श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 768, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७५१
श्रीरामदास उवाच
एवं श्रीरामचन्द्रेण यथाऽत्र कथितं मम । साररामायणं रम्यं तदिदं ते निवेदितम् ॥१११॥
इदं रम्यं पवित्रं च महापातकनाशनम् । सर्वदा मानवैर्जप्यं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥११२॥
कृत्स्नं रामायणं श्रुत्वा यत्फलं प्राप्यते नरैः । तदस्य पठनादेव सत्यं सत्यं वचो मम ॥११३॥
तस्माद्भूमिः सदा जप्यं सर्वेषां शांतिकारकम् । पुत्रपौत्रप्रदं खादं महत्सौख्यप्रदं नृणाम् ॥११४॥
रामायणानि शतशः सन्ति त्रिष्वथभूतले । सथाप्यनेन सदृशं न भूतं न भविष्यति ॥११५॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये मनोहरकाण्डे रामदास-विष्णुदाससंवादे श्रीरामचन्द्रोपदिष्टं साररामायणं नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥
अष्टादशः सर्गः
( हनुमान्जीके द्वारा अर्जुननिर्मित शरसेतुभंजन )
श्रीविष्णुदास उवाच
कपिध्वजोऽर्जुनश्चेति मया पूर्वं श्रुतं गुरो । तन्नामकारणं भो त्वं विस्तराद्वक्तुमर्हसि ॥१॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । द्वापरान्तं भाविकथां त्वां वदामि चमत्कृताम् ॥२॥
एकदा कृष्णरहितोऽर्जुनः स्यन्दनसंस्थितः । ययावरण्ये विचरन्मृगयार्थं हि दक्षिणाम् ॥३॥
एकाकी यन्तृसंस्थाने स्थित्वा तत्कृत्यमाचरन् । हत्वा वने मृगानन्धी मध्याह्ने स्नातुमुद्यतः ॥४॥
ययौ रामेश्वरं सेतुं धनुष्कोट्यां विगाह्य च । मध्याह्नकृत्यं संपाद्य पुनः स्यन्दनसंस्थितम् ॥५॥
अब्धेस्तटे विचचार किंचिद्गर्वसमन्वितः । एतस्मिन्नन्तरेऽपश्ये पर्वतोपरि संस्थितम् ॥६॥
ददर्श मारुतिं वीरः सामान्यकपिरूपिणम् । राम रामेति जपन्तं पिंगलोमधरं शुभम् ॥७॥
दास बोले—जिस तरह रामचन्द्रजीने मेरे समक्ष साररामायणका वर्णन किया था, सो मैंने कह सुनाया ॥१११॥ यह साररामायण दिव्य, पवित्र और महान् पातकोंको नष्ट करनेवाला है। लोगोंको चाहिए कि भुक्ति और मुक्ति देनेवाले इस रामायणका पाठ करें ॥ ११२ ॥ पूरी रामायणके सुननेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल इस साररामायणके भी श्रवण करनेसे प्राप्त हो जाता है। मेरी बात सर्वथा सत्य है ॥ ११३ ॥ इसलिए लोगोंको सर्वदा इसका पाठ करते रहना चाहिए। क्योंकि यह सबकी शान्ति प्रदान करता है। यह पुत्र, पौत्र, स्त्री तथा महान् सुखोंका दाता है ॥ ११४ ॥ हे शिष्य ! वैसे तो इस पृथ्वीतलमें सैकड़ों रामायणें हैं, किन्तु इसके समान अबतक न कोई रामायण हुई है और न आगे होगी ॥ ११५ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे साररामायणं नाम सप्तदश सर्ग ॥ १७ ॥
विष्णुदास बोले—हे गुरो ! मैं कभी आपके मुखसे अर्जुनका कपिध्वज यह नाम सुन चुका हूँ। उनका यह नाम क्यों पड़ा, सो कृपा करके आप हमें बतलाइए ॥ १ ॥ श्रीरामदास कहने लगे—हे शिष्य ! तुमने बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है। सावधान होकर सुनो। यद्यपि यह कथा द्वापरके अन्तकी है, फिर भी तुम्हें बतलाता हूँ ॥ २ ॥ एक दिन कृष्णजीको छोड़कर अकेले अर्जुन वनमें शिकार खेलने गये और घूमते घूमते दक्षिण दिशाकी ओर चले गये ॥३॥ उस समय सारथीके स्थानपर वे स्वयं थे और घोड़ोंको हांकते हुए चले जा रहे थे। इस तरह वनमें घूम-घूमकर दोपहरके समय तक उन्होंने बहुतसे वन्यजन्तुओंको मारा। इसके बाद स्नान करनेकी तैयारियां करने लगे ॥ ४ ॥ स्नान करनेके लिये वे सेतुबन्ध रामेश्वरके धनुषकोटीतीर्थपर गये, वहाँ स्नान किया और कुछ गर्वसे समुद्रके तटपर घूमने लगे। तभी उन्होंने एक पर्वतके ऊपर साधारण वानरका स्वरूप धारण करके हनुमान्जीको बैठे देखा। उस समय हनुमान्जी रामनाम जप रहे थे।