भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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३४श्रीमदानन्दरामायणे[ सर्गः ७ ]

प्रायश्चित्तं ब्रह्महत्यां मे वद त्वं रघूत्तम । रामोऽप्याह हतः मांत्रो राक्षसो न मुनिर्हतः ॥४३॥
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणस्तुष्टो मात्रोयात्रापि तच्छ्रुत्वा । तन्मन्दरी पुत्रदुःखं राक्षसी कामरूपिणी ॥४४॥
विचचार शूर्पणखा नाम्नी च सर्वघातिनी । एकदा पञ्चवट्यां सा रामं दृष्ट्वाऽथ राक्षसी ॥४५॥
पुत्रदुःखसमाक्रांता धृत्वा रूपं मनोहरम् । कापट्यबुद्ध्या श्रीरामं सानुजं हंतुमुद्यता ॥४६॥
उवाच मधुरं वाक्यं वस्त्रालंकारमंडिता । कौ युवां का त्वियं रम्या किमर्थमागता वनम् ॥४७॥
कुतः समागतावत्र क्वाऽधुना गच्छतः पुनः । तत्तस्या वचनं श्रुत्वा रामः सर्वं न्यवेदयत् ॥४८॥
ततः सा राघवं प्राह मद भर्ता भव प्रभो । सोऽप्याह दयिता मेऽस्ति बहिरित्युदिति लक्ष्मणः ॥४९॥
प्रार्थयामास सौमित्रिं सा तं सोऽप्युत्तरं ददौ । अहं दासोऽस्मि रामस्य त्वं तु दासी भविष्यसि ॥५०॥
ततः क्रोधेन सा सीतां धर्तुं वेगेन दुद्रुवे । तदा तां राघवः प्राह ममायं शर उत्तमः ॥५१॥
चिन्हार्थं लक्ष्मणाय त्वं नीत्वा दर्शय वेगतः । महाकण्ठेनिनत्कार्यं सिद्धिं नेष्यति लक्ष्मणः ॥५२॥
इत्युक्त्वा राघवो बाणं ददौ तस्यै सुशोभनम् । सत्यं मत्वा रामवाक्यं सा ययौ लक्ष्मणं पुनः ॥५३॥
लक्ष्मणाय रामबाणं दर्शयामास राक्षसी । स बुद्ध्वा हृदयं भ्रातुः संधाय शरासने ॥५४॥
मुमोच बाणं वेगेन रामनामाङ्कितं शुभम् । स शरो गगने गत्वा घ्राणकर्णीछिद्रकृत्त्वान ॥५५॥
संछिद्य रामतूणीरे विवेश क्षणमात्रतः । घ्राणकर्णच्छिद्रजातरुधिरा साऽपि राक्षसी ॥५६॥
हाहतास्मीति जल्पन्ती ययौ भ्रातॄन्खरदूषणकान् । दृष्ट्वा स्वसां तादृशीं ते त्रिशिरःखरदूषणाः ॥५७॥
तन्मुखात्सकलं वृत्तं श्रुत्वा ते क्रोधसंयुताः । चतुर्दश महाघोरान् राक्षसान्प्रेषयंस्तदा ॥५८॥


उस खड्गको लेकर उस घने वनके सब वृक्षों और लताओंको काट डाला । उस दुष्टपुत्रके साथ साम्ब भी मारा गया । यह देखकर लक्ष्मण रामसे कहने लगे - ॥ ४२ ॥ हे रघुराज ! आप मुझे ब्रह्महत्यानिवारक कोई प्रायश्चित्त बतायें । तब रामने कहा- तुमने तो मांब नामक राक्षसको मारा है, न कि मुनिको ॥ ४३ ॥ ८८ ॥ यह सुनकर लक्ष्मण प्रसन्न हुए । उधर दण्डक रूप धारण करनेवाली शम्बकी माता शूर्पणखा राक्षसीने जब यह सुना तो पुत्रमरणके दुःखसे दुःखित होकर बारम्बार शूर्पणखा स्मरण करती हुई कापट्य रूपसे मार डालने की इच्छासे इधर-उधर विचरने लगी । एक दिन पञ्चवटीमें रामको देखकर वह राक्षसी पृथु दुःखसे व्याकुल हो उठी और मनोहर रूप धारण करके सीता-लक्ष्मण सहित रामको मारनेके लिए उद्यत हो गयी ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ वह वस्त्र तथा अलंकारोंसे सजकर उनके पास जा पहुंची और इस प्रकार मधुर वचन कहने लगी तुम दोनों तथा यह सुन्दरी स्त्री कौन है और यहाँ वनमें तुम सब किस लिए आये हो ? ॥ ४७ ॥ कहाँसे आ रहे हो और अब आप कहाँ जानेका विचार है ? उनके प्रश्न सुनकर रामने अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ४८ ॥ तब वह बोली हे प्रभो कृपा करके आप मेरे पति बनो । उत्तरमें रामने कहा कि मेरे पास तो यह मेरा प्रिय पत्नी विद्यमान है । इसलिए तुम बाहर खड़े मेरे छोटे भाई लक्ष्मणके पास जाओ । ४९ । रामके कथनानुसार शूर्पणखाने बाहर जाकर लक्ष्मणसे अपनी इच्छा प्रकट की । लक्ष्मणने कहा कि मैं तो रामका दास हूँ तुम मेरी स्त्री बनकर क्या करोगी । मेरे साथ तुम्हें भी दासी बनना पड़ेगा । ५० । यह सुनकर शूर्पणखा अत्यन्त क्रुद्ध हो गयी और सीताको पकड़नेके लिए बड़े वेगसे झपटी । रामने उसे रोककर कहा कि यह मेरा सुन्दर बाण पहचाननेके लिए ले जाकर लक्ष्मणको दिखाओ । मरे बाणको देखते ही लक्ष्मण तुम्हारी इच्छा पूरा कर देगा । ५१ ॥ ५२ । यह कहकर रामने तुरन्त सन्धान तोड़ना एक बाण उसको दिया । रामकी बातको सत्य समझ वह राक्षसी बाण लेकर फिर लक्ष्मणके पास गयी ५३ ॥ वहाँ जाकर उसने लक्ष्मणको रामका बाण दे दिया । लक्ष्मण बड़े भाईका अभिप्राय समझ गये और धनुषपर चढ़ाकर रामनामसे अंकित उस शुभ बाणको छोड़ दिया । वह बाण राक्षसके पास गया और उसके नाक, कान, ओष्ठ तथा स्तनोंको काटकर पुनः क्षण भरमें रामकी तरकसमें लौट गया । कान, नाक ओष्ठ तथा स्तनोंसे रहित वह राक्षसी ॥ ५४-५६ ॥ 'हाय मैं मारी गया' इस प्रकार चिल्लाती हुई खर-दूषण आदि अपने भाइयोके पास जा पहुंची । बहनकी यह