भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 779

७६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः २

एवं वदति राजेन्द्र पौरास्ते भयविह्वलाः । द्रुमा इव छिन्नमूला दुःखार्ताः पतिता भुवि ॥१३॥ मूच्छितो भरतश्चापि श्रुत्वा रामाभिभाषितम् । गर्हयामास राज्यं स प्राह दुःखार्तभृत्ततः ॥१४॥ सत्येन तु शपे नाहं त्वां विना दिवि वा भुवि । कांक्षे राज्यं रघूश्रेष्ठ शपे त्वामङ्घ्रयोः प्रभो ॥१५॥ अमुं योग्यं वरं राजन्नभिषिञ्चस्व राघव । अयोध्याशं कुशं वीरं सप्तद्वीपपतेः पदे ॥१६॥ अस्त्युत्तरकुरुष्वत्र जम्बूद्वीपपतेः पदे । छत्रोऽभिषेचितः पूर्वं स एव तेषु गच्छतु ॥१७॥ भरतेनोदितं श्रुत्वा सन्निनास्ताः समीक्ष्य च । प्रजा वै भयमन्विग्ना रामविश्लेषकातराः ॥१८॥ वसिष्ठो भगवान् राममुवाच सदयं वचः । पश्यतामङ्गणं सर्वाः पतिता भूतले प्रजाः ॥१९॥ तासां मानार्जुनं राम प्रसादं कर्तुमर्हसि । श्रुत्वा वसिष्ठवचनं ताः समुत्थाप्य पूज्य च ॥२०॥ सस्नेहो रघुनाथस्ताः किं करोमीति चाब्रवीत् । ततः प्रांजलयः प्राचुः प्रजा भक्त्या रघूद्वहम् ॥२१॥ गन्तुमिच्छसि वैकुण्ठं त्वमस्मान् नय प्रभो । यत्र गच्छसि त्वं राम त्वनुगच्छामहे वयम् ॥२२॥ अस्माकमेषः परमा प्राभिर्धर्मोऽयमक्षयः । तवानुगमने राम हृद्गता नो दृढा मतिः ॥२३॥ पुत्रदारादिभिः सार्धमनुयामोऽद्य सर्वथा । तपोवनं वा स्वर्गं वा पुरं वा रघुनन्दन ॥२४॥ ज्ञात्वा तेषां मनोदाढ्यं कारुण्याद्रघुनायकः । भक्तं पौरजनं दीनं बाढमित्यब्रवीद्वचः ॥२५॥ कृत्वैवं निश्चयं शदस्तस्मिन्नेवाहनि प्रभुः । कुशं समभिषेक्तुं वै चोदयामास लक्ष्मणम् ॥२६॥ सौमित्रिश्चापि गुरुणा विप्रैः पौरजनैस्तदा । शोभयित्वा स्वनगरीं कुशं तमभ्यषेचयत् ॥२७॥ अभिषेके कुशस्यासीन्महोत्साहो गृहे गृहे । रामावरोधे सुमहान्त्समुत्साहस्तदाऽभवत् ॥२८॥ तदा सिंहासनारूढं छत्रचामरशोभितम् । प्रजाः कुशं पतिं प्राप्य प्रणामं चक्रुरादरात् ॥२९॥


पर नहीं रह सकते ॥११॥ १२॥ श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर ये सब पुरवासी जडसे कटे हुए वृक्षोंकी भांति पृथ्वीपर गिर पड़े। रामकी बात सुनकर भरतजी भी मूर्छित ही गये। होश आनेपर उन्होंने राज्यकी भरपूर निन्दा की और दुःखित होकर उन्होंने रामचन्द्रजीसे कहा-मैं आपके चरणोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आपके बिना मैं पृथ्वी अथवा स्वर्गलोकका भी राज्य नहीं चाहता ॥१३-१५॥ हे राजन् ! हे राघव आप वीर कुशको इस सप्तद्वीपपतिके आसनपर बिठाल दीजिए ॥ १६॥ उत्तरकुरु नामके देशमें जम्बूद्वीपपतिके पदपर तो आपने छत्रका बहुत दिनो पहिले ही अभिषेक कर दिया है वह अपने पदपर चला जाय ॥ १७॥ इस प्रकार भरतकी बात सुनकर वहाँके जितने प्रजाजन थे, वे सब रामके वियोगरूप दुःखसे विह्वल और भयभीत हो गये ॥१८॥ उनकी यह दशा देखकर दयालु वसिष्ठजीने रामसे आदरपूर्वक कहा- हे राम ! देखिए, ये सब कितने दुःखी हैं। अतः जिस तरह इनकी सन्तोष हो सके, वही काम करिए। वसिष्ठजीकी बात सुनकर रामने उन लोगोंको उठाया, उनका सत्कार किया और पूछा कि मैं क्या करूँ, जिससे आप लोग लोग प्रसन्न हो सकेंगे। यह सुना तो सब लोग हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक रामचन्द्रजीसे कहने लगे-हे राम ! आप सब यदि वैकुण्ठलोकको जाना चाहते हों तो हमें भी अपने साथ लेते चलिए, हम सब भी आपके साथ-साथ चलेंगे ॥ १९-२२॥ इससे बढ़कर हमको और कोई लाभ नहीं होगा हम लोगोंके लिए यह अक्षय धर्मकार्य है। हे राम ! आपके साथ चलनेके लिए हमने दृढ़ निश्चय कर लिया है । २३॥ आज हम सब अपने परिवारके साथ आपके सङ्ग वैकुण्ठलोकको, तपोवनको, स्वर्गको अथवा अयोध्याको जायेंगे ॥ २४ ॥ रामचन्द्रजीने जब भक्तों और पुरजनोंकी इतनी दृढ़ता देखी तो साथ ले चलनेकी स्वीकृति दे दी। २५॥ इस तरह निश्चय करके रामने उसी दिन कुशका अभिषेक करनेके लिए लक्ष्मणसे कहा और रामके आज्ञानुसार गुरु, विप्र एवं पुरवासियोंके साथ लक्ष्मणने उसी दिन कुशका राज्याभिषेक कर दिया॥ २६॥ २७॥ कुशका अभिषेक करते समय अयोध्याके घर घरमें महान् उत्सव मनाया गया। विशेषकर रामके अन्तःपुरकी नारियोंने उत्सव मनाया ॥ २८॥ जब कि छत्र और चमर आदिसे सुसज्जित होकर कुश सिंहासनपर