भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 650, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 650

६३४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

मानाफलानि देयानि देयस्तांबूल उत्तमः दक्षिणा च ततो दत्त्वा देयो मुकुर उज्ज्वलः ॥७१॥
नीराजनं ततः कृत्वा मंत्रपुष्पाणि दीयताम् । प्रदक्षिणानमस्कारांश्च कृत्वा ततः परम् ॥७२॥
नृत्यगीतादिकं कृत्वा प्रार्थयेद्रघुनायकम् । विनियोग्य करौ पादौ राघवो संस्थितैर्नरैः ॥७३॥
वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान् पृष्ठे सुमित्रासुतः
शत्रुघ्नो भरतश्च पार्श्वदलयोर्वायव्यकोणादिषु ।
सुग्रीवश्च विभीषणश्च युवराट् तारासुतो जाम्बवान्
मध्ये नीलसरोजकोमलरुचिं रामं भजे श्यामलम् ॥७४॥
रामो हन्त्वा दशास्यं द्विजवचनगुरुत्वेन यात्राऽश्वमेधान्
कृत्वा भुक्त्वानिभोगानवनितलगतांश्चा गृहीत्वाऽथ सीताम् ।
लब्ध्वा नानास्तुरूपांस्तास्तववनितलगतान्पार्थिवादींश्च जित्वा
कृत्वा नानोपदेशान् गनपुरनिकटे स्त्रीयलोकं जगाम ॥७५॥
नवकाण्डमयः श्लोकः पठित्वाऽयं हरेः पुरः । ततः क्षमाप्य श्रीरमं पूजां तस्मै समर्पयेत् ॥७६॥
मया साव्रते रामनवम्यां यत्प्रपूजनम् । पारायणादिकं सर्वं नवरात्रऽपि यत्कृतम् ॥७७॥
तन्मवं नेऽर्पितं त्वद्य प्रसन्नो भव मे प्रभोः नवाप्तनपूजेयं या कृता नवमीदिने ॥७८॥
नवविप्रेषु साऽप्यद्य तेऽर्पिता राम वै मया । स्वं गृहाण यथाशक्त्या कृतां तां त्वं प्रसीद मे ॥७९॥
एवं समर्प्य रामाय सकलं पूजनादिकम् । ततो भोजनयोग्यान्तान् संनिवेदयाथ भोजयेत् ॥८०॥
पुनर्दत्त्वा तु तांबूलं दक्षिणां तु विसर्जयेत् । ततः स्वयं विप्रतीर्थं गृहीत्वा वै ततः परम् ॥८१॥
यतिपादोदकं प्राश्य देवतीर्थं ततः परम् । गृहीत्वा भोजनं कार्यं सुहृन्मित्रजनैः सह ॥८२॥
समर्पितं यद्यतये तत्तथ ब्राह्मणाय हि । देय स्वगुरवे सर्वं ब्रह्मसूत्रादिकं शुभम् ॥८३॥
एवं व्रतं राघवस्य पक्षे पक्षे प्रकारयेत् । अथवा शुक्लपक्षे हि कार्यं व्रतमिदं शुभम् ॥८४॥

इसके बाद नाना प्रकारके फल, ताम्बूल, दक्षिणा, सुन्दर दर्पण, नीराजन, मन्त्रपुष्प, प्रदक्षिणा, नमस्कार आदि क्रमशः समर्पण करे । तदनन्तर नृत्य-गीत आदि करके सब लोग सामने खड़े होकर रामचन्द्रजीसे प्रार्थना करें ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ वामभागमें सीता, सामने हनुमान्जी, पीछे लक्ष्मणजी, दोनों बगल भरत और शत्रुघ्न, वायव्य आदि कोणोंमें सुग्रीव, विभीषण, युवराज अङ्गद, जाम्बवान् आदि खड़े हैं और उनके बीचमें बैठे हुए नील कमलके समान कोमल दीप्तिसम्पन्न श्याम स्वरूपधारी रामका मैं भजन करता हूँ ॥ ७४ ॥ रामने रावणको मारकर ब्राह्मणके वाक्यरूपी गौरवसे प्रेरित हो यात्रा तथा अश्वमेध आदि किये और विविध प्रकारके भोग भोगे । फिर पाताललोक जाती हुई सीताको उन्होंने पृथ्वी से वापस लिया । इसके बाद पृथ्वो-मण्डलके बड़े-बड़े राजाओंको परास्त करके हस्तिनापुरके आस-पासवाले बहुतसे देशोंको जीता । उन राजाओंकी कुमारियोंके साथ अपने पुत्रोंके ब्याह किये और अन्तमें अपने परम धामको चले गये ॥ ७५ ॥ इस नौ काण्डात्मक श्लोकको रामके सामने पढ़कर क्षमा माँगे और की हुई पूजा भगवान्को अर्पण करे ॥ ७६ ॥ साथ ही यह कहता जाय कि हे प्रभो ! मैंने इस साव्रतमें रामनवमी तथा नवरात्रमे जो पूजन पारायण आदि किया है, वह सब आपको अर्पण है । हे प्रभो ! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों । रामनवमीका जो नौ विप्रामें मैने आपको नवायतन पूजा की है, वह भी आपको अर्पित है । यथाशक्ति की हुई इस पूजा को स्वीकार करके आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ ७७-७९ ॥ इस तरह रामका सब पूजन आदि समर्पण करके विधिवत् उन विप्रोंको आसनपर बिठालाकर भोजन कराये ॥ ८० ॥ फिर ताम्बूल और दक्षिणा देकर उन्हें विदा करे । तदनन्तर स्वयं ब्राह्मणोंके चरणोदक, यतियोंके पादोदक एवं देवताओंके चरणोंके पुनीत चरणजलसे आचमन करके नातेदारों, मित्रों तथा बान्धवोंके साथ स्वयं भोजन करे ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ तदनन्तर