श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७
रक्ष त्वं जानकीमत्र महं हन्मिह राक्षसम् । मर्तुं दृष्ट्वा रमानाथं लक्ष्मणं जानकीं तथा ॥७॥ कौ युवामिति तौ प्राह रामोऽप्यथब्रवीत्तु तत् । नामरूपे निजं सर्वं कैकेय्याऽपि च यत्कृतम् ॥८॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा विहस्य राक्षसोऽब्रवीत् । मां जानासि त्वं राम विराधं लोकविश्रुतम् ॥९॥ मद्भयान्मुनयः सर्वे त्यक्त्वा वनमितो गताः यदि जीवितुमिच्छास्ति त्यक्त्वा सीतां निरयुधौ १०॥ पलायेतां न चेच्छीघ्रं भक्षयामि युवामहम् । इत्युक्त्वा राक्षसोः सीतामादातुमाभिदुद्रुवे ॥११॥ रामश्चिच्छेद तद्बाहू शरेण प्रहसन्निव ततः क्रोधपरीतत्मा व्यादाय विकटं मुखम् ॥१२॥ राममभ्यद्रवद्रामश्चिच्छेद पदद्वयं तदा सर्प इवाश्वेन ययौ पुनः ॥१३॥ ततोऽर्धचंद्राकारेण निहतो राघवेण सः। ततः सीता समालिङ्ग्य प्रशशंस रघूत्तमम् ॥१४॥ देवदुन्दुभयो नेदुर्दिगि देवगणैस्ततः। ततो विराधकायात्तु पुरुषश्च विनिर्गतः ॥१५॥ नत्वा रामं निजं वृत्तं कथयामास सादरम् । दुर्वाससाऽहं शप्तस्तु पुरा विद्याधरः शुभः ॥१६॥ इदानीं मोचितः शापात्त्वया कालांतगहने । इत्युक्त्वा राघव स्तुत्वा विमानेन ययौ दिवम् ॥१७॥ विराधे स्वर्गते रामो लक्ष्मणेन च सीतया । अगाध शरभङ्गस्य वनं सर्वसुखावहम् ॥१८॥ शरभङ्गं ततो नत्वा तैम सम्मानितो बहु । तस्थौ तत्र निशामेकां द्यामगो मुनीश्वरः । १९॥ तस्मै समर्प्य स्वं पुण्यमारुरुहे चिरीं तदा । स्तुत्वा तं स विमानेन वैकुण्ठं परं ययौ ॥२०॥ ततः शनैः सुतीक्ष्णस्य ययावाश्रममुत्तमम् । नत्वा तं पूजितस्तेन मुम मथ्यो न्यदूदतः ॥२१॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र नानाधमनिवासिनः । मुनयो राघवं द्रष्टुं समाजग्मुः सहस्रशः ॥२२॥ सर्वे ते राघवं नत्वा स्तुत्वा निन्युर्निजं निजम् । आश्रमं सीतया भ्रात्रा चक्रुः पूजां सांग्वस्तगम् ॥२३॥
धनुषपर बाण चढ़ाकर लक्ष्मणसे बोले-॥५, ६। हे लक्ष्मण ! तुम यहां जानकीकी रक्षा करो । मैं इस दुष्ट राक्षसको मारूंगा। यह राक्षस रमापति राम, लक्ष्मण तथा जानकीको देखकर बोला तुम कौन हो ? तब रामने अपना नाम, धाम तथा कैकेयीका कृत्य सब कुछ कह सुनाया ॥ ७, ८ ॥ रामके इसप्रकार सुनकर राक्षस हँसा और कहने लगा-हे राम ! क्या तू लोकविख्यात विराधको नही जानता ? ॥ ९ ॥ मेरे इस डरसे सब मुनि इस वनको छोड़कर भाग गये हैं। यदि तुम दोनों जाना चाहते हो तो अपने शस्त्रोंको छोड़कर भाग जाओ। नही तो तुम दोनोंको मै अभी खा जाऊंगा । इतना कहकर वह राक्षस सीताको पकड़ने दौड़ा ॥ १०, ११ ॥ तब हंसते हुए रामने उसके दोनों हाथोंको अपने बाणसे काट दिया । तब विराध क्रुद्ध हो गया विकट मुख फैलाकर रामकी ओर दौड़ा। तब रामने आगे बढ़कर उसके दोनों पाँवोंको भी काट डाला। फिर वह सर्पकी तरह मुखसे खानेके लिये झपटा ,॥ १२, १३ ॥ तब रामने अपने अर्द्धचन्द्राकार बाणसे उसके सिरको भी काट डाला और वह मर गया। यह देख सीता रामका आलिङ्गन करके उनकी प्रशंसा करने लगी ॥ १४ ॥ तभी आकाशमे देवताओंगे नगाड़े बजने लगे । पश्चात् विराधके शरीरसे एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ ॥ १५ ॥ वह रामको प्रणाम करके बड़े आदरसे अपनी कहानी सुनाते हुए कहने लगा-पूर्व समयमें मै एक सुन्दर विद्याधर था, परन्तु दुर्वासा ऋषिने मुझको शाप देकर इस दशाको प्राप्त करा दिया ॥ १६॥ आज बहुत कालके बाद आपने मुझको उस शापसे मुक्त किया है। यह कह और रामकी स्तुति करके वह विमानमें बैठकर स्वर्ग चला गया ॥ १७ ॥ विराधके चले जानेपर राम लक्ष्मण तथा सीताके साथ सर्वसुखदायक शरभंग मुनिके वनमें पधारे ॥ १८ ॥ उनको नमस्कार करके तथा उनसे सम्मानित होकर वे एक रात्रि वहाँ ठहरे । मुनिश्रेष्ठ शरभंगने अपना सब पुण्य जनक चरणपर समर्पण करके रामके सामने ही चितामें प्रवेश किया और उनकी स्तुति करके विमानपर चढ़कर दिव्य रूपसे वैकुण्ठ धामको चले गये ॥ १९, २० ॥ वहाँसे रामने सुतीक्ष्ण मुनिके सुन्दर आश्रमकी ओर प्रयाण किया। वहाँ पहुंचकर मुनिको नमस्कार किया पुनिन उनका बहुत सत्कार करके अपने यहाँ ठहराया ॥ २१ ॥ यहाँ आरण्यके वनमध्य विविध आश्रमोंसे हजारो मुनि भाव थे ॥ २२ ॥ वे सब सीता तथा लक्ष्मणके सहित रामको नमस्कारकर और उनकी स्तुति करके उन्हें अपने-अपने आश्रममस ले