भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 652, कुल 811 में से

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६३६ | आनन्दरामायणे | [सर्ग ६

तस्याप्यर्धं तदधार्थं वित्तशाठ्यं न कारयेत् । षोडशैश्चोपचारैश्च पूजोक्ता निशि जागरः ॥१०२॥ दशम्यां प्रातरुत्थाय स्नात्वा सम्पूज्य राघवम् । राममंत्रेण हवनं कार्यं नवसहस्रकम् ॥१०३॥ तिलाद्यैः पायसाद्यैश्च नवांशेनाथ तत्स्मृतम् । तद्दशांशेन क्षीरेण तर्पणं हि प्रकामयेत् ॥१०४॥ तस्यापि च दशांशेन मार्जनं द्विजभोजनम् । कर्णमुद्रां हस्तमुद्रां वसने नवसू्त्रकम् ॥१०५॥ चित्राम्रमनुपमंगेय मुकुटं झर्झरीं तथा । कांस्यपात्रं भोजनस्य नवांशेन प्रपूरितम् ॥१०६॥ घृतपात्रं कांस्यमयं नवांशोपरि संस्थितम् । पादुके पुस्तकं दिव्यं यत्किंचिद्राघवस्य च ॥१०७॥ तांबूलं दक्षिणां चापि प्रत्येकं भूसुराय हि । अर्पयेत्सकलं चैवमेव सर्वान् समर्पयेत् ॥१०८॥ ततो गुरुं समभ्यर्च्य प्रणम्य च पुनः पुनः । तामर्चासपर्पयेन्मन्त्री गुरवे दक्षिणाम्बिताम् ॥१०९॥ ततो गुरुं प्रार्थयेच्च प्रणम्य च पुनः पुनः । मासे मासे नवम्यां तु सोद्यापनव्रतं मया ॥११०॥ यत्कृतं नव वर्षाणि तेन तुष्यतु राघवः । अग्रेऽपि यावज्जीवामि तावत्कालं करोम्यहम् ॥१११॥ व्रतानामुत्तमं चेदं तुष्ट्यर्थं राघवस्य च । गुरो त्वत्कृपया रामो मां प्रसीदतु सीतया ॥११२॥ एवं सम्प्रार्थ्य स्वीयं तं गुरुं नत्वा विसर्जयेत् । ततः स्वयं हि भुञ्जीत सुहृन्मित्रसुतादिभिः ॥११३॥ एवमुद्यापनं कृत्वा कार्यमग्रे व्रतं पुनः । मासे मासे राघवस्य न त्याज्यं सर्वथानरैः ॥११४॥ एकादशीव्रतं नित्यं यथा सङ्क्रियते नरैः । तथा मासवतं चेदं नित्यमेव स्मृतं बुधैः ॥११५॥ अशक्तेन यथाशक्त्या कार्यमुद्यापनं व्रतम् । उपोष्या नवमी शुक्ला सर्वदैव नृभिर्भुवि ॥११६॥ नवम्यां शुक्लपक्षे यो भुंक्तेऽन्नं मूढधीर्नरः । रौरवे कल्पपर्यन्तं तस्य वासः स्मृतो बुधैः ॥११७॥ एवं शिष्य त्वया यच्च पृष्टं तन्मे निवेदितम् । का नेच्छा श्रोतुमिच्छामि भो वदस्व वदामि ते ॥११८॥


की मूर्तियाँ पाँच-पाँच पल चाँदीकी बनवावे। यदि ऐसा करनेका सामर्थ्य न हो तो उसमें आधे वजनकी मूर्ति बनवाये और यदि वह भी न कर सके तो आधेके आधे वजनकी मूर्तियाँ बनवाना चाहिये, वह भी न हो सके तो उसके भी आधे वजनकी बनवाये, किन्तु कंजूसी न करे। षोडश उपचारोंसे पूजन तथा रात्रिको जागरण अवश्य करना चाहिए ॥१०१-१०२॥ दशमीको सवेरे उठकर स्नान और रामका पूजन करके नौ हजार हवन करे ॥१०३॥ हवन तिलसे, खीरसे अथवा नवांशसे करना उचित है। तदनन्तर हवनके दशांश दूधसे तर्पण करे, उसका भी दशांश मार्जन करे और मार्जनका भी दशांश ब्राह्मणोंको भोजन करावे। इसके अनन्तर हस्तमुद्रा तथा कर्णमुद्राके साथ वस्त्र, यज्ञोपवीत, चित्र सन, उत्तरीय वस्त्र, मुकुट, झारी, भोजन-के लिए नवांशसे पूर्ण कांस्यपात्र, घृतपात्र, इन सबोंके मध्य कांस्यमय पात्रमें नवांशप्रपर रखकर चरणपादुका, दिव्य आनन्दरामायणकी पुस्तक, ताम्बूल, दक्षिणा व मन्त्र बहुमूल्य प्रत्येक ब्राह्मणोंको दे ॥१०४-१०७॥ तदनन्तर गुरुका पूजन करके उसे एक गौ दे और दक्षिणा समेत वह पूजनसामग्री गुरुको अर्पण करे। १०८॥१०९॥ इसके बाद गुरुको बारम्बार प्रणाम करके कहे- हे गुरो ! महिने महिने उद्यापनके साथ मैंने जो नौ वर्षपर्य्यन्त रामव्रत किया है। उससे श्रीरामचन्द्रजी प्रसन्न हों। आगे भी जब तक जीवित रहूँगा, बराबर यह उत्तम व्रत भगवान्‌को प्रसन्न करनेके लिए करता रहूँगा। हे गुरो ! आपकी कृपासे मुझपर सीता और राम प्रसन्न हों ॥११०-११२॥ इस प्रकार प्रार्थना करके बाद अपने गुरुजीको प्रणाम करके उनका विदा करे। इसके बाद सम्बन्धियों, मित्रों और पुत्रादिकोंके साथ स्वयं भी भोजन करे॥ ११३॥ इस तरह उद्यापन करके महिने-महीने यह व्रत करता रहे, त्यागे नहीं ॥११४॥ जिस तरह लोग एकादशीका व्रत करते हैं। उसी तरह यह मासव्रत भी सदा करते रहना चाहिए ॥११५॥ यदि विशेष सामर्थ्य न हो तो अपनी शक्तिके अनुसार ही इसका उद्यापन करे। संसारके लोगोंको चाहिए कि सदा शुक्लपक्षकी नवमीको अवश्य उपवास किया करें ॥११६॥ जो मूर्ख मनुष्य शुक्लपक्षकी नवमीको अन्न खाता है, उसे एक कल्पतक रौरव नरकमें निवास करना पड़ता है। यह बात कितने ही विद्वानोंकी कही हुई है। ११७। फिर मंद्रभनें कहा-हे शिष्य ! तुमने जो पूछा, वह मैंने तुमसे कहा । अब और क्या सुनना चाहते हो, यह बतलाओ तो मैं कहूँ ॥११८॥

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