भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 663

सर्गः ७ ] मनोहरकाण्डम् ६४७


न शक्तिर्न च शक्यं ते कथं त्वं भक्षयिष्यसि ।

हनूमानुवाच
श्रीरामेति परो मन्त्रः शस्त्रं मे हृदयांतरे ॥ ३५॥
तेन सर्वाणि रक्षांसि तृणरूपाणि सांप्रतम् । इत्युक्त्वाऽथ तदीयाज्ञां गृहीत्वा वनभूरुहान् ॥ ३६॥
उन्मूलन चकराय श्रुत्वा रक्षांसि चाययुः । युद्धं च तुमुल जातं पश्चान्मन्त्रप्रभावतः ॥ ३७॥
दलितं राक्षसबलं दग्धा लंका हनूमता । पुनर्गेत्वाऽशोकवन सीतां नत्वा च मारुतिः ॥ ३८॥
तदलंकारमादाय रामचन्द्रं समाययौ । रामायालंकृतिं दत्त्वा तस्थौ तत्पादसन्निधौ ॥ ३९॥
रामोऽलंकृतिमादाय तच्छ्रुत्वा मुदितोऽभवत् । रामनामप्रभावोऽयं महाराज युधिष्ठिर ॥ ४०॥
तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र रामनामजपं कुरु ।

युधिष्ठिर उवाच
कथं जपो विधेयोऽस्य पुरश्चरणकं फलम् ॥४१॥
कथमूद्यापनं चैव सर्वमाख्याहि यत्नतः ॥४२॥

श्रीकृष्ण उवाच
अथवा पुस्तके लेख्यं स्मरणं हृदयेऽथवा । कोटिसंख्यापरिमितमथवा लक्षसंमितम् ॥४३॥
मंत्रा नानाविधाः सन्ति शतशो राघवस्य च । तेभ्यस्त्वेकं वदाम्यद्य तव मंत्रं युधिष्ठिर ॥४४॥
श्रीशब्दमाद्यं जयशब्दमध्यं जयद्वयेनापि पुनः प्रयुक्तम् ।
त्रिःसप्तकृत्वो रघुनाथनामजपो निहन्याद्द्विजकोटिहत्याः ॥४५॥
अनेनैव च मन्त्रेण जपः कार्यः सुमेधसा । लक्षसंख्य कृते तस्मिन्नुद्यापनविधिं चरेत् ॥४६॥


आप आज्ञा दें तो मैं थोड़ेसे फल तोड़कर खा लूँ । सीताने कहा— हे महावीर बालक ! इस बगीचेका मालिक रावण है ॥ ३४ ॥ तुममें कुछ भी शक्ति नहीं मालूम पड़ रही है । तब तुम किस तरह फल खाओगे ? हनुमान्‌जीने कहा कि मेरे हृदयमें 'श्रीराम'के नामका एक प्रबल शस्त्र है। उसके प्रभावसे लङ्काके सब राक्षस मेरे सामने तिनकेके बराबर हैं। ऐसा कह और सीताजीकी आज्ञा पाकर हनुमान्‌जी बगीचेमें घुस पड़े और पेड़ोंको उखाड़-उखाड़कर फेंकने लगे । यह समाचार सुनकर बहुतसे राक्षस आ गये और उनके साथ तुमुल युद्ध हुआ। किन्तु अन्तमें श्रीरामनाममन्त्रके प्रभावसे हनुमान्‌जीने उन सब राक्षसोंको मार डाला और लङ्का नगरीको भी जलाकर राख कर दिया । फिर लौटकर अशोकवनमें गये। वहाँ सीताको प्रणाम किया ॥ ३५-३८ ॥ फिर उनका अलंकार लेकर रामचन्द्रजीकी ओर लौट पड़े । रामके पास पहुँचकर उन्होंने वह अलंकार रामको दिया और उनके चरणोंके पास बैठ गये ॥ ३६ ॥ रामने वह अलंकार हाथमें ले लिया और सीताका समाचार सुना तो बहुत प्रसन्न हुए । हे युधिष्ठिर ! यह सब रामनामका माहात्म्य है ॥ ४० ॥ इसलिए हे राजन् ! तुम भी रामनामका जप करो । युधिष्ठिरने कहा हे कृष्ण ! इस रामनामके जप करनेका क्या विधान है ? इसका पुरश्चरण कैसे किया जाता है और उद्यापनकी क्या विधि है ? यह सब आप हमें अच्छी तरह समझाइए । श्रीकृष्णचन्द्रजीने कहा हे राजेन्द्र ! साधकको चाहिए कि स्नान करके किसी पवित्र स्थानपर बैठे और तुलसीकी मालपर रामनामका जप करे । अथवा किसी पुस्तकपर लिखे या हृदयमें स्मरण करे। जपकी संख्या एक करोड़ अथवा एक लाख होनी चाहिए । ४१-४३ ॥ वैसे तो रामचन्द्रजीके अनेक मन्त्र हैं, किन्तु उनमेंसे एक उत्तम मन्त्र मैं तुमको बतलाता हूँ ॥ ४४ ॥ पूर्वमें श्रीराम शब्द, मध्यमें जय शब्द और अन्तमें दो जय शब्दोंसे मिला हुआ ( श्रीराम जय राम जय जय राम ) राममन्त्र यदि इक्कीस बार जपा जाय तो वह करोड़ों ब्रह्महत्याओंके पापोंको नष्ट कर देता है ॥ ४५ ॥ बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि