श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 664, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६४८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७
जपाच्छतगुणं पुण्यं रामनामप्रलेखने । लक्षे लक्षे पृथक्कार्यमुद्यापनमनुत्तमम् ॥४७॥ उद्यापनविधानं च संक्षेपेण वदामि ते । पूर्वद्युरुपवासी स्याद्रात्रौ मण्डपिकोत्तरे ॥४८॥ रामलिङ्गात्मके भद्रे रामतोभद्रकेऽथवा । अष्टोत्तरसहस्रार्ये शतोत्तररुचेऽथवा ॥४९॥ धान्यराशौ मध्यदेशे कलशं स्थापयेत्ततः । तन्मुखे स्वर्णपात्रं वै वस्त्रस्रग्वाद्यशोभिते ॥५०॥ सीतालक्ष्मणसंयुक्तां राघवप्रतिमां शुभाम् । आमाषान्नपलपर्यन्तां सौवर्णी प्रतिमां यजेत् ॥५१॥ राजतीं वा ताम्रमयीं वित्ताच्छाठ्यं न कारयेत् । उपचारैः षोडशभिः पूजयेत्सुसमाहितः ॥५२॥ रामनामाङ्कितं हेमपत्रं तत्पुरतोऽर्चयेत् । कथां श्रुत्वा च विविधैर्देवदेवं क्षमापयेत् ॥५३॥ सापराधं च शरणं गतोऽस्मि निगतं हि माम् । दीनानाथ कृपाम्भोधि त्राहि संसारसागरात् ॥५४॥ रात्रौ जागरणं कृत्वा गानवाद्यैश्च मंगलैः । ततः प्रभातसमये स्नात्वा होमं समाचरेत् ॥५५॥ दशांशेनैव होमः स्यात्तद्दशांशेन तर्पणम् । गव्येन पयसा कार्यं राममंत्रेण यत्नतः ॥५६॥ सम्पादि च दशांशेन कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् । आचार्याय सवत्सां गां सालंकारां सवाससाम् ॥५७॥ भक्त्याऽर्पयेत्तम्सुवर्णां व्रतसम्पूर्त्तिहेतवे । अन्यानपि द्विजांस्तोष्य राज्यं लक्ष्मी मवाप्नुयात् ५८॥ पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् । नानादानानि तीर्थानि प्रदक्षिणरतानि च ॥५९॥ तानि सर्वाणि लक्षांशममान्यस्य भवन्ति च । निष्कामो वा सकामो वा यः कुर्याद्भक्तिसंयुतः ६०। तस्य सर्वेऽपि लक्षांशममान्यस्य भवति च । लिखित्वा पुस्तकं वापि वरं रामायणस्य च ॥६१॥ एवमुद्यापनं कार्यं श्लोकसंख्यादशांशतः । पूर्ववद्धवनं कार्यं तद्दशांशाच्च तर्पणम् ॥६२॥
उसी मन्त्रका जप करे और जब जपकी संख्या एक लाख हो जाय तब उद्यापन करे ॥४६॥ जपकी अपेक्षा सौगुना अधिक पुण्य रामनामके लिखनेमे है। साधकको चाहिये कि जब जब रामनामकी लेखनसंख्या पूरी एक लाख हो जाय, तब तब उद्यापन करे । ४७ ॥ अब संक्षेपमें उद्यापनकी भी विधि बतलाता हूँ। जिस दिन उद्यापन करना हो, उस दिनके एक दिन पहले उपवास करे और रात्रिके समय उद्यापनके लिये बनायी हुई मण्डपिकामें या रामलिङ्गात्मक भद्र तथा रामतोभद्र, अष्टोत्तरसहस्रार्य्य या अष्टोत्तरशतसार्य्य भद्रमें धान्यराशि स्थापित करके उसके मध्यमें कलश रक्खे । कलशके मुखपर एक स्वर्णपात्र रखकर उसपर सुन्दर कपड़ा ओढ़ावे और सीता-लक्ष्मणके साथ साथ रामकी शुभ प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमा कमसे कम एक मासे सोनेकी होना चाहिये ॥ ४८-५१ ॥ यदि सुवर्णकी प्रतिमा न बन सके तो चांदी या तांबेकी बनवा ले। किन्तु कंजूसी करना ठीक नही है। प्रतिमा स्थापन करनेके अनन्तर षोडश उपचारोंसे उसकी पूजा करे ॥ ५२ ॥ रामनामसे अंकित सुवर्णपात्र प्रतिमाके सामन रखकर उसकी भी पूजा करे और भगवान्की कथा सुनकर क्षमा-प्रार्थना करे ॥ ५३ ॥ फिर कहे—हे दीनानाथ ! हे अनाथनाथ ! हे कृपाम्बिन्धो ! मैं बड़ा अपराधी हूँ, किन्तु आपका अत हूँ। मुझे इस संसार-सागरसे उबारिए ॥ ५४ ॥ रातभर गान और बाजे आदिके साथ जागरण करे और सबेरे उठे तो स्नान आदि नित्यकर्मोंसे निबटकर होम करे । ५५ ॥ जितना जप करके पुरश्चरण किया गया हो, उसका दशांश हवन और हवनका दशांश तर्पण करना चाहिये। तर्पण गोके दूधसे करनेका विधान है ॥ ५६ ॥ तदनन्तर तर्पणका दशांश ब्राह्मणभोजन कराये और व्रत पूर्ण करनेके लिए आचार्यको वस्त्राभूषणसे अलंकृत एक सबत्सा गौ दे ।। ५७ । आचार्यके अतिरिक्त जो और-और ब्राह्मण आये हों, उन्हे भी प्रसन्न करे। ऐसा करनेसे प्राप्ताको राज्य एवं लक्ष्मीकी प्राप्ति होता है ॥ ५८ ॥ जो पुत्र चाहते हों, उन्हें पुत्र ओर जो धन चाहते हों, उन्हे धनकी प्राप्ति होती है। संसारमे जितने दान, तीर्थ, प्रदक्षिणा तथा तपस्यायें हैं, वे सब इस दतक लक्षांशके बराबर हैं। जो मनुष्य निष्काम या सकाम भावसे भक्तिपूर्वक यह व्रत करता है, उसकी सब कामनायें पूर्ण हो जाती हैं। यदि इस आनन्दरामायणकी पुस्तक लिखकर किसी विद्वान् ब्राह्मणको दी जाय तो उसके पुण्यका तो किसी तरह वर्णन ही नही किया जा सकता ॥ ५६-६१ ॥ इसके उद्यापनका विधान एक इस प्रकारका हुआ। दूसरा प्रकार यह है कि आनन्दरामायणकी जितनी श्लोकसंख्या है,