भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 656

४१० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

एतस्मिन्नन्तरे वृष्टिर्पीडिता नृपसेवकाः। ग्रामे गेहानि विविशुः सुन्योगेद्ययुर्दश ॥१७२॥
अश्वारूढाः सद्यआस्ते द्वारमध्ये द्विजोत्तमम्। दृष्ट्वा विनिद्रितं प्रोचुर्द्विजोत्तिष्ठ जवेन हि ॥१७३॥
मार्गं देहि वयं दृष्ट्या पीडिताः स्मश्चिरं बहिः। गुल्मभेदैऽत्रस्यास्याम सुसुखाश्वाः ससेवकाः ॥१७४॥
तत्तेषां वचनं श्रुत्वा सभ्रयेण द्विजोऽब्रवीत्। रामचन्द्रः सीतयात्र निद्रितोऽस्ति स्ववंगुभिः ॥१७५॥
न वर्तेतेऽत्र युष्माकं स्थलं मन्यं वचो मम। गच्छध्वं नगरे नानास्थलान्यन्यानि मन्ति हि ॥१७६॥
तस्यस्य वचनं श्रुत्वा राजदूताः पुनद्विजम्। प्रोचुस्ते यद्यस्ति श्रीरामः सोऽपि निर्यातु वै बहिः ॥१७७॥
सीतया बंधुभिर्युक्तैः स्थलं नो देहि भो द्विज। पुनराह द्विजस्तान् स कथं रामं विनिद्रितम् ॥१७८॥
प्रबुद्धं वै करोम्यद्य निशायं राजसेवकाः। युष्म कं प्रार्थना त्वद्य क्रियते वै मया मुहुः ॥१७९॥
प्रणम्य विधिरूय गच्छध्वं वै स्थलांतरम्। ततस्तन्निग्रहं दृष्ट्वा तेऽतिवृष्ट्या प्रपीडिताः ॥१८०॥
तं विप्रं ताडयांबभूवुस्तदा प्राह द्विजोत्तमः। रामं बहिः करोग्यद्य तिष्ठध्वं राजसेवकाः ॥१८१॥
इत्युक्त्वाऽऽश्रम्य श्रीरामं भूसुरो वाक्यमब्रवीत्। रामोत्तिष्ठ बर्हिर्दृष्टाः स्थिताः सन्त्यश्वसंस्थिताः ॥१८२॥
तेषां दस्तु स्थलं देहि वय पाभो बर्हिनिशि। इत्युक्त्वा निजपृष्ठे गानारोहयन्म पूर्ववत् ॥१८३॥
सतः कृत्वा महाराशं वस्त्राटीनां द्विजोत्तमः। घृत्वा कक्षे तोयकुंभं ध्रुत्वा वामकरेण सः ॥१८४॥
यष्टिं धृत्वा सव्यहस्ते शनैर्द्वाराद्बहिर्ययौ। ते द्विजं तादृशं दृष्ट्वा भ्रांतं त मेनिर खलाः ॥१८५॥
ततो दृष्ट्वाऽतिवृष्टिं स गेहाप्राधा बहिर्दिनः। नश्रीमूस्तदा सथ्र्यो गेहे मविविशुः खलाः ॥१८६॥
ततोऽर्धनथमितो विप्रश्चिंतयामास चेतसि। पुराणे वायुपुत्रस्य मया सारं श्रुतं बहु ॥१८७॥
सन्सं तु मृषा तद्य किमन्पत्र प्रयोजनम्। इनि निश्चित्य विप्रः म क्रोधेन महता युतः ॥१८८॥
शीघ्रं घटं भुवि स्थाप्य वामहस्तेन मारुतेः। पुच्छं ध्रुत्वा क्षिपिपक्षमाकाशे वेगवत्तरः ॥१८९॥

इसी समय बरसातसे सताय हुए कुछ राजसेवक ब्राह्मणका घरको खाली समझकर द्वारपर पहुंचे ॥ १७२ ॥ वे समस्त सेवक घोड़पर सवार थे। द्वारपर पहुंचत ही ब्राह्मणको जगाते हुए उन्होंने कहा-हे ब्राह्मण ! जल्दी उठो, मुझ जगह दो। मैं बड़ी देरसे भींग रहा हूँ। इस धूप मग्न में अपने सेवकरे मौर घाड़ोके सत्य रहूंगा ॥ १७३ ॥ १७४ ॥ इस प्रकार उनका बात सुनकर भयदास्रैहक सच ब्राह्मणने कहा कि इस घरमें रामचन्द्रजी अपने बन्धुओंके साथ सो रहे हैं। यहाँ आप लोगक लिए जगह खाली नहीं है। मेरी इस बातको सच मानिएगा। नगरम चले जाइए। वहाँ आप लोगांको बहुत जगहें मिल जायेंगी ॥ १७५ ॥ इस प्रकार ब्राह्मणके वचन सुनकर मिपदूतोंने कहा कि यदि इस वक्त राम हैं तो उन्हे भी बाहर निकाल दो मौर हम लगाको ठहरनेके लिये जगह खाली कर दी। ब्राह्मणन कहा-हे राजसेवक सच कि राम सो रहे हैं तो उन्हें कैसे जगाऊं। मैं आप लोगंसि प्राथना करता हूँ कि दूसरी जगह चले जाइए। इस प्रकार ब्राह्मणका हठ देखकर उन वृष्टिपीडित राजसेवकोंने उसे मारा। ब्राह्मणने कहा-अच्छा, हे राजसेवको। ठहरिए, मैं अभी रामचन्द्रजीको बाहर किये देता हूँ । १७६-१८१ ॥ ऐसा कहकर उसने भाचमन किया और रामके पास जाकर कहा-हे राम ! उठिए। बाहर वे दुष्ट घुड़सवार आए हैं। आप उनको रहनेक लिए यह जगह खाली कर दीजिए, हमलोग रात्रोसत कहा दूसरे स्थानपर चले चले। ऐसा कहकर ब्राह्मणने रोजकी तरह उनको अपनी पीठपर लादा । १८२ ॥ १८३ ॥ इसके बाद उसने वस्त्रोंकी एक बड़ी गठरी बनाकर कांखमे दवाई, पानीका घड़ा बायें हाथमें लिया और दाहिने हाथमे छड़ी लेकर धीरे धीरे बाहर निकला। इस तरह संभागे करके जाते हुए ब्राह्मणको देखकर उन सिपाहियोंने समझा कि यह कोई पागल है ॥ १८४ ॥ १८५ ॥ विप्र बाहर निकला त देखा कि बड़े जोरोंमें दृष्टि हो रही है। ऐसी अवम्याम वह ब्राह्मण झुककर बारजके नीचे खड़ा हो गया और सिपाही घरमें घुस गये । १८६ ॥ अरे-गये जब वह गया होगय ही मन सोचने लगा कि मैंने तो पुराणोंमे सुना था कि हनुमान्जीमें बड़ा बल है ॥ १८७॥ लेकिन वे सब बातें झूठी हैं। ऐसा सोरकर उसने छड़ी दीवारसे सँटाकर खड़ी कर दी, बायें हाथके घड़ेका