श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६० आनन्दरामायणे [ सर्ग ६
कृत्वा चतुर्दशे वर्षे पूर्णे गुप्ते रवौ त्वहम् । प्रवेक्ष्याम्यनलं राम सत्यमेतद्वचो मम ॥१०८॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा रघूत्तमः । राज्यार्थे स्वीयपदयोः पादुके रत्नभूषिते ॥१०९॥ ददौ रामस्तदा हर्षात्ततस्तं स व्यसर्जयत् । गृहीत्वा पादुके दिव्ये भरतो रत्नभूषिते ॥११०॥ मस्तकोपरि ते बद्ध्वा कृतकृत्यममन्यत । ततो नत्वा रघुश्रेष्ठं परिक्रम्य पुनः पुनः॥१११॥ सैन्येन मातृभिः शीघ्रं राममामन्त्र्य सो ययौ । सप्रार्थयन्कैकेयी सा रामचन्द्रं पुनः पुनः ॥११२॥ मयाऽपराद्धिवं राम तन्मन्तव्यं रघूत्तम । तामाह रामचन्द्रोऽपि न त्वया मेऽपराद्धितम् ॥११३॥ मच्छन्दान्मेधयावाक्यात्स्व वाण्या मोहितात्तदा । सुखं गच्छंब स्वपुरीं न क्रोधोऽस्ति मम त्वयि ॥११४। इत्युक्ता रामचंद्रेण सरथेन न्यवर्त्तत । भरतः पूर्वमार्गेण ययौ स्वनगरीं मुदा ॥११५॥ सर्वान् स्थाप्य नगर्यां तु नदिग्राममकल्पयत् । तस्थौ स भरतस्तत्र स्थाप्य सिंहासनोपरि ॥११६। रामस्य पादुके दिव्ये फलमूलाशनः स्वयम् । राजकार्याणि सर्वाणि यानिच पृथिवीपतेः ॥११७॥ तानि पादुकयोः सम्यङ्गनिवेदयति राघवः । गणयन्दिवसान्येव श्यामाममनकौधया ॥११८॥ स्थितो राधारितमनाः साक्षाद्ब्रह्ममुनिर्यथा रामोऽपि चित्रकूटार्द्रौ रमन्मुनिभिरावृतः ॥११९॥ चकार सीतया क्रीडां विपिने रम्यपर्वते । मनःशिलासुलितलक सीतया भालकेऽङ्गरोत् ॥१२०॥ गंडयोश्चित्रवल्लीः स चकार निजहस्ततः । वृथाऽरुणदलैश्चित्रैः कोमलैः कुसुमद्रिमिः ॥१२१॥ एवं क्रीडन्सुखं रामस्तस्यां पत्न्याऽनुजेन च । नागराभ्नं मदा जग्मु रामदर्शनलालसाः ॥१२२॥ दृष्ट्वा सञ्जनसंबार्थं रामस्तत्याज तं गिरिम् । अन्वगात्मान्यया छात्रा छात्रेराश्रममुत्तमम् ॥१२३। नत्वाऽत्रि मानितस्तेन तस्थौ तत्र दिनत्रयम् । गृहस्थ्यामनुभूया तां सीताऽत्र्यर्चनचावदा ॥१२४॥
निश्चत समयपर नहीं लौटूंगा तो मैं चौदह वर्ष समाप्तिके दिन सूर्यास्तके समय अग्निमें प्रवेश कर जाऊंगा । हे राम ! मेरी इस प्रतिज्ञाको आप सत्य समझें ॥ १०८-१०८॥ उनके इस वचनको सुनकर रघूत्तम रामने 'तथास्तु' कहा और राज्यके लिए अपने पैरोंकी रत्नभूषित पादुकाएँ देकर उन्ह विदा किया। भरतने उन रत्नभूषित पादुकाओंको लेकर माथे चड़या और अपने आपको कृतकृत्य समझा । पश्चात् रघुश्रेष्ठ रामको बारम्बार प्रणाम करके परिक्रमा की और उनकी आज्ञा लेकर भरत माता और सेनाके साथ तुरन्त अयोध्याकी ओर चल दिये । उस समय कैकेयी पुनः पुनः रामसे प्रार्थना करने लगी-॥ १०६-११२। हे राम ! हे पुत्रोत्तम ! मैने जो अपराध किया है, उसे क्षमा कर दो । रामने कहा-माताजी ! तुम्हारा कोई अपराध नहीं है । ११३ । मेरी इच्छासे ही सरस्वताने मंथराके वाक्यसे तुमको मोहित कर दिया था । हे अम्ब अब तुम सुखपूर्वक अयोध्या जाओ। मुझ तुमपर कुछ भी क्रोध नहीं है । ११४ ॥ ऐसा कहनेके बाद कैकेयी रामके कथनानुसार सरथके साथ नगरको लौटीं । भरत भी सहर्ष जिस मार्गसे आये थे, उसी मार्गसे अपनी नगरीको लौट गये ॥ ११५ ॥ वहाँ जा तथा सबको नगरमें पहुँचाकर उन्होने नन्दीग्राम बसाया । वही भरत सिंहासनपर रामकी दिव्य खड़ाऊं रख तथा फल-मूल खाकर रहने लगे। राज्यके जो-जो काम आते थे उन सबको भरत-जी खड़ाऊंके सामने लाकर प्रतिदिन निवेदन कर दिया करते थे। इस प्रकार राममें मन लगाकर रात्रि-दिवसको गिनते हुए भरत साक्षात् ब्रह्ममुनिकी भाँति समय व्यतीत करने लगे। उधर राम भी मुनियोंसे सत्कार प्राप्त करके सानन्द चित्रकूट पर्वतपर रहने लगे ॥ ११६-११९॥ उस पवित्र तथा मनोहर वनमें राम सीताके साथ क्रीड़ा करते थे । मैनसिलकी सुन्दर गिलपार चन्दनादि घिसकर राम सीताके मस्तकपर तिलककी रचना करते थे ॥१२०॥ अपने कोमल हाथोंसे सीताके कोमल गालोंपर चित्रवल्लीका निर्माण करते थे वृक्षोंके कोमल-कोमल लाल पत्तो और अनेक प्रकारके फूलोंसे सीताको सजाते थे ॥ १२१ ॥ इस प्रकार क्रीड़ा करते हुए राम अपनी प्राणप्यारी पत्नी तथा अनुज लक्ष्मणके साथ सुखपूर्वक रहते थे। वहाँ अनेक नागरिक रामके दर्शनकी अभिलाषासे सदा उनके पास आते रहते थे ॥ १२२ ॥ इस प्रकार लोगोंका आवागमन देखकर रामने उस पर्वतको छोड़ दिया और भाई लक्ष्मण तथा सीताको लेकर अत्रिकऋषिके उत्तम आश्रमकी ओर चल