भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 780, कुल 811 में से

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पृष्ठ 780

सर्गः २ ] उत्तरकाण्डम् ७६३

दत्त्वा कुशो नृपो विप्रान्धनं बहुतरं ददौ। प्रजाश्च पूजयामासुर्वस्त्राभरणसाधनैः ॥३०॥ ततः शत्रुघ्नपुत्राः प्रजाः स कुशभूपतिः। भोजयामास विप्रेभ्यः कोटिशः स कुशेश्वरः ॥३१॥ अथ राम्राज्ञया शीघ्रं सौमित्रिः सीतया सह। अन्तःपुराणि सर्वाणि निनाय नगरान्बहिः ॥३२॥ नानावाहनसंस्थानि नृत्यवाद्यादिमङ्गलैः। ययौ रामः स्वयं बन्धुपुत्रायैः सर्वतो वृतः ॥३३॥ द्विनिर्जयेत्युच्चैश्च स्तुतो मङ्गलनिःस्वनैः। ययोध्यास्रा बहिः पौरास्तं ययावग्रतः सुतः ॥३४॥ रथस्थश्चामराद्यैर्वीजितश्च पनेर्दश। विशेत् रामोऽग्रेसरनि तदा रामो जगौ गृह ॥३५॥ ननृतुश्चारणाश्चैव तदा शंस्यचापनः। ततः पौराः ब्राह्मणावांडालान् १ निर्ययुः ॥३६॥ विन्नुस्ते मार्गयेथानान् पूर्वाः पौरान्वनुस्पशन्। बालस्यासिकुलो वाबास्तत्पुर्या न बहिनिर्ययुः ॥३७॥ नासीन्कोऽपि तदा पुर्यां जनशून्या बभूव सा। अयोध्योन्मदना दृष्ण्या गजमुक्तकपिन्यवत् ॥३८॥ एतस्मिन्नन्तरे सर्वे दुर्भागांनिविरायिनः। जयद्रथातिरथ्याश्च ययुः सर्वेर्नृपांगजाः ॥३९॥ कोटिशो राघवं नेमुर्नतो नेमुः कुशेश्वरम्। उपहनानि रामाय कुशाय च पृथक् पृथक् ॥४०॥ दत्त्वा संपूजितास्तेषां तस्थुः सर्वे पृथग्जनाः। केचित्कनकवियंकेतुः कुशरथ्य एव च ॥४१॥ सुराष्ट्रपुर्यंकर्तुश्च ययुः सर्वे निजंगृहैः। साग्नींधाः मधुमत्थं सर्वारात्मे न्युपद्विनिः ॥४२॥ प्रयेयुः रामपादौश्च सीतावंशोऽपि सादरात्। समेत्यर्किगिराः सर्वे सोत्था भोजिता अपि ॥४३॥ तस्थुः सर्वे सभायां ते स्वस्वपौरजनैः सह। तदापश्यन् नृपान्संस्थान् रामो वृत्तं न्यवेदयत् ॥४४॥

बँके, उस समय सब प्रजाजनान उनको प्रनाम किया ॥२९॥ इस प्रकार कुशन ब्राह्मणोंको बहुत सा धन दिया और प्रजाजनने विविध प्रकारके वस्त्रा तथा आभूषणान कुशको पूजा का ॥३०॥ इसके बाद कुशने सब लोगोंको आदर-सत्कार किया और करोड़ों ब्राह्मणोंको भोजन कराया ॥३१॥ इसके अनन्तर रामकी आज्ञासे लक्ष्मण सीता आदि अपनी सब रानियोंको विविध सवारियों पर बिठाकर नगरके बाहर ले गये ॥३२॥ उस समय नगर में नृत्य गान आदि मङ्गलमय कार्य हो रहे थे। इसके अनन्तर राम भी बन्धुओं, पुत्रादिकोंके साथ अनेक प्रकारके गाजे-बाजेके साथ नगरके बाहर निकलते हुए अयोध्याके बाहर आ गये। उस समय कितने ही ब्राह्मण कनकदान आदि और व राजगण आपकी विरुदावलियोंका गान कर रहे थे ॥३३॥ ३४॥ जाते समय राम एक रथपर बैठे थे, उनपर छत्र लगा हुआ था और चमर ढल रहे थे। इस तरह चलते-चलते राम अपने घर पर पहुँचे, जहाँ कुश पहलेसे ही जा चुका था ॥३५॥ राम वहीं रुककर आगे फिर बढ़े ॥१॥ बाजा बज रहा था और लोग नाच रहे थे। कुछ देर बाद उच्च जातिसे लेकर चण्डाल पर्यन्त सब लोग श्रीरामचन्द्रके साथ ही अयोध्यासे अपने बाल-बच्चोंका साथ लिये हुए विदा होकर निकल पड़े। वे लोग अपने-अपने कुलके लोगोंको देखते हुए आगे चले जा रहे थे। यहाँ तक कि बिल-के चूहा तक बाहर आ गये ॥३६॥ ३७॥ उस समय सारी अयोध्या सूनी हो गयी। कोई भी इस नगरीमें हीं रह गया। जैसे मुनीके नगरका कहा गया था उस तरह की, जो दशा हाथीके पेटसे निकले कैथकी होती है। अर्थात् यह कि हाथी जब कैथके फलको खा लेता है तो उसका छिलका वैसा ही बना हुआ रह जाता है और मध्यभाग उस समय सब कैथका सम्पूर्ण भाग निकाल देते हैं किन्तु वह छिलकामात्र बनकर रह जाता है, उसमें कुछ जान अथवा कुछ तत्त्व नहीं रह जाता। वही दशा अयोध्याकी हो गयी थी। जिसके कारण वह अयोध्या जैसी लग रही थी, किन्तु उसमें कोई रहनेवाला नहीं था ॥३८॥ उस समय जनक द्वारा एकत्रित किये हुए जो भी अपनी-अपनी सेनाके साथ आ पहुँचे ॥३९॥ उन्होंने यहाँ आकर पहले तो श्रीरामको फिर कुशको प्रणाम किया और दोनोंको अलग-अलग विविध प्रकारके उपहार दिये ॥४०॥ और कुशजीसे प्रसन्न हुए कि राजपुत्र भी अपने अन्तःपुरकी स्त्रियों और पुत्रोंको लेकर वहाँ आये। उन्होंने राम की माताओं तथा रामको प्रणाम किया। रामने उनका उठ कर कुशल पूछा और अपने पुत्रके द्वारा अपने भोजन करवाकर भोजन कराया ॥४१॥ ४२॥ इसके बाद वे सब लोग अपने नगरवासियोंके साथ आकर सभा-

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