श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 671, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ८ ] मनोहराकाण्डम् ३५५
उपविद्यास्ततः स्युश्चेत्यष्टादश स्मृताः। शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोज्योतिषम् २१।।
इत्यंगानि तु वेदस्य योऽधीते तत्फलं शृणु । महिनापाठपाठेऽर्धं लभते पाठकः फलम् ।। २२ ।।
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य कल्पः पाणी प्रकीर्तितौ । मुखं व्याकरणं प्रोक्तं निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ।। २३ ।।
ज्योतिषं नयनं प्रोक्तं छन्दः पादाविति स्मृतौ । शिक्षा ... ... ... ।।
सहस्रेण प्रकुर्वन्ति फलं तेषां चतुर्गुणम् । ... ... ।। २७ ।।
सहिनापाठतः पुण्यं संहितज्ञो लभेत् फलम्। ज्योतिष्के चापि निष्णातः ... २८।।
जातकप्रश्नमात्रेण न किञ्चत्पुण्यमीयते। वेदान्तरं गतो यो ... २९।।
न वेत्ति गणितं यस्तु ज्ञेयो नक्षत्रसूचकः। दानं नार्हति विप्रस्तु स ... ३०।।
हस्तमात्रमपि ह्यङ्गानां साङ्गां योऽधीत्य हि द्विजः। श्रोत्रियस्त्वन्यशाखासु न स ... ३१।।
किञ्चिदध्यापयन्धीरो यथोक्तितपसः पठेत्। ज्ञानाधिक्यात्पुण्यं वदन्त्यतः ... ।।३२।।
अधीत्य ज्ञानतः साङ्गमपुण्यं लभते महत् । ज्ञानतो ... पुण्यवान् जनाः ।। ३३ ।।
ज्ञानाधिक्येषु ननु स्थानपात्रताया विचारणा । पुनः कायेन च पाठनौ न भविष्यतः । ३४ ।
न निष्पाठात् श्रियं याति पुण्याधिको न संशयः। उपलभ्येत ज्ञानं ताच्छ्रुतिमत्त्वेऽपि सम्भवेत् ॥ ३५ ।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । ज्ञानवान् राघवेन्द्रस्य प्रीतिपात्रं त्वयम्तः ॥ ३६ ॥
परं वादिनये शक्तिर्यस्य पराभवेत् पुनः। ... पाठकानां शतं वरम् ।। ३७ ।।
वेदादिविद्याविद्यानामर्थज्ञानाय यः पठेत् । स तु व्याकरणं च स लभेद्देदसम् फलं ।। ३८ ।।
ज्ञानाधिक्येन लभते वेदाध्ययनजं फलम् । समाया द्विविधा प्रोक्ता कर्मणो ब्रह्मबोधता ।। ३९ ।।
... चौदह विद्याएं हैं - आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्व और अर्थशास्त्र ॥ १६-२१॥ ये चार उपविद्याएं हैं-शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष ये छःवेदके अंग हैं। इनके अध्ययनका जो फल होता है, उसे सुनो। इसका पाठ करनेसे संहितापाठका आधा फल मिलता है ॥ २१ ॥ २२ ॥ वेदकी नासिका शिक्षा, कल्प दोनों हाथ, मुख व्याकरण, निरुक्त कान, ज्योतिष नेत्र और छन्द, वेदके पैर हैं। जो शिक्षा, कल्प, निरुक्त तथा छन्द इनका अर्थ समझके लिए उद्योग करते हैं, उन्हें वेदपाठका चतुर्गुण फल प्राप्त होता है। वेदका पाठ करनेपर संहिताज्ञ इसके पूर्वोक्तनका श्रो फल मिल जाता है ॥ २५ ॥ । २६ । २७ ।। पण्डितका ज्ञानवान् विद्वान् मदि उसका पुण्य पाता है। संहिताकी ज्ञान फलम् आदिव- शास्त्रके अध्ययनका आधा पुण्य मिलता है ।। २८ ।। किन्तु ज्योतिषम भी जो विद्वान् केवल जातकका प्रश्न-मात्र जानता है और वेदाध्ययनविहीन है, उस पद का पुण्य नहीं होता। अनुष्ठान जातक प्रश्नका ज्ञाता ही कहा जायगा ॥ २९ । जो ब्राह्मण गणित नहि जानता, नक्षत्रमात्र निमित्त वह विप्र किसी प्रकारका दान लेनेका अधिकारी नहीं कहा जा सकता ।। ३० ।। जो ब्राह्मण अपनी वेदशाखाको अध्ययन करके केवल व्याकरण-ज्योतिष आदि वेदाङ्गोंम ही लगा रहता है, वह विद्याध्यम भी निन्दित हुआ है ॥ ३१ ॥ जो ब्राह्मण थोडा भी अपनी शाखाका अध्ययन करके मदना ज्ञान ब्राह्मण फिर उपनिषद् तथा शास्त्राको पढ़ता है, वह वास्तविक ज्ञानपात्र बनकर बोधकस अधिक पुण्यका भागी होता है। क्योंकि ज्ञानयोगके प्रभाव या पुण्यत्व ये दोनों गुण ज्ञानसे ही आते हैं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ज्ञानकी मात्राका अधिकतासे ही उस लोगोम पात्र और अपात्रका विचार करना चाहिए। पाठकके भी पुण्यका अधिकता तथा न्यूनतासे ही पात्रापात्रका विचार किया जा सकता है ॥ ३४ ॥ ज्ञाना ओर पाठक इन दोनोंमें ज्ञानी विशेष पुण्यवाला समझा जाता है। इसलिये मेरे मतसे तो पाठककी अपेक्षा ज्ञानी अधिक पुण्य है ।। ३५ ।। इस संसारमे ज्ञानसे बढ़कर कोई वस्तु पवित्र नहीं है। ज्ञानवान् रामचन्द्रजीके अतिप्रिय है और रामको ज्ञानी प्रिय है ॥ ३६ ॥ किन्तु पाठकाम तो यह प्रथा है कि सैकड़ों पाठकोमसे भी वही श्रेष्ठ माना जाता है, जो वादीको अपनी चतुराईसे परास्त कर सके ॥ ३७ ॥ जो मनुष्य वेद आदिके ज्ञानके लिये व्याकरण आदि शास्त्रोंका अध्ययन करता है, उसे वेदाध्ययनका ही