भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ३] मनोहरकाण्डम् ६३९


ततस्तु याचितत्वेनैव वस्तूनि मिश्रितानि हि । पृथक्कृत्वा तु सर्वेषां त्रीन् भागांश्च चकार सः ॥१५४॥
द्वौ भागौ स स्वनिकटे स्थाप्यैकं भागमुत्तमम् । मित्रगेहे न्यासभूतं नवम्यर्थं चकार सः ॥१५५॥
ततः स्वयं द्वारमध्ये चकार शयनं द्विजः । पुनः प्रभाते चोत्थायाचम्य गीतादिभिः प्रभुम् ॥१५६॥
तालशब्दैः प्रबोध्यैाथ तान्पृष्ठे स्थाप्य पूर्ववत् । नदीतीरं ययौ विप्रः पूजयामास पूर्ववत् ॥१५७॥
एवं नित्यपूजनं च चकारादृतमानसः । नवम्यां च विशेषेण पूजयित्वाऽथ राघवम् ॥१५८॥
स्वयं चापोषणं कृत्वा स्वयं चक्रे सुकीर्तनम् । रात्रौ जागरण चापि राघवं पूज्य वै पुनः ॥१५९॥
चकार कीर्तनेनाथ नर्तनाद्यैः स्वयं कृतैः । ततः प्रभाते श्रीरामं दशम्यां परिपूज्य च ॥१६०॥
प्रतिपद्दिनमारभ्य नवरात्रेऽप्यथंकृतम् । आनन्दरामचरितपारायणमनुत्तमम् ॥१६१॥
तत्सम्माप्य पूजयित्वा पुस्तकं ब्राह्मणांस्त्वथ । निमंत्रितवान् समाहूय तेष्वेवैकं सपत्नीकम् ॥१६२॥
द्विजमाकारयामास ततः संचिततंदुलाः । मित्रगेहे न्यासभूतांस्तेषां कुर्वोदनं शुभम् ॥१६३॥
यथा संचितशाकादि तथा लब्धानि यानि सः । तानि सर्वाणि संस्कृत्य वराम्लीदीनि चाकरोत् ॥१६४॥
बालुकावेदिकायां वै मध्ये पत्नीयुतं द्विजम् । अष्टकोणेषु विप्रांस्तान्ष्ट अद्देश्य वै क्रमात् । १६५॥
षोडशैरुपचारैस्तान पूजयामास भक्तितः । रम्भादलेषु च ततो विस्तीर्णेषु द्विजोत्तमः ॥१६६॥
चकार तैः कृतैरन्नैः स मुदा परिवेषणम् । तदन्ने भोजने चक्रुस्तद्भक्त्याऽतिमुदान्विताः ॥१६७॥
ततो दत्त्वा सुताम्बूलं दक्षिणां तान् प्रणम्य च । विसर्जयामास विप्रांस्तांश्चक्रेऽशने द्विजः ॥१६८॥
एवं विप्रो मसि मासि नवायतनपूजनम् । नवम्याः पारणायाश्च दिवसे दशमीदिने ॥१६९॥
चकार नवनिप्रैस्तु यात्रो कृत्वाऽपि भक्तितः । एवं गतानि वर्षाणि नव तस्य द्विजन्मनः ॥१७०॥
एकदा श्रावणे मासि तद्ग्रामे सेनया नृपः । कार्थदद्यौ तदा विप्रः स्वस्थले निशि निद्रितः ॥१७१॥


था । कुछ देर बाद उन माँगकर लायी हुई वस्तुओंका तीन भाग करके दो भाग तो अपने पास रख लेता, बाकी एक भाग अपने निकटवर्ती मित्रके यहाँ नवमीके उत्सवके लिय धरोहरके तौरपर रख आया करता था । १५३-१५५ ॥ इन सब नित्य नियमोंसे निवटकर वह द्वारपर शयन करता और फिर सबेरे उठकर गीतापाठ आदिसे भगवान्‌की स्तुति करता हुआ ताली बजाकर राम आदिको जगाता और नित्य-नियमके अनुसार फिर उनकी अपना कंठपर लादकर नदीके तटपर पहुँच जाया करता और पूर्वोक्त विधिसे पूजन करता था ॥ १५६ ॥ १५७ ॥ इस तरह आदर भरे मनसे वह नित्य पूजन किया करता था किन्तु नवमीको उपवास करके विशेष उपकरणोंके साथ पूजन करके भली प्रकार कीर्तन और रात्रिके समय जागरण करता था ॥ १५८ ॥ १५९ ॥ फिर दशमीके दिन रामका पूजन करके प्रतिपदासे लेकर नवरात्र पर्यन्त आनन्दरामायणका पारायण करता था ॥ १६० ॥ उसे समाप्त करके नौ ब्राह्मणोंका पूजन करता था । तदनन्तर एक ब्राह्मणदम्पती को बुलाकर मित्रके घरमें इकट्ठा किये हुए तण्डुलसे बढ़िया भात बनाकर जो कुछ शाक आदि एकत्र हुआ उस भी भली भांति बना करके अच्छी तरह बालुकाकी बना हुई वेदीपर बीचमें उस सपत्नीक ब्राह्मणको बिठलाता और कोनोंमें उन आठ विप्रोंको बिठालकर षोडश उपचारोंसे भक्तिपूर्वक उनका पूजन करता था । तदनन्तर केलेके पत्तोंको उनके आगे बिछाकर उन बने हुए अन्नोंको बड़ी प्रसन्नताके साथ परोसता था और वे ब्राह्मण उसकी भक्तिसे गद्गद होकर बड़े प्रेमसे भोजन करते थे ॥ १६१-१६७ ॥ इसके बाद बढ़िया पान तथा दक्षिणा देकर उन ब्राह्मणोंको बिदा करता । तब स्वयं भी भोजन करता था । १६८ ॥ इस तरह वह ब्राह्मण प्रतिमासकी नवमी तथा दूसरे पारणवान दिन नौ ब्राह्मणोंमें नवायतनका पूजन किया करता था ॥ १६९ ॥ इस तरह उस ब्राह्मणके नौ वर्ष बीत गये ॥ १७० ॥ एक बार श्रावणके महीनेमें उसके यहाँ एक बड़ी सेना अपने साथ लिये एक राजा आ पहुँचा, किन्तु ब्राह्मण रात्रिके समय अपने घरमें पड़ा सो रहा था ॥ १७१ ॥