भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 662, कुल 811 में से

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पृष्ठ 662
६४६आनन्दरामायणे[ सर्ग ७

श्रीरामचन्द्र उवाच

मारुते रावणादीनां राक्षसानां निवारकम्। मंत्रं ददामि सुगमं येन सर्वजयी भवेत् ॥२२॥

श्रीहनूमानुवाच

महाराज कृपासिंधो दीनानां त्वं सुतारकः। उपदेशोऽधुना कार्यस्तस्य मंत्रस्य तत्त्वतः ॥२३॥

श्रीरामदास उवाच

इति श्रुत्वा च तद्वाक्यं रहस्याहूय सत्वरम्। मारुतेर्दक्षिणे कर्णे श्रीरामेण्युपदेशितः ॥२४॥ तस्य मन्त्रस्य सकलं पुरश्चरणमुत्तमम्। लक्षसंख्यं विधायाशु प्रतस्थे दक्षिणां दिशम् ॥२५॥ तन्मंत्रस्य प्रभावेण नानाजलचराचरम्। दुर्गमं सागरं तीर्त्वा लंकामध्ये समाययौ ॥२६॥ न स लेभे तत्र शुद्धिमाशोकाख्यवनं गतः। वृक्षमूले स्थितां सीतां दूरतोऽग्रे ददर्श सः ॥२७॥ तां दृष्ट्वा शीघ्रमागत्य हर्षनिर्भरमानसः। सीतायाश्चरणौ नत्वा दंडवत्पतितो भुवि ॥२८॥ अत्यन्तं सूक्ष्मवपुषं बालकाकारसंयुतम्। तं भूमौ पतितं दृष्ट्वा सीता वचनमब्रवीत् ॥२९॥ आगतोऽसि कुतो बाल कुत्रत्यः कस्य बालकः।

श्रीहनूमानुवाच

सीता माता पिता रामो रामचन्द्रसमीपतः ॥३०॥ समागतोऽस्मि हनुमान्प्रत्यैकां मुद्रिका त्वया। रामनामांकितां शुद्धां शुद्धकांचननिर्मिताम् ॥३१॥ ज्ञात्वा रामस्य सा सीता परं तोषमवापयौ। तां ज्ञात्वा तोषसहितामांजनेयोऽब्रवीद्वचः ॥३२॥ मातः क्षुधाऽस्त्यति मम त्वयाविश्लेषकारिणी। अस्मिन्वनेऽतिमधुरः फलसङ्घोऽतिदुर्लभः ॥३३॥ तवाज्ञयाऽहं सीतेऽद्य करिष्ये भक्षणं ध्रुवम्।

सीतोवाच

भो बालक महाबीर रावणोऽस्ति वनाधिपः ॥३४॥


हे रघुनाथ ! दक्षिण दिशामें तो विशाल सागर है और बहुतसे राक्षस हैं, फिर वहांपर मेरी शक्ति कैसे काम देगी ? ॥ २१ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा हे मारुते ! रावण आदि राक्षसोंका निवारण करनेवाला मैं एक बहुत ही सरल मंत्र बताता हूँ जिसकी सहायतास सर्वत्र तुम्हारी विजय होगी ॥ २२ । हनुमान्जीने कहा— हे महाराज ! हे कृपासिन्धो ! आप दीनोंका उद्धार करते हैं । हे प्रभो ! हमें उस मन्त्रका अच्छी तरह उपदेश दीजिए । २३ ॥ श्रीरामदास कहते हैं हनुमान्जीके इस प्रकार विनय करनेपर रामने उन्हें एकान्तमें ले जाकर उनके कानमें 'श्रीराम' इस नामका उपदेश दिया । २४ ॥ हनुमान्जीने उस मन्त्रका उत्तम रीतिसे एक लाख जप करके दक्षिण दिशाको प्रस्थान किया ॥ २५ ॥ उसी मंत्रके प्रभावसे विविध प्रकारके जलजन्तुओंसे भरे दुगम सागरको पार करके वे लङ्का पहुंच गये । २६ । वहां बहुत खोज करनेपर भी सीताका पता न पाकर अशोक वनमें गये, तब वहां एक वृक्षके नीचे बैठी हुई सीताको दूरसे देखा । २७ ॥ सीताको देखकर उनका हृदय हर्षसे भर आया और तुरन्त उनके पास पहुंचकर प्रणाम किया । फिर दण्डकी तरह पृथ्वीमं लोट गये ॥ २८ ॥ उस समय हनुमान्जीने बच्चेके समान अपना एक छोटा सा रूप धारण कर रक्खा था । उनको पृथ्वीमें पड़े देखकर सीताने कहा--॥ २९ ॥ बच्चे ! तुम कहांसे आये हो ? कहां तुम्हारा घर है और तुम किसके बेटे हो ? हनुमान्जीने कहा कि सीता मेरी माता है और पिता श्रीरामचन्द्र हैं । इस समय मैं उन्हींके पाससे आ रहा हूँ ॥ ३० ॥ मेरा नाम हनुमान् है । आप इस अंगूठीको लीजिये । यह शुद्ध सुवर्णकी बनी हुई है और इसमें श्रीरामचन्द्रजीका नाम लिखा हुआ है ॥ ३१ ॥ जब सीताको यह ज्ञात हुआ कि यह मुद्रिका रामजीकी है तो वे बहुत प्रसन्न हुईं । सीता माताको प्रसन्न देखकर हनुमान्जीने कहा-माँ ! मुझे बड़ी भूख लगी है। इससे मेरा कष्ट हो रहा है । इस बगीचेमें मैं बहुत मीठे और दुर्लभ फल देख रहा हूँ॥ ३२ ॥ ३३। यदि

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