श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 666, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६६० आनन्दरामायणे [ सर्गः ७
श्लोकार्धं श्लोकपादं वाऽऽनंदरामायणस्थितम् ये पठंति नरा नित्यं ते नरा मुक्तिभागिनः । ७९॥ अश्वत्थवृक्षमूले मुनिवृक्षमूले तथा तुलस्याश्च समीपदेशे । पुण्यस्थले भास्करभूसुराग्रे श्रीरामचन्द्रस्य पुरः सदैव ॥८०॥ तथा सभायां द्विजवृन्दमध्ये नद्यास्तटे वा रघुनायकस्य । आनन्दरामायणमादरेण पठंति धन्या भुवि मानवास्ते । ८१॥ रामायणं लिखित्वा तु दातव्यं भूसुराय हि । समग्रं वा काण्डमेकं सर्गो वाऽनिसुपुण्यदः । ८२॥ सर्गस्त्वेकः प्रत्यहं हि लिखित्वा भूसुराय हि संपूज्य देयश्चानंदरामायणसमुद्भवः ॥८३॥ अशक्तेन नव श्लोकाः सदा देया विलेख्य च श्रीमदर्थे रामचन्द्रस्य विप्रेभ्यः परिवूज्य वै ॥८४॥ नित्यदानमेतदेव कर्तव्यं सर्वदा नरैः, नित्यं सुवर्णमुद्राया दानेन यत्फलं स्मृतम् ॥८५॥ तत्फलं प्रत्यहं सर्गदानेन लभ्यते नरैः । नानेन सदृशं दानं राघवस्यानितोषदम् । ८६॥ तस्मादवश्यमेवैतद्दानं कार्यं निरंतरम् श्री रामचन्द्रार्थं नवपूणफलेप्सुधा । ८७। नागवल्लीदलैर्नवैः सोपचारकैः पृथङ्नवभूसुरेभ्यो देयो नित्यं सदक्षिणः । ८८। अशक्तेनैक एवापि देयस्तांबूल उत्तमः । न तांबूलसमं दानं किंचिदस्ति जगत्त्रये ॥८९॥ ताम्बूलः शुद्धिदः प्रोक्तस्ताम्बूलो मंगलप्रदः । ताम्बूलः श्रीकरो ज्ञेयस्तांबूलो रामवल्लभः । ९०॥ तस्मात्प्रयत्नतस्त्वद्य देयस्तांबूल उत्तमा । सदा रामं पूजयेच्च सदा रामं विचिंतयेत् । ९१॥ श्रीरामस्मरणं नित्यं कार्यं भक्त्या सुदुर्लभः यस्य वण्यां गमनाम हस्तौ पूजनतत्परौ । ९२। श्रीरामचरितान्येव श्रोतुकामा च यच्छ्रुतिः रामतीर्थानि गंपेशात् रामक्षेत्राणि यानि च ।९३॥ यद्रङ्गी गन्तुकामो तु गमपूजोत्सवान् वगान् । सदृन्द्रकामी यच्चक्ष्री स धन्यः पुरुषः स्मृतः ॥९४॥
आधे सर्गकी, सर्गके चतुर्थांशकी, नौ श्लोकोंकी, केवल एक श्लोककी, आधे श्लोककी, आधे या चौपाई श्लोककी जैसे बने व्याख्या अवश्य करता जाय । जो लोग नित्य ऐसा करते हैं, वे मनुष्य अवश्य मुक्तिके भागी होते हैं । ७८ । ७९ । जो लोग पीपलके नीचे, अगस्त्य वृक्षके नीचे, तुलसीके पास, किसी पवित्र स्थानमे, सूर्यदेव या ब्राह्मणके सामने अथवा रामचन्द्रके समक्ष किसी सभामें, ब्राह्मणोंकी मण्डलीमे या नदीके तटपर जो लोग आनन्दरामायणसे लिखे हुए चरित्रका पाठ करते हैं वे मनुष्य धन्य हैं । ८० ॥ ८१ ॥ समग्र एक काण्ड अथवा एक सर्ग आनन्दरामायण लिखकर यदि किसी ब्राह्मणको दिया जाय तो बड़ा पुण्य होता है । रामके उपासकको चाहिये कि नित्य एक सर्ग आनन्दरामायण लिखकर उनकी पूजा करे और किसी ब्राह्मणको दान दे दे ॥८२॥८३॥ यदि पूरा सर्ग लिखनेमे असमर्थ हो तो रोज केवल नौ श्लोक ही लिखकर उसकी पूजा करे और रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेके लिये विप्रको दान दे दिया करे । ८४। लोगोंको चाहिय कि और दान के चक्करमें न पड़कर सर्वदा इसीका दान दिया करें । नित्य सुवर्णकी मुद्रा दान करनेमें जो फल मिलता है, वही फल केवल एक सर्ग आनन्दरामायण लिखकर दान देनेसे प्राप्त होता है। रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाला इससे बढ़कर और कोई भी दान नहीं है । ८५ ॥ ८६ ॥ अतएव निरन्तर अवश्यमेव इसका दान करना चाहिए । अथवा रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेके लिए नौ सुपारी अथवा अन्य द्रव्यओ और दक्षिणाके साथ नौ पानके पत्ते नौ ब्राह्मणोंको दान दिया करे । यदि ऐसा न कर सके तो केवल एक ताम्बूलदान दिया करे । क्योकि तीनो लोकोमे ताम्बूलदानके बराबर और कोई भी दान नही है । ताम्बूल शुद्धि देनेवाल, मङ्गलप्रद, लक्ष्मीको बढ़ानेवाला और रामचन्द्रको प्रिय है ॥ ८७-९० । इसीलिये लोगोको चाहिय कि प्रयत्न करके उत्तम ताम्बूलका दान करें, सदा सब लोग रामकी पूजा करें रामका ध्यान करें और रामका स्मरण करें । जिनकी वाणीमे रामनाम विराजमान है, जिसके हाथ रामकी पूजामें लगे हुए हैं, जिसके कान रामका गुणानुवाद सुननेमें लगे है, जिनके पांव रामेश्वर रामतीर्थ और रामक्षेत्रम जात रहत है और जिनके नेत्र रामपूजनोत्सव देखनेमे लगे