भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ७ ] मनोहरकाण्डम् ६४५


विष्णुदास उवाच

त्वया गुरो शुभं प्रोक्तं रामनामप्रलेखनम् । न तस्योद्यापनं प्रोक्तं तद्वदस्व ममाधुना ॥ ९ ॥

श्रीरामदास उवाच

शृणु शिष्य भविष्यंति कथां वक्ष्यामि भूतवत् । रामनामोद्यापनस्य विस्तरेण मनोरमाम् ॥ १०॥ पाण्डुपुत्रो महावीरो बंधुभिथ युधिष्ठिरः । स्त्रिया मात्रा अष्टराज्यो वने वासं करिष्यति ॥ ११ ॥ तं द्रष्टुं द्वापरे कृष्णः कदा गच्छति वै वने । तं कृष्णं पूजयित्वा स तस्मै प्रश्नं करिष्यति ॥ १२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

देवदेव जगन्नाथ भक्तानां वरदायक । किंचिच्चां प्रष्टुमिच्छामि मयि तुष्टोऽसि चेत्प्रभो ॥ १३॥ लक्ष्मीप्राप्तिकरं पुण्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् । व्रतमाख्याहि देवेश राज्यभ्रष्टस्य मेऽधुना ॥ १४॥

श्रीकृष्ण उवाच

गुह्याद्गुह्यतमं श्रोतुं यदि वाञ्छसि भूपते । तदा निगदतो मत्तः सकाशाच्छृणु सादरम् ॥ १५॥ रामनाम्नः परं नास्ति मोक्षलक्ष्मीप्रदायकम् । तेजोरूपं यदव्यक्तं रामनामाभिधीयते ॥ १६॥ तस्मात्तन्नाम जप्त्वा वै रामरूपो भवन्नरः । एतदेव हि रामेण मारुतिं प्रति भाषितम् ॥ १७॥

युधिष्ठिर उवाच

कस्मिन्काले हनुमते रामेणैवोपदिशितम् । एतद्विस्तरतो ब्रूहि सुमते रुक्मिणीपते ॥ १८॥

श्रीकृष्ण उवाच

पुरा रामावतारे च सीतां नीत्वा सुरारिणा । हनूमंतं समाहूय रामचंद्रोऽब्रवीद्वचः ॥ १९॥

श्रीरामचन्द्र उवाच

वायुसूनो महावीर सीतान्वेषणहेतवे । समस्तां दक्षिणांदिशं गत्वा शुद्धिं समानय ॥ २०॥

श्रीहनुमान् उवाच

रघुनाथ जगन्नाथ दक्षिणास्यां हि सागरः । बहवो राक्षसाः संति तत्र शक्तिः कथं मम ॥ २१॥


विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! आपने रामनाम लिखनेकी जो युक्ति बतलायी वह बहुत ही उत्तम है । लेकिन उसका उद्यापन नहीं बतलाया उसे भी मुझे अभी बतला दीजिए ॥ ९ ॥ श्रीरामदास कहने लगे-हे शिष्य ! मैं तुम्हें भविष्यकी एक कथा भूतकालमें समन्वित करके बतला रहा हूँ ॥ १० ॥ पांडुके पुत्र युधिष्ठिर जब राज्यसे वञ्चित हो गये, तब अपनी माता तथा बन्धुओंको साथ लेकर वनमें निवास करने लगे ॥ ११ ॥ उनको देखनेके लिए कृष्णचन्द्रजी वनमें गये । तब उन लोगोंने बड़े आदरसे श्रीकृष्णकी पूजा की और युधिष्ठिरने कहा-हे देवदेव ! हे जगन्नाथ ! हे भक्तोंको वर देनेवाले ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हों तो मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ ॥ १२ ॥ १३ ॥ हे देवेश - यह तो आप जानते ही हैं कि इस समय मैं राज्यसे भ्रष्ट हो चुका हूँ । अतएव आप मुझे कोई ऐसा व्रत बतलाइए । जो लक्ष्मीको देनेवाला, पवित्र और पुत्र पौत्रको बढ़ाने-वाला हो ॥ १४ ॥ श्रीकृष्णचन्द्रजीने कहा-हे भूपते ! यदि आप हमसे गुप्त व्रत सुनना चाहते हैं तो मैं कहता हूँ, आप सुनिये ॥ १५ ॥ रामनामके ऊपर बढ़कर मोक्ष और लक्ष्मीको देनेवाला और कोई उपाय नहीं है । यह तेजोरूप और अव्यक्त है ॥ १६ ॥ इसी कारण रामनामका जप करके लोग रामरूप हो जाते हैं। यही बात स्वयं रामचन्द्रजीने हनुमान्जीसे कही थी ॥ १७ ॥ युधिष्ठिरने कहा-हे मतिमन्पते ! रामचन्द्रने हनु-मान्जीसे कब इस बातकी चर्चा की थी ? श्रीकृष्णजीने कहा-रामावतारमें जब कि रावण सीताको हर ले गया, तब रामने हनुमान्जीको बुलाकर कहा-॥ १८ ॥ १९ ॥ हे महावीर ! हे वायुसूनो ! तुम सीताजीको खोजनेके लिए सारी दक्षिण दिशामें भ्रमण करो और शीघ्र उनका समाचार लाओ ॥ २० ॥ श्रीहनुमान् बोले-हे जगन्नाथ !