भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

सर्गः ७ ] सारकाण्डम् ३१

नत्वा तयाऽऽलिङ्गिता सा तदङ्के समुपविशत् । अनसूया तदा सीतां पूजयामास सादरम् ॥१२५॥
दिव्ये ददौ कुण्डले द्वे निर्मिते विश्वकर्मणा । दुकूले द्वे ददौ तस्यै निर्मले भक्तिसंयुक्ता ॥१२६॥
अङ्गरागं च सीतायै ददावंब्रैन्मु सा प्रिया । न व्येष्यतेऽङ्गशोभा त्व कदापि जनकात्मजे ॥१२७॥
पातित्रत्यं पुरस्कृत्य राममन्वेहि जानकि कुशली राघवो यातु त्वया भ्रात्रा पुनर्ग्रहम् ॥१२८॥
भोजयित्वा यथान्याय रामं सीनाममन्वितम् । अत्रिर्विमर्जयामास रामो नत्वा ययौ वनम् ॥१२९॥
एवं वर्षमतिक्रांतं, रामस्य गिरिसन्निधौ । यथासुखं लक्ष्मणेन जानक्या सहितस्य च ॥१३०॥
एवं गिर्गद्रजेऽयोध्यापुर्यां रामेण यत्कृतम् । चरित्रं तन्मया किंचिस्त्वदग्रे विनिवेदितम् ॥१३१॥

इति श्रीमत्कोटिशमपरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
अयोध्याचरित्रे दण्डकवनप्रवेशो नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तमः सर्गः

( रामके द्वारा विराध और खर-दूषणका वध )
श्रीशिव उवाच

अथ रामः सीतया तु लक्ष्मणेन समन्वितः । ययौ स दंडकारण्यं सज्जं कृत्वा महद्धनुः ॥ १ ॥
अग्रे ययौ स्वयं रामस्तत्पृष्ठे जानकी ययौ । तस्याः पृष्ठे स सौमित्रिर्ययौ धृतशरासनः ॥ २ ॥
वने दृष्ट्वाऽथ कासारं स्नात्वा पीत्वा जलं सुखम् । भुक्त्वा फलानि पक्वानि तरुधुस्तत्र क्षण व्ययः ॥ ३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र विराध नाम राक्षसम् । तं तं ददृशुरायांतं महामद्यं भयानकम् ॥ ४ ॥
करालदंष्ट्रवदनं दापयत स्वर्गाजनः । वामाग्रन्यस्तशूलाग्रप्रथितानेकमनुषम् ॥ ५ ॥
भक्षयतं गजं व्याघ्रं महिषं वनगोचरम् । ज्यारोपितं धनुष्कृत्वा रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । ६ ॥

दिये ॥ १२३ ॥ अत्रि ऋषिको नमस्कार करकेके बाद वनस सम्मानित होकर व वहाँ तीन दिन ठहरें। अत्रिके कहनेसे सीता कुट म स्थित अनसूयाके पास गयी ॥ १२४॥ नमस्कार करनेपर उन्होंने सीताका आलिङ्गन किया और सीता उनकी गोदमें बैठ गयी। पश्चात् अनसूयान उनका आदर-सत्कार करके पूजन किया ॥ १२५ ॥ तदनन्तर विश्वकर्माके बनाये दो दिव्य कुण्डल और दो स्वच्छ सूक्ष्म वस्त्र प्रेम तथा भक्तिपूर्वक सीताको दिये ॥ १२६ ॥ अत्रिकी प्रिया अनसूयाने सीताका महावर आदि रङ्ग भी अङ्गराग लगानेके लिए दिये और कहा—हे जनकात्मजे ! यह रङ्ग तुम्हारे अङ्गोंपरसे कभी नही उतरेगा ॥ १२७॥ हे जानकी ! पातिव्रत धर्मको निभाती हुई तुम रामका अनुगामिनी बना। यथासमय राम तुम्हारे तथा भाई लक्ष्मणके साथ सकुशल घर लौट जायेंगे ॥ १२८ । तब अत्रिने सीता सहित रामको यथोचित भोजन कराकर विदा किया। राम वा नमस्कार करके चल दिये ॥ १२९ ॥ इस तरह रामका सीता तथा भाईके सहित सुखपूर्वक पर्वतॉपर निवास करते हुए एक वर्ष बीत गया ॥ १३० ॥ हे गिरिन्द्रजे ! अयोध्यापुराम रामने जो काम किया था, वह सब मैने तुम्हारे सामने कह सुनाया ॥ १३१ ॥ इति श्रीमत्कोटिशमपरित्तान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे बाल्मीकीये सारकाण्डे अयोध्याचरित्रे २० रामतपवाण्ड्येक्कृत अयोध्या' मायाटाकाया दण्डकवनप्रवेशो नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

शिवजी बोले—हे गिरिज ! इसके बाद राम बड़ भारी सज्जकृत धनुषको हाथमें लेकर सीता तथा लक्ष्मणके साथ दण्डकारण्यमे गये ॥ १ ॥ आगे आगे स्वयं राम, पीछे सीता और उनके पीछे हाथमें धनुष धारण करके लक्ष्मण चले ॥ २ ॥ वनमें एक सरोवर देखा तहाँ सुखपूर्वक स्नान करके जल पिया और पके फलोंको खाकर क्षणभर तीनोन वहाँ विश्राम किया ॥ ३ ॥ इतनेहीम उन्होंने अपनी ओर आते हुए बड़े भयानक विराध नामके राक्षसको देखा ॥ ४ ॥ वह अपने विकराल दाँतवाले मुखको फैला तथा भयानक गर्जन करता हुआ बन लोगोंको डराने लगा । उसने अपने भालेकी नोकमें दीधकर बहुतसे मनुष्योंको धारण कर रखा था। वह बनचर व्याघ्र, हाथी और महिष आदिको भी मार-मारकर खा रहा था। यह देख राम