भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 769
७८२आनन्दरामायणे[ सर्गः १८

तमर्जुनोऽब्रवीद्वाक्यं किं नामाऽसि कपे त्वहम् । तदर्जुनवचः श्रुत्वा विहस्य कपिरब्रवीत् ॥८॥
यत्प्रभावाच्च रामेण शिलौघैः शतयोजनम् । बद्धोऽयं सागरे सेतुस्तं मां त्वं विद्धि वायुजम् ॥९॥
इति तद्गर्वसहितं वाक्यं श्रुत्वाऽर्जुनस्तदा । गर्वाद्धिहस्य प्रोवाच मारुतिं पुरतः स्थितम् ॥१०॥
वृथा श्रमेण सेत्वर्थे भ्रमः पूरे कृतस्त्वयम् । कथं तेन शरैः सेतुं कृत्वा कार्यं कृतं न हि ॥११॥
तदर्जुनवचः श्रुत्वा मारुतिः प्राह तं पुनः । मन्मुख्यकप भारेण शरसेतुः पयोनिधौ ॥१२॥
न्यम्जिष्यतीति मन्वा न चाकरोद्रघुनन्दनः । तक्कपेर्वचनं श्रुत्वाऽर्जुनो मारुतिमब्रवीत् ॥१३॥
कपिभारभयात्सेतुर्जले मग्नो भविष्यति । धनुर्विद्या मन्दिनः का तदा वानरसत्तम ॥१४॥
अधुनाऽहं करिष्यामि शरसेतुं तवाग्रतः । त्वं तस्योपरि नृत्यादि कुरुष्वात्र यथासुखम् । १५॥
धनुर्विद्या प्रभावं त्वं कपे पश्यतुमर्हसि । तदर्जुनगिरं श्रुत्वा तमाह सस्मितः कपिः ॥१६॥
ममाङ्घ्र्यङ्गुष्ठभारेण शरसेतुस्त्वया कृतः । चेन्मग्नः स्यात्समुद्रे हि तदा कार्यं त्वयाऽत्र किम् ॥१७॥
तत्कपेर्वाक्यमाकर्ण्य सोऽर्जुनः प्राह तं पुनः । यदि मग्नः शरसेतुस्त्वन्द्वागत्वरहं कपे ॥१८॥
विशाम्यत्रानलं सत्यं त्वं चाप्यत्र पणं वद । तत्प्रतिज्ञां कपिः श्रुत्वाऽर्जुन वचनमब्रवीत् ॥१९॥
मया स्वांगुष्ठभारेण त्वन्सेतुश्चेन्न लोपितः । तर्हि त्वद्ध्वजसङ्गोऽहं तव साहाय्यमाचरे ॥२०॥
तथाऽस्त्वित्यर्जुनः प्राह टङ्कयन्वै महद्धनुः । निमेषे शरजालैः सेतुं दृढतरं व्यधात् ॥२१॥
शतयोजनविस्तीर्णे सागरस्योध्वेऽतु स्थितम् । तं सेतुं मारुतिर्दृष्ट्वाऽन्नाग्रऽङ्गुष्ठभारतः ॥२२॥
अकरोत्सागरे मग्नं क्षणमात्रेण लीलया । तदा देवाः सगंधर्वाः किन्नरोगगराक्षसाः ॥२३॥
विद्याधराश्चाप्सरसः सिद्धाश्च गगनस्थिताः । मारुतिं धनुजस्पाग्रे ववृषुः पुष्पवृष्टिभिः ॥२४॥
तत्कर्मणाऽर्जुनश्चापि चिंतां कृत्वाऽग्निरोधसि । निवारितोऽपि कपिना देहं त्यक्तुं समुद्यतः ॥२५॥


पीले रङ्गके रोएं उनके शरीरपर बड़े अच्छे लग रहे थे॥ ५-७॥ उन्हें देखकर अर्जुनने पूछा-हे वानर ! तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है ? अर्जुनका प्रश्न सुना तो हँसकर हनुमान्‌जी बोले कि जिनके प्रतापसे रामचन्द्रजीने समुद्रपर सौ योजन विस्तृत सेतु बनाया था, मैं वही वायुपुत्र हनुमान् हूँ ॥८-९॥ इस तरह गर्वभर बचन सुनकर अर्जुनने बड़े गर्वसे हँसकर कहा कि रामने व्यर्थ इतना कष्ट उठाया। उन्होंने बाणोंका सेतु बनाकर क्यों नहीं अपना काम पूरा किया ॥ १०, ११॥ अर्जुनकी बात सुनकर हनुमान्‌जीने कहा हम जैसे बड़े-बड़े बानरोंके बोझसे वह बाणोंका सेतु डूब जाता, यही सोचकर उन्होंने ऐसा नहीं किया ॥ १२, १३ ॥ अर्जुनने कहा-हे वानरसत्तम यदि वानरोंके बोझसे सेतु डूब जानेका भय हो तो उस धनुर्धारीकी धनुर्विद्याकी क्या बड़ी विशेषता रही ॥ १४॥ अभी इसी समय मैं अपने कोदण्डसे बाणोंका सेतु बनाये देता हूँ, तुम उसके ऊपर आनन्दसे नाचो-कूदो ॥ १५ ॥ इस प्रकार मेरे धनुर्विद्याका नमूना भी देख लो अर्जुनकी ऐसी बात सुनकर हनुमान्‌जी मुस्कराते हुए कहने लगे कि यदि मेरे पैरके अंगूठेके बोझसे ही आपका बनाया सेतु डूब जाय तो क्या करिएगा ? ॥ १६, १७ ॥ हनुमान्‌जीकी बात सुनकर अर्जुनने कहा कि यदि तुम्हारे भारसे सेतु डूब जायगा तो मैं चिता लगाकर उसमें आगसे जल मरूँगा। अच्छा अब तुम भी कोई बाजी लगाओ। अर्जुनकी बात सुनकर हनुमान्‌जी कहने लगे कि यदि मैं अपने अंगूठेके ही भारसे तुम्हारे बनाये सेतुको न डुबा सकूँगा तो तुम्हारे रथकी ध्वजाके पास बैठकर जीवनभर तुम्हारी सहायता करूँगा ॥ १८-२० ॥ 'अच्छा, यही सही' ऐसा कहकर अर्जुनने अपने धनुषका टंकोर किया और अपने बाणोंके समूहसे बहुत थोड़े समयमें एक सुदृढ़ सेतु बनाकर तैयार कर दिया ॥ २१ ॥ उस सेतुका विस्तार सौ योजन था और वह सागरके ऊपर ही उतरा रहा था। उस सेतुको देखकर हनुमान्‌जीने उनके सामने ही अपने अंगूठेके भारसे डुबा दिया। उस समय गन्धर्वोंके साथ-साथ देवताओंने हनुमान्‌जीपर फूलोंकी वर्षा की ॥ २२-२४ ॥ हनुमान्‌जीके इस कर्मसे खिन्न होकर अर्जुनने