श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 770, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७५३
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णस्तं प्राह वटुरूपधृक् । ज्ञात्वाऽर्जुनमुखात्सर्वं पूर्ववृत्तं पणादिकम् ॥ २६ ॥
उभाभ्यां यच्चचरितं पूर्वं तच्च मृषा गतम् ।
साक्षित्वेन बिना कर्म सत्यं मिथ्या न बुद्ध्यते ॥ २७ ॥
साक्षित्वेनाधुना मेऽत्र युवाभ्यां कर्म पूर्ववत् ।
कर्त्तव्यं तदहं दृष्ट्वा सत्यं मिथ्या वदाम्यहम् ॥ २८ ॥
तद्वटोर्वचनं श्रुत्वा द्वावूचतुस्तथेति च । ततश्चकार गांडीवी शरसेतुं हि पूर्ववत् ॥ २९ ॥
सेतोरन्तर्गतं चक्रं श्रीकृष्णश्चाकरोत्तदा ।
ततः स्वांगुष्ठभारेण कपिः सेतुं प्रपीडयन् ॥ ३० ॥
सेतुं दृढं कपिर्ज्ञात्वा पादजानुकरादिभिः ।
बलेन पीडयामास स सेतुर्नैश्चचाल न ॥ ३१ ॥
तदा तूष्णीं हनूमांस्तं मंत्रयामास चेतसि । पूर्वं मयांगुष्ठमात्रत्सेतुश्चाधो विलोपितः ॥ ३२ ॥
हस्तादिभिः कृत नायमिदानीं न विलुप्यते ।
कारणं वटुरेवात्र वटुर्नायं हरिस्स्वयम् ॥ ३३ ॥
अस्तीत्यहं विजानामि स्मृतं पूर्ववरादिकम् ।
मद्गर्वपरिहारोऽद्य कृष्णेनानेन कर्मणा ॥ ३४ ॥
कृतोऽस्त्यत्र क्व कृष्णाये मन्मर्कटमुखोद्भवम् । इति निश्चित्य मनसि कपिः सोऽर्जुनमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
जितं त्वया वटोर्योगात्तत्र साहाय्यमाचरे ।
नायं वटुस्त्वयं कृष्णः सेतुचक्रमवेशकृत् ॥ ३६ ॥
स्वन्माहात्म्यार्थमत्रायातः सत्यं ज्ञातो मयाऽर्जुन ।
अनेन रामरूपेण त्रेतायां मे वरोऽर्पितः ॥ ३७ ॥
समुद्रके तटपर ही चिता तैयार की और हनुमान्जीके रोकनेपर भी वे उसमें कूदनेको उद्यत हो गये ॥ २५ ॥ इसी समय एक ब्रह्मचारीका रूप धारण करके श्रीकृष्णचन्द्रजी वहाँ आये ओर उन्होंने अर्जुनसे चितामें कूदनेका कारण पूछा । अर्जुनके मुखसे ही सब बात मालूम करके कहा कि तुम लोगोंने उस समय जो बाजी लगायी थी, वह निःसार थी । क्योंकि उस समय तुम्हारी बातोंका कोई साक्षी नहीं था । साक्षीके बिना सच झूठका कोई ठिकाना नहीं रहता । इस समय में तुम्हारे समग्र साक्षीके रूपमें विद्यमान हूँ । अब तुम लोग फिर पहले-की तरह कार्य करो तो मैं तुम्हारे कर्मोंको देखकर विजयपराजयका निर्णय करूँगा ॥ २६-२८ ॥ ब्रह्मचारीकी बात सुनकर दोनोंने कहा-ठीक है और फिर अर्जुनने पूर्ववत् सेतुकी रचना की २९। अबकी बार सेतुके नीचे कृष्णचन्द्रजीने अपना सुदर्शन चक्र लगा दिया । सेतु तैयार होनेपर हनुमान्जी पूर्ववत् अपने अंगूठेके भारसे उसे डुबाने लगे ॥ ३० ॥ जब हनुमान्जीने अबकी बार सेतुको मजबूत देखा तो पैरों, घुटनों तथा हाथोंके बलसे उसे दबाया, किन्तु वह जौ भर भी नहीं डूबा । ३१ ॥ चुपचाप हनुमान्जीने सोचा कि पहले तो मैंने अंगूठेके ही बोझसे सेतुको डुबा दिया था तो फिर यह हाथ-पैर आदि मेरे पूरे शरीरके बोझसे भी क्यों नहीं डूबता। इसमें ये ब्रह्मचारीजी ही कारण हैं। ये ब्राह्मण नहीं, बल्कि साक्षात् कृष्णचन्द्रजी ही हैं और मेरे गर्वका परिहार करनेके लिए ही इन्होंने ऐसा किया है। वास्तवमे है भी ऐसा ही । भला, इन भगवान्के सामने हम जैसे बानरकी सामर्थ्य ही क्या है । ऐसा निश्चय करके हनुमान्जीने अर्जुनसे कहा कि आपने इन ब्रह्मचारीकी सहायतासे मुझे परास्त कर दिया है। ये कोई वटु नहीं, साक्षात् भगवान् हैं। इन्होंने सेतुके नीचे अपना सुदर्शन चक्र लगा दिया है ॥३२-३६॥ हे अर्जुन ! मुझे यह बात मालूम हो गयी है कि ये आपकी