भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 767, कुल 811 में से

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पृष्ठ 767
७९०आनन्दरामायणे[ सर्ग १७

वरदानं लक्ष्मणाय वानरेभ्यस्तथा मया। अयोध्यासंस्थितानां च ततो देहविसर्जनम् ॥९४॥
वानरास्ते सुरा जाताः सीता जाता रमा मम। लक्ष्मणः पन्नगो जातः शंखोऽभूद्भरतस्तदा ॥९५॥
सुदर्शनं च शत्रुघ्नो विष्णुरूपधरस्त्वहम्। तदोर्मिलादिकानां च प्रयाणं सर्वयोषिताम् ॥९६॥
नीराजनं सुरास्त्रीभिस्तेषां सौतानिकं पदम्। शम्भुना संस्तुतश्चाहं गरुडारोहणं मम ॥९७॥
पुष्पवृष्टिर्मयि तदा वैकुण्ठे गमनं मम। वैकुण्ठे रमया स्थित्वा देवानां च विसर्जनम् ॥९८॥
सूर्यवंशानुक्रमश्चानन्दरामायणस्य च। कांडसंख्या सर्गसंख्या ग्रंथसंख्या फलश्रुतिः ॥९९॥
रामायणश्रवणस्योद्यापनं च महत्तमम्। ग्रथदानसमुत्थानं प्रकाराः पञ्च वै ततः ॥१००॥
अनुष्ठानोद्यापनं च शकुनस्य च विस्तरः। संवादस्य पूर्णतापि युवयोर्गुरुशिष्ययोः ॥१०१॥
आशंकाछेदनं देव्याः कलाऽस्य पठनस्य च। रामायणस्य महिमा चैकश्लोकेन वै त्विदम् ॥१०२॥
मम ध्यानं शंभुदेव्याः संवादस्यापि पूर्णता।
इति पूर्णकाण्डम् ॥ ९ ॥

एवं मया रामदास साररामायणं तव ॥ १०३ ॥
स्मरणार्थं चरित्राणां संक्षेपेण निवेदितम्। इदं गोप्यं त्वया कार्यं महत्पुण्यप्रदं स्मृतम् ॥१०४॥
शतकोटिमितग्रन्थान्मया सारं मयोदितम्। कः क्षमः सकलं वक्तुं विना वाल्मीकिना भुवि ॥१०५॥
स एव धन्यो वाल्मीकिर्येन मच्चरितं कृतम्। साररामायणमिदं ये पठन्त्यत्र मानवाः ॥१०६॥
तेभ्यो भुक्तिश्च मुक्तिश्च द्विज दास्याम्यहं मुदा। कृत्स्नं रामायणं श्रोतुं पठितुं वा नरोत्तमम् ॥१०७॥
अवकाशो यदा नास्ति तदेतत्संपठेन्नरः। अन्यच्चान्यन्मया कर्म कृतं पूर्वं शुभाशुभम् ॥१०८॥
तन्मच्छन्दान्मत्स्मृतेर्निर्गमिष्यति निश्चयम्। स्वदृष्टिगोचरं कृत्स्नं चरितं मे भविष्यति ॥१०९॥
विष्णुदासाय शिष्याय वद त्वमधुना सुखम्। ॥११०॥


अयोध्यावासियोंके लिए वरदान अपनी देहका त्याग, वानरोंका अपना शरीर छोड़कर फिर देवता बनना, सीताका लक्ष्मी बन जाना, लक्ष्मणका शेषरूप हो जाना, भरतका पाञ्चजन्य शङ्ख होना, शत्रुघ्नका सुदर्शन चक्र हो जाना और मेरा विष्णुरूप धारण करना, उर्मिला आदि स्त्रियोंका प्रयाण, देवाङ्गनाओं द्वारा सब लोगोंकी आरती, शिवजी द्वारा मेरी स्तुति मेरा गरुड़ारोहण मेरे ऊपर पुष्पवृष्टि, मेरा वैकुण्ठगमन, वैकुण्ठमें लक्ष्मीके साथ विराजमान होकर देवताओंका विसर्जन, ॥ ९३-९८ ॥ सूर्यवंशकी अनुक्रमणिका, आनन्दरामायणकी काण्डसंख्या, सर्गसंख्या, रामायणश्रवणका महाफल, ग्रन्थदानविधि, अनुष्ठानके पांच प्रकार, ॥ ९९ ॥ १०० ॥ अनुष्ठान, उद्यापन, शकुनका विस्तार, तुम दोनों गुरु शिष्यके संवादकी पूर्णता, देवीका आशङ्काछेदन, इसके पाठको कलाएं, रामायणके एक-एक श्लोकके पाठकी महिमा, मेरा ध्यान और शिव-पार्वतीके संवादकी समाप्ति, ये इतनी कथाएं पूर्णकाण्डमें कही गयी हैं ॥ ९ ॥ हे रामदास इस तरह मैंने तुम्हें संक्षेपमे साररामायण बतलायी। इससे तुमको मेरे चरित्रोंका स्मरण करनेमें बड़ा सहायता मिलेगी। यह बड़ी पुण्यदायक रामायण है। इसलिए इसे सदा गुप्त रखना। सौ करोड़ संख्यावाली रामायणका सार अंश लेकर ही इसे मैने तुमको बताया है वाल्मीकिके सिवाय भला और कौन है, जो पूरे तौरसे रामायणका वर्णन कर सके ॥ १०१-१०५ ॥ वे वाल्मीकिजी धन्य हैं, जिन्होंने अच्छी तरह मेरे चरित्रोंका वर्णन किया है। जो लोग इस साररामायणका पाठ करते हैं । उन्हें मैं भुक्ति और मुक्ति सब कुछ देता हूँ। यदि किसी सज्जनको पूरी रामायण पढ़ने या सुननेका अवकाश न मिले तो उन्हें इस साररामायणका ही पाठ कर लेना चाहिए। इनके अतिरिक्त भी मैंने जो शुभ अशुभ कर्म किये हैं, वे मेरी इच्छासे तुम्हें मेरे चरित्र वर्णन करते समय अपने-आप स्मरण होते जाएंगे। मेरे सारे चरित्र तुम्हारे दृष्टिगोचर होंगे । १०६-१०९ ॥ अब तुम इसे अपने शिष्य विष्णुदासको आनन्दके साथ सुनाओ ॥ ११० ॥