भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 653

सर्गः ६] मनोहरकाण्डम् १३७

विष्णुदास उवाच गुरो त्वया राघवस्य श्रीरामनवमीव्रतम् । मये मासे प्रकर्तव्यमिति प्रोक्तं ममाग्रतः ॥११९॥
केनाचरितं पूर्वं सिद्धिलब्धाऽथ केन हि । तन्ममं विस्तरेणैव वद कृत्वा कृपां मयि ॥१२०।
अन्यच्च प्रष्टुमिच्छामि तन्मे मां वक्तुमर्हसि । अशक्तेन नरेणेदं व्रतं कार्यं कथं महत् ॥१२१।

श्रीरामदास उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । आसीत्पुरा द्विजः कश्चित्केशाले राहव-परः ॥१२२॥
नाभूत्तस्य विवाहोऽत्र निर्धनस्य जनस्य च । नासीद्गृहं गद्हमपि न माता न पिताऽपि चः ॥१२३॥
हस्त्यैको नियमश्चासीद्दरिद्रस्य च तं शृणु । नित्यं प्रातः समुत्थाय कृतमालोनदीजले ॥१२४॥
स्नात्वा नदीसिकतायां सिकतावेदिका नव । कृत्वा तत्र जनकजासहितं रघुनन्दनम् ॥१२५॥
पत्रनिर्मित श्रीरामलिंगाम्रककरणमने । मध्यमयां वेदिकाया संस्थाप्य धातुनिर्मितम् ॥१२६॥
अष्टदिक्षु वेदिकासु मरुत्वदासने पृथक् । सजननी राघवस्य लक्ष्मणादीन्म्यवेशयत् ॥१२७।
ततः स राघवं प्राह राम राजीवलोचनम् । कर्तुमाशौचकं कम गन्तुमर्हसि सत्वरम् ॥१२८।
इत्युक्त्वा तं स्वयं पृष्ठे निवेश्य रघुनन्दनम् । कियद्दूरं रहा वृक्षखण्डे गत्वा द्विजोत्तमः ॥१२९॥
शर्वं तृणभुवि स्थाप्य तदग्रे पात्रमुत्तमम् । सजलमृत्तिकां चापि संस्थाप्य व जवन हि ॥१३०॥
किंचिद्दूरं स्वयं गत्वा स्थितवान् स कियत्क्षणम् गत्वाऽन्तिकं पुनर्हस्तौ पादमक्षालनादिकम् ॥१३१॥
मत्तोन्मृत्तिकाशौचं च तस्य स्वकरेण हि । दत्त्वाऽन्यपत्रतोयेन रामस्याचमनं ततः ॥१३२॥
दन्तकाष्ठेन तद्वान्मर्शोध्य भक्तिपूर्वकम् । गण्डूषार्थं जलं दत्त्वा कवोष्णं शीतलं पुनः ॥१३३॥
समप्र्यौचमनार्थं स वस्त्रेणास्यं प्रमाष्ट्जयन् । संमार्ज्य हस्तौ पादौ च गात्रस्य वामया द्विजः ॥१३४॥
त विगृह्य पुनः पृष्ठे महीसूनुः शनैः शनैः । सिकतावेदिकायां च पूर्वस्थाने न्यवेशयत् ॥१३५॥
एवं सीतां लक्ष्मणं च भरतं लक्षणातजम् । सुग्रीवादीन् पृथक् नीत्वाऽवश्यकार्यान्यकारयत् ॥१३६॥

विष्णुदासने कहा-हे गुरो अभी आपने मुझसे कहा है कि चैत्रमास में श्रीरामनवमी व्रत करना चाहिए ॥११९॥ इस व्रतको किसने किया था और इसके प्रभावसे किसको सिद्धि प्राप्त हुई थी कृपा करके यह विस्तारपूर्वक हमे बतलाइये ॥१२०॥ हाँ, एक बात मैं आपसे और पूछना चाहता हूँ। वह यह कि जो प्राणी अशक्त है वह यह व्रत कैसे करे ? ॥१२१॥ श्रीरामदासने कहा हे शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सावधान मनसे सुनो । एक समय रत्न (केरळ) देशमे राघका भक्तिमे तत्पर एक ब्राह्मण रहा करता था ॥ १२२ ॥ दीनताके कारण न उसका ब्याह हुआ था, न घर द्वार था और न माता-पिता ही थे । १२३ । किन्तु उस दरिद्रका एक नियम था, उसे सुनो। वह प्रतिदिन सवेरे उठकर तो एक सुन्दर माला बनाता। फिर नदीमें स्नान करके बालूमें ही वेदियां बनाकर उसपर पत्र निर्माण करके श्रीरामलिंगाम्रके सम्दर मध्यवेदमें धातु-निर्मित रामकी प्रतिमा बैठाकर रघुवंगके मसननीके आगे और राम लक्ष्मण आदिको बिठलाता था ॥१२४। १२५॥ ।। १२६ ।। १२७ । इसके बाद राजीवलोचन रामसे कहता- हे राम ! मैं आपका पूजन करूंगा, इसलिए कृपा करके पधारिए ॥ १२८ ॥ ऐसा कहकर रामको अपनी पीठपर लादता और कुछ दूर एकान्तकी झाड़ियों-में ले जाकर किसी घास उगी हुई जगहपर बिठलाता । उनके आगे जलसे भरा हुआ उत्तम पात्र और मृत्तिका रखकर स्वयं वहांसे कुछ दूरीपर जाकर बैठता और थोड़ी देर बाद लौटकर आता तो अपने हाथोंसे उनका पादप्रक्षालन और मृत्तिकाशुद्धि आदिकराता । फिर एक दूसरे पत्रके द्वारा जल देकर रामको कुल्ले कराता था ॥ १२९-१३२ ॥ तदनन्तर काष्ठकी दातूनसे उनके दाँत माँजकर पहले कुछ गरम और बादमें शीतल जलसे कुल्ले करवाता था । इसके बाद तौलियेसे उनके मुंह आदि पोंछकर हाथपैर आदि पोंछता और फिर अपनी पीठपर लेकर धीरे-धीरे सिकताकी बनी हुई वेदिकापर बिठाल दिया करता था ॥ १३३-१३५ ॥ इसी तरह सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सुग्रीव आदिको पृथक्-पृथक्