श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 660, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६४४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७
श्रीपुत्रधनदं चैतत्सर्वसौख्यप्रदं नृणाम्। इहलोके परे चापि विष्णोः सायुज्यदायकम् ॥२३८॥
संति व्रतान्यनेकानि स्वर्गे मर्त्ये रसातले। तथापि रामनवमीसमानं व्रतमुत्तमम् ॥२३९॥
विष्णुदास द्विजश्रेष्ठ न भूतं न भविष्यति। तस्मात्सदा नरैः कार्यं व्रतं चेदं महत्तमम् ॥२४०॥
एवं त्वया यथा पृष्टं तथा ते विनिवेदितम्। किमन्वच्छ्रोतुमिच्छास्ति तद्वदस्व वदामि ते ॥२४१॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकांडे
आदिकाव्ये नवमीकथावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
सप्तमः सर्गः
( लक्षरामानामोद्यापनविधि )
विष्णुदास उवाच
अन्यद्गुरो राघवस्य तुष्टिदं किं वदस्व तत्।
श्रीरामदास उवाच
शृणुष्व विष्णुदास त्वं यत्तेऽहं प्रवदामि च। तुष्ट्यर्थं रामचन्द्रस्य नित्यं पत्रे तु मानवैः ॥ १ ॥
लेखनीयं रामनामशतानि नव प्रत्यहम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं पूजनीयं सविस्तरम् ॥ २ ।
एवं कोटिमितं लेख्यं लक्षं वा तु ततः परम्। हवनं हि दशांशेन कर्तव्यं विधिपूर्वकम् । ३ ।
इदं विष्णुरिति ऋचा तिलाज्यैः पायसेन वा। नवीनैर्नान्नवाद्या कार्यं राघवं परिपूज्य च ॥ ४ ॥
हवनांगे राघवादिदेवानां पूजने नरैः। आम्रनाथे तु भद्रं च स्थापनीयं प्रयत्नतः ॥ ५ ।
अष्टोत्तरसहस्रं च रामलिंगात्मकं शुभम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं रामलिंगात्मकं शुभम् ॥ ६ ॥
अष्टोत्तरसहस्रं वा रामतोभद्रमुत्तमम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं रामतोभद्रमुत्तमम् ॥ ७ ॥
एवं होमं लेखनं च पूजनाद् च यत्कृतम्। अर्पयेद्रघुनाथाय तत्सर्वं त्वतिभक्तितः ॥ ८ ।
मुनियों, देवताओं, नागों, गन्धर्वों, किन्नरों और राजाओंने कितने ही बार इस व्रतका अनुष्ठान किया है ॥ २३७ । यह व्रत इस लोकमें स्त्री-पुत्र धन तथा सब सुख देनेवाला है और परलोकमें विष्णुभगवान्का सायुज्य-मुक्ति प्रदान करता है ॥ २३८ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ विष्णुदास ! वैसे तो स्वर्ग, मर्त्य और रसातलमे बहुतसे व्रत हैं। किन्तु उनमेंसे रामनवमी व्रतके बराबर न कोई व्रत है और न होगा। इसी कारण लोगोको चाहिए कि सदा इस रामनवमीके महान् व्रतको करें ॥ २३९ ॥ २४० । इस तरह तुमने जो कुछ हमसे पूछा, सो कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते, हो सो कहो. २४१ । इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्द-रामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाली कोई और युक्ति बतलाइए। रामदास कहने लगे—हे विष्णुदास ! मैं तुम्हे जो बतला रहा हूँ, उसे सुनो। रामकी प्रीतिकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको चाहिए कि कागजपर प्रतिदिन नौ सौ वा एक सौ आठ रामनाम लिखकर विस्तारके साथ उनका पूजन करें १॥ १ ॥ २॥ इस तरह लिखते हुए जब एक करोड़ अथवा एक लाख नामोंको लिख लें तो उनका दशांश विधिवत् हवन करे ॥ ३ ॥ हवन 'इदं विष्णुः ०' इस मन्त्रसे करे। तिल, घी और खीरसे हवन करना चाहिए। यदि ये वस्तुएँ न इकट्ठी हो सकें तो नवीन अन्नसे रामका पूजन करके हवन करना चाहिए । ४ ॥ हवन-के अंगोंमें भद्रादि बनाकर राघवादि देवताओंका पूजन करके अष्टोत्तरसहस्रात्मक रामलिंगतोभद्र अथवा अष्टोत्तरशत रामलिंगात्मक भद्र बनावे । अथवा अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्र वा अष्टोत्तरशत रामतोभद्रकी रचना करे ॥ ५-७ ॥ इस तरह होम-लेखन-पूजन आदि जो कुछ करे, सब भक्तिपूर्वक रामचन्द्रजीको अर्पण कर दे ॥८॥