भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 669, कुल 811 में से

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पृष्ठ 669

सर्गः ८] मनोहरकाण्डम् ६६३


चिरंजीवीति व्यासः कः कथं ज्ञेयो जनैर्भुवि । तस्य स्वरूपं वक्ष्यामि सावधानमनाः शृणु ॥ १२७॥
ये गीर्वाण्या कवित्वानि करिष्यन्त्यवनीतले । व्यासांशभूतास्ते ज्ञेयाः पंडिता मानवास्त्विह ॥१२८॥
ये रामचंद्रं कृष्णं च शिवं स्तुत्या स्तुवंति हि । वर्णयंति चरित्राणि ते ज्ञेया व्यासमूर्तयः ॥१२९॥
ये राजानं च गणिकां नारीं राज्ञः सभां तथा । नरं स्तुवंति स्तुत्या ते न ज्ञेया व्यासमूर्तयः ॥१३०॥
यावद्भूत्यां तु रामस्य चरित्राणि स्तुवीत हि । तावत्स स्यन्नरो व्यासमन्ते मुक्तिं गमिष्यति ॥१३१॥
किं फलं कस्य पाठस्य पङ्क्तेरपि तदधुना । शृणु स्वस्थमना शिष्य विस्तरेणोच्यते च यत् ॥१३२॥

इति श्रीमदानंदरामायणे मनोहरकांडे रामदासवरबोधनादिदर्शनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

(वेदादिकोंकी फलश्रुति)

श्रीरामदास उवाच

शिरोध्वाहूतिसंयुक्ता गायत्री परिकीर्तिता वेदाक्षराणां तुल्या सा भवेत्सुविधि पङ्गता ॥ १ ॥
चतुःशतेन गायत्र्याः समिह परिकीर्तितम् । पावमानं महासूक्तं षट्सहस्रं समुच्यते ॥ २ ॥
तथोपनिषदः पुण्या गायत्र्यक्षरसंख्यया प्रोच्यते पुण्यदं लोके पुण्यं फलानि यान्तः ॥ ३ ॥
सहितापाठतः प्रोक्तं द्विगुणं पदपाठतः । त्रिगुणं क्रमपाठे स्याज्जटापाठे तु षड्गुणम् ॥ ४ ॥
महाभारतपाठस्तु वेदतुल्यः प्रकीर्तितः । पुराणानां तदर्धेन स्मृतीनां च तथोच्यते ॥ ५ ॥
भारते भगवद्गीता तथा नामसहस्रकम् । गायत्र्याश्च समं प्रोक्तं पुण्ये पापक्षयेऽपि च ॥ ६ ॥
पाठेन यत्फलं प्रोक्तमर्थज्ञानाच्चतुर्गुणम् । सद्भक्तेभ्यः श्रवणाच्च पुण्यं दशगुणं स्मृतम् ॥ ७ ॥


परशुरामके समान उत्पन्न समझना चाहिए ॥ १२६॥ चिरञ्जीवी व्यासको इस संसारमें कैसे पहचानना चाहिए। इसके लिए उसका स्वरूप बतलाते हैं, तुम सावधान होकर सुनो ॥ १२७॥ जो-जो लोग संस्कृत वाणीमें कविता करेंगे, वे पण्डित पुरुष व्यासके अंशसे उत्पन्न माने जायेंगे ॥ १२८॥ जो लोग रामचन्द्र, कृष्णचन्द्र तथा शिवजीकी स्तुतिपूर्वक या उनके चरित्रका वर्णन कर उनको व्यासकी साक्षात् मूर्ति समझना चाहिये ॥ १२९॥ जो लोग राजा, गणिका, स्त्री, राजसभा तथा किसी व्यक्ति-विशेषकी स्तुति करते हैं, वे व्यासका मूर्ति नहीं माने जा सकते ॥ १३०॥ इस पृथ्वीपर प्राणी जबतक रामकी स्तुति करता है, तबतक वह व्यास कहा रहता है और अन्तमें मुक्तिपद प्राप्त करता है ॥ १३१ ॥ किसी ग्रन्थका पाठ करनेसे क्या फल होता है, अब मैं इस बातको बतलाऊँगा। हे शिष्य ! तुम स्वस्थ मन होकर सुनो, मैं विस्तारपूर्वक बतलाता हूँ ॥ १३२ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहित मनोहरकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

श्रीरामदास कहने लगे—वेदको शिरोवाहूतिसे युक्त सौ अक्षरोंवाली गायत्री कही गयी है ॥ १ ॥ चार सौ गायत्रीके बराबर पावमान नामक महासूक्त है, जिसमें छः सौ ऋचाओंका समावेश किया गया है ॥ २॥ गायत्रीकी अक्षरसंख्याके अनुसार उपनिषदोंके पाठसे पुण्य प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ सहितापाठकी अपेक्षा दुगुना पुण्य पदपाठ करनेमें है। क्रमके पाठ करनेमें तिगुना पुण्य है और जटाके पाठसे छगुना पुण्य होता है ॥ ४ ॥ महाभारतका पाठ वेदपाठ सदृश होता है । पुराणोंका पाठ आधे वेदपाठका पुण्य देनेवाला है और उससे भी आधा पुण्य स्मृतियोंके पाठसे होता है ॥ ५॥ महाभारतके अन्तर्गत भगवद्गीता और विष्णुसहस्रनाम, ये दोनों गायत्रीके समान पुण्यदायक एवं पापनाशकारी माने गये हैं ॥ ६ ॥ पाठसे जितना पुण्य होता है, उससे चौगुना पुण्य उसका अर्थ समझनेसे होता है और अच्छे-अच्छे भक्तोंको सुनानेसे दसगुना पुण्य प्राप्त होता

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