श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 670, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८
भूमिदानं यथा लोके महादानप्रकीर्तितम् । अन्नदानं बहुगुणं ततोऽपि स्यात्फलप्रदम् ॥ ८ ॥ ऋषय ऊचुः कथं दानं प्रकर्तव्यं सुवर्णस्य परस्य च । कथं वा पात्रपात्रेति प्राप्तव्यश्वेत्यरोचथाः ॥ ९ ॥ श्रीरामदास उवाच वसन् गुरुकुले यस्तु विद्यामभ्यास्यो धीमतः । अधीत्य शाखां पूर्णां स गयायां लभते फलम् ॥१०॥ शिष्यस्याध्यापकश्चैव संहितां पाठयेत्ततः । यदक्षरं तु गायत्रीमहापाठफलं लभेत् ॥११॥ पदपाठे कृते स्यात्तद्वृद्धं रूपद्वयात् । संहितायां द्वितीयेन गयापाठफलं स्मृतम् ॥१२॥ ततोऽप्युपरिवन्पाटीत्रिगुणं फलमाप्नुयात् । पदं च पठतस्तूर्णं फलं वै सुमहद्भवेत् ॥१३॥ अथाष्टाविंशद्गुणयुक्तं फलं वै गयापाठतः । परे लेख्यप्रदानेन फलमुक्तं मनीषिभिः ॥१४॥ अधीत्याऽपि न यः स्वयं कल्पद्रुमं ... । कल्पद्रुमाह्वयं क्षेत्रं स पश्येत्पाठतः परम् ॥१५॥ प्रहायान्यं विनाऽनुचिन्तादप्रज्ञामबुद्धिमान् । अनभ्यासवशात्प्राज्ञः शूकराकारतां व्रजेत् ॥१६॥ यावद्वेदेष्वथ प्रोक्ता चरणा विप्रपुंगवैः । तावद्दिनानि स्वर्गे च निवसेद्ब्राह्मणोत्तमः ॥१७॥ पाठयत्यक्षरमेकं त्वन्यस्मै यो द्विजोत्तमः । तावद्वर्षसहस्राणि वैकुण्ठे निवसेद्ध्रुवम् ॥१८॥ प्रत्यक्षरं न जानीते पाठ्यमानेऽनुशिक्षितः । यद्विद्यावेत्तृसंसर्गात्पापहन्ता भवेद्ध्रुवम् ॥१९॥ शिक्षयत्यनुगो विप्रस्तद्विद्वन्कण्ठगं मुहुः । विनाऽनुभावतो राजन् रामभक्तिविना तथा ॥२०॥ क्रमेणैव समं तस्मात्पाठयेत्प्रत्यहं मुहुः । ज्ञानं विनाऽध्यापनं नाम तत्फलं निष्फलं स्मृतम् ॥२१॥ पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या वेताश्वबुद्धयः । अनुगता विना भक्तिं तेऽपि व्यर्था भवन्ति हि ॥२२॥
है, जिस तरह कि संसारमें भूमिदान एक महान् दान माना जाता है, किन्तु अन्नदानका बहुत फल ... ब्राह्मणोंने पूछा हे मुने ! सुवर्ण दान किस तरह करना और किसको देना चाहिये ... ! इसका उत्तर जानिए ... ... जो शिष्य ... और वेदका अध्ययन करता ... लभ्य कर लेता है ... फल मिलता है ॥१०॥ संहिताका अध्ययन कराता है उस मन्त्रके जितने अक्षर हैं ... गायत्रीके महापाठके बराबर फल पाता है ॥११॥ पदपाठमें उसका फल दूना ... और संहिताके द्विवचन में दुगुना मिलता है ॥१२॥ गयापाठसे भी ... फल प्राप्त होता है। और वारंवार ... फल मिलता है ॥१३॥ गयापाठसे अठ्ठाईस ... फल प्राप्त होता है। इससे भी आधा फल उसे प्राप्त होता है, जो किसी वृद्ध पुस्तकको लिखता है। ऐसा प्राचीन मुनियोंने कहा है ॥१४॥ जो ब्राह्मण विद्याका अध्ययन करके भी उपयोग करके अध्ययन नहीं करता उसे केवल पातकलेपारोपण प्राप्त होता है और वह नरकको जाता है ॥१५॥ जो मनुष्य बुद्धि रहता हुआ भी पढ़ी हुई श्रुतियोंको अनभ्यासके कारण भुला देता है वह मरनेके बाद सूअरका जन्म पाता है ॥१६॥ पढ़कर भी वेदोंके जितने चरण वह ब्राह्मण सुनता है उतने दिन तक वह स्वर्गमें रहेगा इसमें पुण्यवान् अजित लोकमें जाकर निवास करता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है। अपने घरकी चरन का अध्ययन करके जो ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मणोंको सुनाता है वह मन्त्रके प्रत्येक अक्षरसे अर्जित फलको पाकर निवास करता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है। अपने ब्राह्मणका अध्ययन करके भी जो यह नहीं जानता कि इसका कितना महत्त्व है वह रामका पूजन करता हुआ भी पूजनके आधे फलको पाता है। जो प्राणी रामकी भक्तिसे रहित केवल अध्यापनशील है वह उस पाठनके बहुव्यथा फलका भागी होता है जो अध्यापक गम्से दंभ रखता है, उसका अध्यापन कार्य भी व्यर्थ ही होता है। चारों वेद, वेदांग, मीमांसा, न्याय, पुराण तथा