श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 651, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६३५
मासे मासे सर्वदैव रामोपासकमानवैः। एवं मासव्रतं प्रोक्तं राघवस्यातितोषदम् ॥८५॥
संति व्रतान्यनेकानि जगन्त्यां पुण्यदानि हि। तथाप्यनेन सदृशं न भूतं न भविष्यति ॥८६॥
व्रतानामुत्तमं चैतद्भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । अवश्यमेव कर्तव्यं रामोपासकमानवैः ।८७॥
एवं शिष्य मया प्रोक्तं व्रतानामुत्तमं व्रतम् । सविस्तारं तवाग्रे हि राघवस्यातितोषदम् ॥८८॥
विष्णुदास उवाच
श्रीरामनवमीमासव्रतस्योद्यापनं वद । कदा कार्यं कथं कार्यं गुरो कृत्वा कृपां मयि ।८९।
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स मन्नावधानमनाः शृणु। तद्धर्मवन्मम मासनवमीव्रतमुत्तमम् । ९०।
कृत्वा चोद्यापनं कार्यं चैत्रे श्रीरामजन्मनि । नवम्यां समुपोष्यथ कर्त्तव्यमधिरामनम् ॥९१॥
गृहे वृन्दावने वापि गोष्ठे देवगृहादिषु । सम्मार्जनं गोमयेन कार्यं वा चन्दनादिभिः ॥९२॥
ततः पाषाणचूर्णैश्च नानारङ्गादिकानि हि । भुवि संलेखनीयानि नीलपीतादिवर्णकैः । ९३।
रञ्जनीयानि रम्याणि ततः पत्रादिमध्यके। पूत्राक्तरामभद्राणां मध्ये त्वेकं वरासनम् । ९४॥
लिखित्वा चित्रवर्णैश्च प्रोक्तरूपं सुगन्धेषु । तस्योपरि महान् रम्यश्चित्रवर्णश्च मंडपः । ९५॥
देयो द्वाराणि चत्वारि कार्याणि तोरणानि च । कदलीस्तम्भयुक्तानि चेक्षुदण्डयुतानि च ॥९६॥
नानाघटाकिंकिणीभिर्ध्वनितान्युज्ज्वलानि च । रम्भादर्शमंडितानि विचित्राणि शुभानि च ॥९७॥
चित्रध्वजैर्वितानैश्च मुक्ताहारैर्युतान्यपि । अथ तद्रामभद्रस्य कलशे वारिपूरिते ॥९८।
ताम्रपात्रे रामचन्द्रं नवायतनचिह्नितम्। सीतया पूजयेद्रात्रौ महोत्साहपुरःसरम् ॥९९।
नवपलामितां मूर्तिं हैमीं कृत्वा प्रपूजयेत्। सीता हैमी प्रकर्त्तव्या शुभाऽष्टपलमिता ।१००॥
राजभ्रास्ते लक्ष्मणाद्याः पृथक् पञ्चपलैः स्मृताः । अशक्तौ च तदर्धेन तदधार्धेन वै पुनः ।१०१।
यतियों तथा ब्राह्मणोंको जो कुछ दिया हो, वही अपने गुरुको भी दे ॥ ८३ ॥ इस तरह हर पक्षमें रामचन्द्र-जीका व्रत करे । अथवा दान, पक्षी मत कर सके तो केवल गुरुपूजनसे वह रामव्रत करे ॥ ८४ ॥ रामकी उपासना करनेवालोके लिए रामको प्रसन्न करनेवाला यह मासव्रत मैने बतलाया ॥ ८५ ॥ यद्यपि संसारमें बहुतसे पुण्यदायक व्रत है किन्तु भी इस व्रतके बराबर न कोई व्रत हुआ है और न होगा ॥ ८६ ॥ यह सब व्रतोमें उत्तम और भुक्ति-मुक्ति देनेवाला व्रत है। रामके उपासकोको यह व्रत अवश्य करना चाहिए ॥ ८७ ॥ हे शिष्य ! इस प्रकार रामको अत्यन्त प्रसन्न करनेवाला सब व्रतोम उत्तम व्रत मैने विस्तारपूर्वक तुम्हे कह सुनाया । ८८ ॥ विष्णुदास कहा—अब आप मुझपर कृपा करक यह बताइए कि श्रीरामनवमीके व्रतका उद्यापन कब और कैसे करना चाहिए ८९ ॥ श्रीरामदास संत कहा -हे वत्स ! तुमने बहुत ही अच्छी बात पूछी है इसे सावधान मन होकर सुनो। दो वर्ष पर्यन्त साधक। मासनवमी व्रत करना चाहिए। इसके बाद चैत्र मासमे श्रीरामजन्मके दिन इसका उद्यापन करना चाहिए ! यह कार्य नवमीको उपवास करके किया जाना चाहिए ।९०॥ ९१॥ घरम, वृन्दावन (तुलसीकी बगीची) में, गोशालामे अथवा किसी मन्दिरमें चन्दन या गोबरसे चौका दिलाकर पाषाणके चूर्ण आदिस अनेक प्रकारके नील-पीत कमल आदि बनावे ॥ ९२॥ ९३। इसके बाद पत्र आदिवर पूर्वोक्त रामभद्रांमसे किसी एक भद्रको बनवे। उसके बीचमे एक सुन्दर आसन रक्खे ॥ ९४ ॥ आसन को अनेक प्रकारके रङ्ग-बिरङ्गे रङ्गोमे रखे और उसके ऊपर अतिशय सुन्दर और चित्रवर्णांका मण्डप बनावे ॥ ९५ ॥ उसमे चार द्वार बनाकर केलेके खंभे तथा इक्षुदण्डके साथ-साथ तोरण लगावे ॥ ९६ । उसमे अनेक प्रकारके घंटा किंकिणी आदि बाज बाँधकर उसका शृंगार करे । उसे चित्र-विचित्र ध्वजा, वितान, शोभनाके द्वार आदिसं सुसज्जित करे। इसके अनन्तर रामतोभद्रके बीचमे जलपूर्ण कलशपर ताम्रका पात्र रखकर नवायतनके चिह्नसे चिह्नित सीता समेत रामका पूजन करे ॥ ९७-९९ ॥ श्री वत्स्की सुवर्णमयी ९.पन्मूर्ति बनवाना चाहिए । आठ पलकी सीतामूर्ति बनेगी ॥ १०० ॥ लक्ष्मण आदि-