भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ७ ] मनोहरकाण्डम् [ ६४९

तस्यापि च दशांशेन कुर्याद्विप्रान्नभोजनम् । पूर्वश्लोकेन वाऽन्येन हवनादि प्रकीर्तितम् ॥६३॥ अथवा ग्रन्थश्लोकानां दशांशैर्हवनं स्मृतम् । अथाऽग्रे वक्ष्यमाणरीत्या वै शकुनस्य च ॥६४॥ श्लोकं निष्कास्य वै ग्रन्थादाचरेद्धवनादिकम् । अथवा रामगायत्र्या राममंत्रैस्तु वाऽऽचरेत् ॥६५॥ हेमपत्रे त्वेक एव लेख्यः श्लोकः शुभावहः । अर्चयित्वा पूर्वोक्तैश्च हेमपत्रे संविलिख्य ॥६६॥ राममूर्तेः पुरः स्थाप्य सर्वं तद्गुरवेऽर्पयेत् । श्रीरामकवितां कृत्वा स्वीयमुद्यापनं नरैः ॥६७॥ अवश्यमेव कर्तव्यं कविताफलमीप्सुभिः । देवालयान्नशालानां वृक्षाणां वापिकूपयोः ॥६८॥ सर्वाषामपि पण्यानां विद्ध्यर्थं गेहिनां नृणाम् । काव्यानां च कवीनां च पद्यादीनां च सर्वशः ॥६९॥ राजप्रासादवास्तूनां नामकर्म विधीयते । विना स्वर्णोपदेशेन स्थावराणां विधानकम् ॥७०॥ कृत्वा नामक्रमन्तत्र कार्यमुद्यापनं ततः । लघुपूष्पैः पूजनादि यच्चच्छ्रीराघवस्य च ॥७१॥ सर्वोपायं कुरु तस्य कार्यमुद्यापनं वरम् । एवं राजन् मया सर्वं तवाग्रे विनिवेदितम् ॥७२॥ रामनामप्रभावेण स्वीयं राज्यं लभिष्यसि ।

श्रीरामदास उवाच

युधिष्ठिरस्तु तच्छ्रुत्वा करिष्यति यथाविधि । ७३॥ मासत्रयेण संप्राप्य राज्यप्राप्तिर्भविष्यति । अन्ते च परमं स्थानं गमिष्यति मनोर्बलात् ॥७४॥ एवं कथा भविष्या च तवाग्रे विनिवेदिता । रामनाममहिमानमियं नरः शृणोति यः ॥७५॥ परमभक्तिसमेतः पुत्रपौत्रजनैस्सहैव । भुवि सुखं प्राप्नुयात्परमं मोक्षपदं तु सः ॥७६॥ नित्यं व्याख्यां श्रीरामाग्रे कर्तव्याऽतीवभक्तितः । आनंदरामचरितस्याऽप्यन्यस्य विस्तरात् ॥७७॥ सर्गस्य वाऽर्धसर्गस्य पादसर्गस्य वा तथा । नवश्लोकमितं वापि श्लोकमात्रस्य वा तथा ॥७८॥


उसके दशांशसे हवन करे । हवनका दशांश ब्राह्मणभोजन कराये, यह उद्यापनका दूसरा प्रकार हुआ । अब तीसरा प्रकार बतलाते हैं । आगे बतलाये जानेवाले क्रमके अनुसार इस ग्रन्थमें उतने श्लोक निकालकर हवन आदि करे । अथवा रामगायत्री या राममन्त्रसे हवन आदि करे ॥ ६२-६५ ॥ सुवर्णके पत्रपर केवल एक श्लोक या पूर्वोक्तविधि विन्मुख रीतिसे कई श्लोक लिखकर उसकी पूजा करे और अनन्तर उसे गुरुको अर्पण कर दे । अथवा रामचन्द्रजीके विषयकी कोई एक कविता बनाकर उद्यापन करे, ६६ । ६७ ॥ जिन लोगोंको कविताका फल पानेकी इच्छा हो, उन्हें तो उद्यापन अवश्य करना चाहिए । कोई देवालय, अन्नशाला तथा अश्वशाला बनवाने समय, वृक्ष लगाते समय, बापी व कूपकी प्रतिष्ठाके समय, किसी पुरुष या स्त्रीके विवाहके समय यह उद्यापनविधि अवश्य करनी चाहिये। इनके अतिरिक्त कविता या काव्य बनानेके समय और राजप्रासादके निर्माणके बाद भी उद्यापन करना आवश्यक है । उद्यापनके अनन्तर रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेके लिये जैसा कि पीछे बतला आये हैं, उसके अनुसार एक लाख पुष्पोंसे रामकी पूजा करे । इसके सिवाय जो श्रीरामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेके लिये जो जो साधन बतलाये गये हैं उन्हें उद्यापनके समय अवश्य करे । इस प्रकार हे राजन् ! मैंने आपके समक्ष उद्यापनकी विधि बतलायी ॥ ६८-७२ ॥ यदि ऐसा करेंगे तो इसमें कोई संशय नहीं है कि रामनामके प्रभावसे आप अपने खोये हुए राज्यको फिर वापस पा जायेंगे ।

श्रीरामदास कहते हैं- श्रीकृष्णजीकी बतलायी हुई रीतिके अनुसार युधिष्ठिर तीन मास तक इस व्रतका विधान करनेसे अपना राज्य फिर पा जायेंगे और उसी मंत्रके बलसे अन्तमें परमधामको प्रस्थान करेंगे ॥ ७३ ॥ ॥ ७४ ॥ हे विष्णुदास ! मैंने तुम्हें यह भविष्यकी कथा बतलायी है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस रामनामकी महिमाका श्रवण करता है वह संसारमें जबतक रहता है तबतक पुत्रपौत्र आदि सांसारिक सुखोंको भोगता है और अन्तमें मोक्षपद प्राप्त करता है ॥ ७५ । ७६ ॥ रामचंद्रका चाहिये कि प्रतिदिन श्रीरामचन्द्रजीके सामने इस आनंदरामायण अथवा किसी दूसरे रामचरित्रकी भक्तिपूर्वक विस्तारसे व्याख्या किया करे ॥ ७७ ॥ यह आवश्यक नहीं कि व्याख्या ग्रन्थके अधिक अंशकी हो । वह चाहे एक सर्गकी,