भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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६३८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

ततः पृथक्चोद्वर्त्तनं तैलादङ्गान्निधाय सः। नीरेणस्नापयत् सर्वान् कृत्वा चोष्णंतान्यपि ॥१३७॥ दत्तौ भुजादित्रणे वस्त्रार्थं च पृथग्ददौ। ततः पत्रैः फलैः पुष्पैर्लब्धैःस्नानार्च्चनक्रमात् ॥१३८॥ पचः स स्थूलव्रीहीणां कुर्वोदनमनुत्तमम्। स्नात्वा माध्याह्निकं कृत्वा पुनःसम्पूज्य राघवम् ॥१३९॥ दत्त्वौदनस्य नैवेद्यं वैश्वदेवं विधाय च। किञ्चिद्भिक्षामतिथये दत्त्वान्नाण्डजडिकाम्॥१४०॥ दत्त्वा पृथक्पृथक् विप्रश्चक्रे रामाज्ञयाऽशनम्। ततो रामं पुनः पृष्ठे समारोहयददरात् ॥१४१॥ ततः सीतां ततः सर्वान् लक्ष्मणादीन्क्रमेण हि। पूजोपकरणं सर्वं पेटिकायां विधाय सः ॥१४२॥ कृत्वा तां पेटिकां पृष्ठे जगामाथ शनैःशनैः। स वनागमोपवनं गत्वा रामं वचोऽब्रवीत् ॥१४३॥ राम राजीवपत्राक्ष वनागस्रादिकौतुकम्। जानकीसहितः पश्य नानांडजम्गादिकान् ॥१४४॥ ततो ययौ ग्रामहट्टे दर्शयन्कौतुकं विभुम्। संमर्दं ताडयामास मार्गार्थं यान् स यष्टिना॥१४५॥ तेऽपि तत्कौतुकाविष्टा जनाः कोपं न मेनिरे। एवं नाना कौतुकानि दर्शयामास राघवम् ॥१४६॥ ततः शून्ये तृणगृहे रामं तानवतार्य च। काष्ठनिर्मितपर्यङ्के कारयामास निद्रितान् ॥१४७॥ ततो देशाड्ढमध्ये गत्वा स ब्राह्मणोत्तमः। याचया तण्डुलान् तैलं घृतं शाकं फलानि च ॥१४८॥ नागवल्लीदलादीनि कस्तूरीं कुङ्कुमादिकम्। लब्ध्वा तामग्रय किञ्चिद्द्रव्यं समानिकं ययौ ॥१४९॥ तदुग्रमरामिन् सर्व ये ये हट्टे स्थिता जनाः। स्वस्नानान्न्यवमत्वत्तस्तस्मै द्विजोत्तमम् ॥१५०॥ भारामनिष्ठं च दृष्ट्वा ददुस्तद्याचितं मुदा। विप्रः शून्यगृहे रामं रामप्रयं दीपमुत्तमम् ॥१५१॥ प्रज्वाल्योगारतिकं कृत्वा गन्धाद्यैः परिपूज्य च। वीजयामास रामादीन् पल्लवेन मुदान्वितः ॥१५२। ततः स्तुत्वा मुहुर्जप्त्वा कृत्वा चापि प्रदक्षिणाः। चकार कीर्त्तनं वश्यमार्थः सन्मनुभिर्द्विजः ॥१५३॥

से जाकर शौचाविधि पूर्ण किया करता था । १३६॥ तदनन्तर राम सीता आदिक शरीरमे तेल लगाकर वोट गरम जलसे स्नान करवाता । तदनन्तर भाजपत्र आदिके पत्ते कपड़ेके लिए प्रदान करता और पत्र, फल, पुष्प आदि जो कुछ मिल जाता, उससे क्रमशः उनका पूजन किया करता था ॥ १३७॥ १३८ ॥ फिर मोटे चावलका उत्तम भात बनाता और स्नान तथा मध्याह्नकालका संध्या आदि क्रियायें कर लेनेके बाद रघुनाथजीकी पूजा करता और बलिवैश्वदेव करके वह भातका भाग उनके सामने रखता था । तदनन्तर उसमेंसे कुछ भक्तिदायक भिक्षार्थ, कुछ मछलियां और पक्षियोंके लिए कुछ शौचो तथा चींटी आदिके लिए निकालकर रामकी आज्ञा पा मानकर स्वयं भोजन किया करता था । तदनन्तर फिर रामको आदरपूर्वक पीठपर लादकर क्रमशः सीता-लक्ष्मण आदिको तथा पूजनकी सामग्री पेटामें भरकर पटा बगलमे दबाता और सबको पीठपर बैठाकर यहाँसे चलता था । इसके बाद किसी सुन्दर बगीचामें पहुंचकर रामसे कहता -हे राजीवलोचन राम ! सीताके साथ आप इस बगीचेका तथा बगीचेमें रहनेवाले पशु-पक्षियोंका अवलोकन करिए ॥ १३९-१४४॥ इसके बाद वह गाँववाले बाजारमें जाता और मदन भगवान्को वहांके कौतुक दिखाता था। उस समय भीड़मे आवानके लिए रास्ता बनाते समय वह कियाका डण्डेसे मार भी देता तो कोई बुरा नहीं मानता था इस तरह वह नित्य रामचन्द्रजीको नाना प्रकारके कौतुक दिखाया करता था ॥ १४५ ॥ १४६ ॥ इसके बाद वह सूनी तृणशालामें ले जाकर उन लोगोको उतारता और काठकी खटाईपर सुला दिया करता था ॥ १४७ ॥ तदनन्तर तुरन्त वह बाजारमें जाता और चावल, तेल, घी, साग, फल, फूल, पान, सुपारी, कुमकूम तथा कुछ पैसे माँगकर अपन रामके पास लौट आया करता था ॥ १४८ ॥ १४९॥ उस ग्राममें रहनेवाले अनेक प्रकारके व्यवसायोप लगे हुए लोग उसे अद्वितीय रामभक्त समझकर वह जो कुछ माँगता, सो दे दिया करते थे । विप्र सूने घरमें पहुंचकर रामके आगे उत्तम दीपक जलाता, फिर आरती उतारता और धूप, दीप, गन्ध आदिस उनकी पूजा करके किसी पल्लव आदिकी पंखा हिला करता था ।। १५०-१५२ ।। तत्पश्चात वह रामको स्तुति, जप तथा प्रदक्षिणा करके आग कह आनवाले मंत्रा द्वारा हरिकीर्त्तन किया करता था।