श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 668, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६६२ | आनन्दरामायणे | [सर्गः ७ |
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राममुद्रा धारणीया गोपीचन्दनमिश्रिता। राममुद्रा महाश्रेष्ठा सर्वदोषनिकृन्तनी ॥१११॥
सदा देहे संधार्या गोपीचन्दनमिश्रिता। राममुद्राऽस्ति यद्देहे न पापं स्पृशते न हि ॥११२॥
स्तुतिः सर्वै रामस्य स्नातैः कार्या न्वहर्निशम्। प्राचीनैश्च नवीनैश्च स्वबुद्ध्या रचितैरपि ॥११३॥
स वाग्विसर्गो जनताऽघविप्लवो यस्मिन्प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि।
नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि यच्छृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः ॥११४॥
कवित्वमन्यच्छुद्धं च रामनाम्नाऽङ्कितं च यत्। तज्ज्ञेयमतिशुद्धं च श्रवणात्पातकपहम् ॥११५॥
यस्मिन् रामस्य कृष्णस्य चरित्राणि महान्ति च। कवित्वे तच्छ्रवणधर्मं सदा गेयं महत्तमैः ॥११६॥
शृणु शिष्य तवाग्रेऽद्य वद्म्यहं किंचिदद्भुतम्। कवित्वविषयं यच्च सर्वसंदेहनाशकम् ॥११७॥
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सर्वेते चिरजीविनः ॥११८॥
एवं यद्वचनं शिष्य प्रोच्यते सर्वदा बुधैः। तदग्रे सर्वदा मत्यं ज्ञेयं कलियुगेऽपि च ॥११९॥
येषु मन्त्रबलं भव्यं वर्ततेऽत्र नरेषु हि। अश्वत्थाम्नोंऽशभूतास्ते ज्ञेयाश्च पुरुषा भुवि ॥१२०॥
न्यायोपार्जितद्रव्येण राज्यं कुर्वन्ति धर्मतः। बल्यंशास्तेऽत्र तथा ज्ञेया जना जगतितले ॥१२१॥
रामस्तुतिं कवित्वे ये चरित्रं वर्णयन्ति च। व्यासांशभूतास्ते ज्ञेया मानवा जगतितले ॥१२२॥
ये ये वीरास्त्वथ भूम्यां वायुपुत्रांशजास्त्विह। नैते ज्ञेया मरणधर्मा चिरजीवित्वसूचकाः ॥१२३॥
ये ये शांता रामभक्ताः मन्यत्र मानवा भुवि। विभीषणांशभूतास्ते ज्ञेयाश्च सकलैर्जनैः ॥१२४॥
ये धैर्यवन्तो योद्धारः मन्यत्र मानवा भुवि। कृपाचार्यांशभूतास्ते ज्ञेयाः सर्व बुधैः सदा ॥१२५॥
ये वीराः क्रोधयुक्तास्तेऽत्र सर्वऽवनीतले। जामदग्न्यांशभूताश्च सदा ज्ञेया नरोत्तमैः ॥१२६॥
दोषोंको नष्ट करती है। अतएव ललाट, गुह्यस्थान, दोनों कुक्षि, उदर, हृदय, दोनों भुजाओं और मस्तक इन स्थानोंमें भी राममुद्राओंको धारण करना चाहिए । ११० । १११ । ये मुद्रा धारण करना परमावश्यक है। क्योंकि जिसक शरीरमें राममुद्रा विद्यमान रहती है उस किसी प्रकारका पातक नहीं लगता । ११२ ॥ उपासकोंको यह भी उचित है कि विविध प्रकारके पदों द्वारा रामचन्द्रजीके स्तुतगान करें। वे श्लोक प्राचीन हों, नवीन हों या अपनी बुद्धिसे बनाये गये हों ॥ ११३ ॥ रामके यशसे अङ्कित शास्त्रोक्त गुणानुवादसम्बन्धी वचनोंका प्रवाह प्राणियोंके महान् पातकोंका भी वहन करता है। अतः उस ग्रन्थको मन, गाय और मनन करें । रामके नामसे अङ्कित कविता चाहे अतिशय अशुद्ध हो, फिर भी उसे अतिशुद्ध समझना चाहिये। उसके सुननेसे सब तरहके पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ ११४ । ११५ ॥ जिस कवितामें राम और कृष्णके महान् चरित्रोंका वर्णन किया गया हो, वह अत्यन्त पवित्र होती है। बड़े लोगोंको चाहिये कि सदा ऐसी कविताका गान करें ॥ ११६ ॥ श्री रामदासजी विष्णुदाससे कहते हैं-हे शिष्य ! अब मैं तुम्हारे आगे सब प्रकारके सन्देहोंको निवृत्त करनेवाला एक गुप्त कविताका विषय कह रहा हूँ । ११७ ॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान्, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम ये सात चिरञ्जीवी हैं ॥ ११८ ॥ प्रायः पण्डित लोग इस बातको कहा करते हैं। इसे इस कलियुगमें भी सत्य ही मानना चाहिए । ११९ ॥ इस पृथ्वीपर जिन लोगोंके पास मन्त्रबल विद्यमान है, उनको अश्वत्थामाका अंश समझना चाहिए ॥ १२० ॥ जो राजे न्यायोपार्जित द्रव्यसे धर्मपूर्वक राज्य करते हैं, उनको इस संसारमें बलिके अंशसे उत्पन्न समझना चाहिये ॥ १२१ ॥ जो लोग कविता करते हुए रामकी स्तुति करते या उनके चरित्रोंका वर्णन करते हैं, जगतीतलमं उन मनुष्योंके व्यासके अंशसे उत्पन्न मानना चाहिये ॥ १२२ ॥ इस भूमण्डलपर जो जो वीर हैं वे सब हनुमान्जीके अंशज हैं। ओर केवल यही हुए तुम ही इस प्रकारके समुदायोक चिरञ्जीवित्वकी सूचना देते रहते हैं ॥ १२३ ॥ इस पृथ्वीमें जितने शान्त रामभक्त हैं उन्हें सब लोग विभीषणके अंशसे उत्पन्न समझें । १२४ ॥ इस संसारमें जो धैर्यके साथ युद्ध करनेवाले लोग हैं, उन्हें कृपाचार्यके अंशसे उत्पन्न समझना चाहिये ॥ १२५ ॥ इस पृथ्वीमण्डलमें जितने क्रोधी वीर हैं, उन सब लोगोंको