श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 782, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २ ] पूर्णाकाण्डम् ७६५
यावत्कथा मम शुभा स्थास्यत्याधुनाकिनी । तावच्छङ्खरूपेण त्वमत्र मृन्मयी चिरम् ॥६२॥ तथेति रामवचनाच्छङ्खरूपाऽथ सुमंगरी अग्रेऽथ मन्दिता दित्वा हेमा गोपेण साऽययौ ॥६३॥ अयोध्या नगराच्चाऽपि रामः सेनाबलं ययौ । यद्यप्याया नगरस्य प्रभावो न गतो दिनः ॥६४॥ अथ सीता महानागीमारुरोह सखीजनैः । पृथक् ता मुनिकानामाः समारुरुहुमङ्गनाः ॥६५॥ अथ रामो मुदा वेगात्समारुह्य गजोपरि । उवाच लक्ष्मणं वाक्यं पुष्पकैः सकलान् जनान् ॥६६॥ पंगूनन्धांश्चैव त्वं स्वबंधुभ्यां सुनादिभिः । नागरीः पृथक् शीघ्रं समारुह्य गजोपरि ॥६७॥ अनुगच्छन्तु मच्छ्रेष्ठे लक्ष्मणः स तथाऽकरोत् । अथ सर्वे नृपतयो नानायानेषु संस्थिताः ॥६८॥ ययुः स्वस्वबलैर्युक्ताः शीघ्रं श्रीरामपार्श्वतः । ययावग्रे ऽथ्र्यमग्नो रज्जुखालधारिभिः ॥६९॥ दृषद्विकारैस्ततक्षैश्च कुठारटङ्कपाणिभिः । ततो ययौ महानागः पताकाध्वजशोभितः ॥७०॥ ततो ययुर्यन्त्रहस्ता नानावाहनसंस्थिताः । ततो ययुः शस्त्रनाभिः पूरिताः शकटाः शुभाः ॥७१॥ ततोऽश्वसंस्था वाद्यानि वादयन्तो ययुर्भटाः । ततोऽश्वसंस्थाः ज्ञातयो ययुस्ते वस्त्रपाणयः ॥७२॥ ततो ययुर्मागपाथ वदिनो यानसंस्थिताः । नरा नटाभाश्चाथ यानस्थाः सुविभूषिताः ॥७३॥ ततस्ता वारनार्यश्च काश्चित्खट्वाङ्कवाहनाः । अपरेषु भटैर्मागे नृत्यन्त्यः प्रययुः सुखम् ॥७४॥ ततो ययुर्भूषितास्ते श्रीरामस्य तुरङ्गमाः । नराः पुष्टारुणिच्छन्नाः प्रमदास्तथा ॥७५॥ ययुस्तद्रूपतः शतशः सुवेश्मनः सुतोलियः । गंधेविनाश्चाः स्युत्किन्वस्तुर्गवादिषु संस्थिताः ॥७६॥ ततो ययुर्दण्डहस्ता दासीपुत्राः सुभूषिताः । ततो ययौ रामचन्द्रस्तत्पृष्ठे लक्ष्मणो ययौ ॥७७॥
रहती हुई मैं आपके वियोगका दुःख नहीं सह सकती। इसलिये मैं भी आपके साथ ही चलनेको तैयार बैठी हूँ। उसकी ऐसी बात सुनकर रामने ... कहा कि जबतक जगत्में मेरी परमपवित्री कथा विद्यमान रहे तबतक तुम शङ्खरूपसे मृन्मयी होकर यहीं निवास करो ॥६२॥ रामकी आज्ञानुसार उसने अपने आभूषण सुमंगरी ... और साथ चल पड़ी ॥६३॥ इसके बाद रामकी आज्ञा तथा मन्त्रके साथ-साथ सारी सेनाके साथ चल पड़ी। यद्यपि अयोध्या तथा सरयू के दोनों तटपर ... प्रभाव ज्योंका त्यों बना रहा, वह नहीं गया ॥६४॥ इसके अनन्तर सीताजी एक अगहना हस्तिनीपर सवार हुईं और उर्मिला आदि दूसरी हस्तिनियोंपर जा बैठीं ॥६५॥ इसके बाद राम भी प्रसन्नतापूर्वक गजराजपर सवार हुए और लक्ष्मणसे कहा कि समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ अन्धोंको पालकियोंपर बिठाकर गजपर सवार कराओ और स्वयं तुम अपने परिवारावालोंको हाथीपर बिठाकर मेरे पीछे-पीछे आओ। रामकी आज्ञानुसार लक्ष्मणने सब प्रबन्ध ठीक कर दिया। इसके बाद सब राजे अनेक प्रकारकी सवारियोंपर सवार हो-होकर अपनी-अपनी सेनाके साथ रामके पास आये। आगे-आगे वे मजदूर चले, जो रस्सियों तथा कुदाल लिये थे। पत्थर काटनेवाले तथा बढ़ई आदि विविध प्रकारके औजार लिये थे। उनके पीछे-पीछे एक बड़ा हाथी पताका और ध्वजाओंसे अलंकृत होकर चला। उसके पीछे अपने-अपने हाथोंमें बन्दूक आदि विविध प्रकारके शस्त्रवाले सैनिक तरह-तरहके वाहनोंपर सवार होकर चले। उनके पीछे शस्त्रादिसे भरी बैलगाड़ियाँ चल जा रही थीं ॥६६-७१॥
उनके पीछे-पीछे अनेक प्रकारके बाजे बजानेवाले लोग घोड़ोंपर बैठ-बैठकर चले। उनके पीछे बहुतस गूढ़-सवार हाथमें वस्त्र लिये हुए चले ॥७२॥ उनके पीछे वन्दीजन आरूढ़ होकर बहुतसे मागध और वन्दीजन चले जा रहे थे। उनके पीछे नटलोग और स्वांग बाँध-बाँधकर बैठी हुई वेश्यायें गाती-बजाती और नाचती हुई चली जा रही थीं ॥७३॥७४॥ उनके पीछे-पीछे रामके सुसज्जित हुए घोड़े और उनके पीछे पुष्पके समान वेष धारण किये, अनेक प्रकारके अलंकार पहन, तरह-तरहके शस्त्र लिये, परदेमें अपना मुख छिपाये और घोड़े आदि विविध सवारियोंपर सवार स्त्रियें चली जा रही थीं ॥७५॥ ७६॥ उनके पीछे हाथमें लाठिये लिये तरह-तरहके आभूषण पहने दासीपुत्रगण चले जा रहेथे। उनके पीछे भगवान् रामचन्द्र और लक्ष्मण, भरत,