिमवाली पीत परिधिमें लक्ष्मणका आवाहन करे ॥७८॥ मुद्राके उत्तर ओर भरतका आवाहन करे ॥ ७९ ॥ मुद्राके दक्षिण ओर शत्रुघ्नका आवाहन करे ॥ ८० ॥ मुद्राके आगे