श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ७ ] सारकाण्डम् ६३
एकरात्रं त्रिरात्रं वा पंच सप्त दिनानि वा । पक्षमात्रं तु मासं वा सार्धमासमथापि वा ॥२४॥
त्रिमासान्पञ्चमासं वा षट्सप्ताष्टकाऽथवा । मात्रं संवत्सरं वापि स्वाश्रमेषु रघूत्तमम् ॥२५॥
सम्भाव्य चक्रुरातथ्यमधिकं चोत्तरोत्तरम् पन्याऽनुजेन सीतञ्चैव पूज्य विसर्जनम् ।२६।
भ्रमन्नेवं हि रामेण नव वर्षाणि दण्डके । आश्रमेषु मुनीनां च ह्यतिक्रान्तानि वै सुखम् ।२७॥
बहवो निहतास्तत्र राक्षसा भ्रमता तदा । राघवेण सह भ्रात्रा क्रीडाऽऽवनिप्रफन्यया ॥२८॥
नानाश्रमाश्रमपुष्पवनोपवनभूमिषु । नदीजलतट क्रौञ्चिखगद्रिस्थलवेण्वि ॥२९॥
जम्ब्वाम्राम्रातकादिनानावृक्षलतेषु हि । चकार सीतया क्रीडां रामो देव्या यथा शिवः ॥३०॥
अप रामो ययौ कुम्भसंभवस्यानुजाश्रमम् । सुमतिः पूजयामास राघव सहिताऽनिशम् ॥३१।
ततः सीतायुतो रामः शनैर्भात्रा मुदान्वितः । अगस्त्येरश्रमं प्राप नानाऋषिगणैर्वृतम् ३२।
प्रत्युद्गम्य मुनिश्चापि मुनिभिर्बहुभिर्वृतः । राघवं तं समालिंग्य स्वाश्रमं तेन मो ययौ ३३॥
अथ तं पूजयामास राघवं कुम्भसंभवः । रामाऽपि मानितस्तेन तस्थौ तत्र कियद्दिनम् ॥३४।
ततः स्तुत्या रमानाधमगत्यो मुनिसत्तमः । ददौ चाप महेन्द्रेण रामार्थं स्थापितं पुरा ॥३५॥
अक्षय्यौ बाणतूणीरौ खड्गं रत्नवभूषितम् । ततो रामो मुनेर्वाक्याद्गौतम्या उत्तरे तटे ।३६।
ययौ पंचवटीं रम्यां मार्गे दृष्ट्वाऽथ पक्षिणम् । जटायुषं नगकारमरुणात्मजमुत्तमम् ।३७॥
सखापं स्वपितुश्चापि सम्भाव्याय विवेश तम् । तत्र कृत्वा महाशालां यथा पूर्वे कृता गिरौ ॥३८॥
मृगमांसैर्बलिं दत्वा तस्थौ रामो यथासुखम् । सीतां संरक्षयामास जटायुः पक्षिराट् स्वयम् ॥३९॥
राघवस्य पंचवट्यां सीतया क्रीडतः सुखम् । सार्ध त्रीणि चवर्षाणि व्यतिक्रान्तानि पार्वति ।४०।
उने शूर्पणखापुत्र तपंतं शांबनामकम् । अद्रा ददौ दिव्यमस्त्रं तं शांबो न ददर्श सः ॥४१।
तद् वृन्ता लक्ष्मणः खड्ग वृक्षात्त्वष्टाऽवधत सः । वृक्षगुल्मे हतः सांबस्ततो राघबमब्रवीत् ४२।
जान और विधिवत् पूजा करत था ॥ २३ ॥ व एक दो दिन, पांच-सत मान अथवा पूरे वर्ष भर अपने आश्रमपर रखकर रघुत्तम रामका प्रतिदिन अधिकाधिक प्रेमसे आतिथ्य करते और अन्तमे पत्नी तथा भ्राता सहित रामका पूजन करके विदा करते थे ॥ २४-२६ ॥ इस तरह मुनियोंके आश्रमोंमें घूम फिरकर रामक सुखमे नौ वर्ष बिता दिया ॥ २७ । वहा भाई लक्ष्मणके साथ भ्रमण करते हुए रामने बहुतसे राक्षसों-को मार डाला ॥ २८ । रामन अनेक आश्रमामे, वागीच तथा चर बनामे नदीक जलमे, नानाबोध पर्वतके शिखर आदि स्थानोमे, जामुन, आम, केला, दान आदि अनेक वृक्षा तथा लतकुञ्जोमे सीताक साथ शिव-पार्वतीकी तरह क्रीडा की । २९ । ३० ॥ पश्चात् राम कुम्भज ऋषिके छोट भाई मार्र्कण्ड मुनिके आश्रमपर गये । उन बुद्धिमान मुनिने भा भायासहित राघवकी पूजा का ॥३१। वहांसे चलकर सीता तथा भाईके साथ राम विविध वृक्षामे मंडित अगस्त्य मुनिक आश्रमपर गये ॥ २२ ॥ वहां मुनि अगस्त्य अन्य मुनियो और महाऋ-षियोके साथ आग आय और रामका आलिङ्गन करके आश्रममे ले गये ॥ ३३ ॥ उन्होने रामकी विधिवत् पूजा की। उनसे पूजित होकर रामने वहां कुछ दिन निवास किया ॥ ३४ ॥ मुनिश्रेय अगस्त्यने रामकी प्रशंसा की और इन्द्रके द्वारा प्रदत्त तथा उनके लिये पहिलेसे ही रक्खा हुआ धनुष रामको दिया ॥ ३५ ॥ अक्षय बाणवाले दो तूणीर (तरकस) तथा रत्नजडित समशार दी। पश्चात् रामने मुनिके कथनानुसार गौतमी नदीक उत्तरी किनारपर स्थित रमणीक पञ्चवटीकी ओर प्रस्थान किया। रास्तेम उनको पर्वताकार अरुणपुत्र एव उनके पिताका श्रेष्ठ मित्र जटायु नामका पक्षी मिला। उससे सम्भाषण करके बनम आगे बढे। चित्रकूटकी तरह वहांपर भी उन्होने पर्णकुटी बनवाई ॥ ३६ ॥ ३९ ॥ वहां मृगोंके मांसकी बलि देकर राम सानन्दसे रहने लगे । पक्षिराज जटायु स्वयं सीताकी रक्षा करने लग ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ हे पार्वती ! पञ्चवटीमे रामको सीताके साथ क्रीडा करते हुए साढ़े तीन वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ४० ॥ उस वनम शूर्पणखाका पुत्र साम्ब तप करता था। यह देखकर ब्रह्मााने एक दिव्य खड्ग उसे दिया, पर इस बातका साम्बको पता नहीं लगा ॥ ४१ ॥ तब लक्ष्मणने