श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 781, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७६४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २ |
|---|
पुनः पप्रच्छ तान्सर्वान्संस्थितान् रघुनन्दनः । युष्माकं पूर्वजाः सर्वं समायाता गजाह्वये ॥४६॥ भवतां रोचते युद्धं यदि तैः पूर्वजैः सह । आगन्तव्यं तर्हि सर्वै मया सह गजाह्वयम् ॥४६॥ नोचेद्गद्गद्भिर्गन्तव्यमित एव निजञ्चलम् । निर्बन्धोऽत्र न मे ज्ञेयः सर्वैः पार्थिवपुङ्गवैः ॥४७॥ इति रामवचः श्रुत्वा नृपा राघवमब्रुवन् । राम राम महावीर्य वयं सर्वे तवानुगाः ॥४८॥ स्वयैव वन्दिताः सर्वे तवान्नेन पोषिता वयम् । वीराः क्षत्रियवंशीया रणे नानप्रहाणिणः ॥४९॥ तवाज्ञया वधानोऽद्य पितृपुत्रान् रणाजिरे । नाभ्मांस्त्वं विद्धि राजेन्द्र स्वामिकार्यपराङ्मुखान्॥५०॥ इति तेषां वचः श्रुत्वा तानालिङ्ग्य स राघवः । संपूज्याभरणैर्वस्त्रैः सुखं सुष्वाप सीतया ॥५१॥ ततः प्रभाते श्रीरामः सीतया चो मगूनदीम् । स्नात्वा दानादि वं दन्त्वा सीतया विधिपूर्वकम् ॥५२॥ सभार्यो सरयू पुष्यां गन्तुं पप्रच्छ वै मुहुः । तद्रामवचनं श्रुत्वा सरयू राममब्रवीत् ॥५३॥ एतावत्कालपर्यन्तं स्थिता त्वद्दर्शनेच्छया । अद्यैवाद्य त्वया राम यास्यामि त्वत्पद न्वितः ॥५४॥ तदस्या वचनं श्रुत्वा तामाह राघव. पुनः । यावत्कथा मम शुभा स्थास्यत्यघाघनाशिनी ॥५५॥ तावत्त्वमश्वरूपाऽत्र वस लोकावनाशिनी । तथेति रामवचनादश्वरूप विधाय सा ॥५६॥ साकेतेऽथ पूर्णरूपं ययौ रामेण नत्पदम् । अथ रामः सरय्वाऽथो परिक्रम्य निजां पुरीम् ॥५७॥ साष्टांग तां नमस्कृत्य गन्तु पप्रच्छ पूज्य ताम् । अयोध्देऽम्ब नमस्तेऽस्तु त्वयाऽहं रक्षितान्वहम् ॥५८॥ आज्ञां ददस्व पृच्छामि परस्थल गन्तुमुद्यतः । क्षमश्च मदपराधांश्च पुनर्दर्शनमस्तु ते ॥५९॥ इति रामवचः श्रुत्वा पुरी राघवमब्रवीत् । एतावत्कालपर्यंतं स्थिता त्वद्दर्शनेच्छया ॥६०॥ यास्ये त्वया समथौं न सोढुं त्वद्विरहं त्वहम् । तनस्या वचनं श्रुत्वा पुरीमाह रघूत्तमः ।६१।
में बैठे। और-और रात को वर्षा समाप्त हुई तो रामने उनको अपना विचार सुनाया ॥४४॥ इसके अनन्तर रामने उन राजाओसे कहा कि आपके पूर्वज हस्तिनापुरीय युद्धके लिये आये हैं ॥४५॥ सो यदि आपलोगो-को भी युद्ध करना हो तो मेरे साथ हस्तिनापुर चलिये। ॥४६॥ यदि न इच्छा हो तो आप लोग अपनी-अपनी राजधानीको लौट जाइये, मैं आपलोगोसे किसी प्रकारका आग्रह नहीं करना चाहता ॥४७॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर उन राजाओने कहा-हे राम हे महाबली ! हम सब आपके अनुगामी हैं। आपने ही हम लोगोंका अभ्युदय किया है। आपके ही अन्नसे हम पले हैं, वीर क्षत्रियोंके वंशमं मेरा जन्म हुआ है। इस कारण आप यदि आज्ञा दें तो हम अपने पितृपातिकोंको संग्राममें अवश्य मारेंगे। हे राजेन्द्र ! आप कभी भी ऐसा न समझियेगा कि हम स्वामीके कार्य के करनेमें पराङ्मुख होंगे । ४८-५० । इस प्रकार उनके वचन सुनौ तो रामने उन सब राजाओंको हृदयसे लगाया, विविध प्रकारके वस्त्र-आभूषणोंसे उनकी पूजा की और जाकर आनन्दपूर्वक सीताके साथ शयन किया ॥५१॥ इसके अनन्तर सबेरे सीताके साथ रामचन्द्रजीने सरयूके तटपर जाकर स्नान दान किया। इसके बाद प्रणाम करके सरयूजीसे अपने नित्य परम धाम जानेकी आज्ञा मांगी। रामकी प्रार्थना सुनकर सरयून कहा-॥५२। ५३॥ अबतक आपके दर्शनोंकी इच्छासे मैं भी यहीं थी किन्तु हे राम जब आप जा रहे हैं तो मैं भी आपके श्रीचरणोंके साथ चलूँगी ॥५४॥ सरयूकी बात सुनकर रामने कहा-जबतक सब पापोंको नष्ट करने-वाली मेरी पुनीत कथा इस संसारमें विद्यमान है, तबतक भूमण्डलमें तुम भी यहीं रहते हुए सबोंके पाप दूर करती रहो । रामके कहनेपर सरयूने तत्क्षण अपना एक अंशमात्र बनाया, जिसमें वह अयोध्यामें रह गयी और पूर्णरूपसे रामके साथ चल पड़ी। साकेतोऽथ... कह...कर अपनी पावन पुरीकी परिक्रमा की और साष्टांग प्रणाम एवं पूजन करके परमधाम जानेकी आज्ञा मांगी और कहा-हे अम्ब प्रये ध्ये ! तुमने मेरी रक्षा की है। मैं अब अपने वैकुण्ठधाम जानेकी आज्ञा माँगता हूँ । मेरे अपराधोंकी क्षमा करो और मुझे आशीर्वाद दो कि फिर वर्षों में तुम्हारा दर्शन कर सकूँ ॥५५-५६ । इस प्रकार रामका बात सुनकर अयोध्यापुरीने कहा कि इतने दिनों तक मैं आपके दर्शन करनेके लिए यहाँ रही। आपके चले जानेपर दर्श-