भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 778

सर्गः २ ] पूर्णकाण्डम् ७११

तत्सर्वं राघवः श्रुत्वा परां मुदमवाप सः । विदुः सर्वे जनाश्चापि वैकुण्ठारोहणं प्रभोः ॥६१॥

इति शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये मनोहरकाण्डे सोमवंशानूरत्नाविस्तारो नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

( रामका सोमवंशियोंसे युद्धके लिए प्रस्थान )

श्रीरामदास उवाच

अथ रामस्तदा प्राह वाल्मीकिं मुनिसत्तमम् । आमन्त्र्यं त्वया तत्र मुनिभिस्तु गताह्वयम् ॥ १ ॥
तथेति स मुनिः प्राह राघवं भक्तवत्सलम् । ततः स लक्ष्मणं शीघ्रं राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
पत्राणि प्रेषयस्वाद्य कुमारान्राज्यसंस्थितान् । न्यस्यराज्ये मन्त्रिणश्च कृत्वाऽऽगम्यतां बलैः ॥ ३ ॥
एवमेव प्रलेख्यानि जम्बूद्वीपपतीन्प्रति । तथा द्वीपवर्तींश्चापि दूतास्तांस्त्वरयंतु नः ॥ ४ ॥
तथेति लक्ष्मणश्चोक्त्वा तथा चक्रे यथोदितम् । राघवेण समापृष्टे वाल्मीकिगुरुसन्निधौ ॥ ५ ॥
ततः प्राह पुनः श्रीमान् राघवो लक्ष्मणं मुदा । वासोगेहानि मेधानि बहिर्मम रघूद्वह ॥ ६ ॥
मुहूर्तो वर्तते शो भं सेनां चोदय सादरात् । आयुधान्यथ यंत्राणि जीर्णानि च बहूनि हि ॥ ७ ॥
पूर्वजैर्निहितान्येव कोशागारेषु वै सदा । तानि निष्कासनीयानि तेषां कालोऽद्य वर्तते ॥ ८ ॥
अन्तःपुराणि सर्वाणि बहिर्नेयानि मेऽग्रतः । अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य सीताऽप्यग्रेऽनुगच्छतु ॥ ९ ॥
कोशगाराणि सर्वाणि बहिर्नेयानि नाहनैः । हस्त्यश्वरथपादाता नेयाः सर्वे बहिस्त्वया ॥ १० ॥
इत्याज्ञाप्य रघुश्रेष्ठो लक्ष्मणं विनयान्वितम् । मन्त्रिणो नैगमांश्चैव वसिष्ठं चेदमब्रवीत् ॥ ११ ॥
अभिषेक्ष्यामि भरतं सप्तद्वीपपतेः पदे । लक्ष्मणे मां विना नैव भूम्यां वासं करिष्यति ॥ १२॥


के बादवाले कांतों की कथाओंको मिलजुलकर गान लगे ॥ ६० ॥ यह सब कथाय सुनकर रामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए और सर्वसाधारणके लोगोंको भी भगवान्‌की स्वर्गारोहणसम्बन्धी बात ज्ञात हो गयी ॥ ६१ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते पूर्णकांडे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

श्रीरामदास बोले—इतनी कथा सुनकर रामचन्द्रजीने वाल्मीकिसे कहा कि आप भी हस्तिनापुर अवश्य आइएगा ॥ १ ॥ महर्षि वाल्मीकिने भक्तवत्सल रामसे कहा—"बहुत अच्छा"। इसके बाद राम लक्ष्मणसे कहने लगे कि सब राज्योंके सिंहासनपर बैठे हुए कुमारोंके पास पत्र लिख दो कि वे अपने-अपने मन्त्रियोंके ऊपर राज्यका भार छोड़कर अपनी सेनाके साथ यहाँ आ जायें ॥ २ ॥ ३ ॥ इसी प्रकार पत्र जम्बूद्वीपवाले तथा द्वीपान्तरनिवासी राजाओंके पास लिख दो और दूतोंको कहा कि उन शीघ्र यहाँ आनेको कहें ॥ ४ ॥ "तथास्तु" कहकर लक्ष्मणजीने भी वैसा ही किया, जैसा कि रामचन्द्रजी ने सभाके वाल्मीकि तथा गुरु वसिष्ठके सम्मुख कहा था ॥ ५ ॥ इसके बाद श्रीरामचन्द्रजीने फिर लक्ष्मणसे कहा कि हमारे तम्बू-कनात आदि सामान बाहर ले चलो ॥ ६ ॥ कल बड़ा अच्छा मुहूर्त्त है। सेनाको भी शीघ्र तैयार हो जानेकी आज्ञा दे दो। बहुतसे शस्त्र जोजीर्ण हो गये हैं, जिनको मेरे पूर्वजोंने घरोंमें बन्द कर दिये थे उनका निकाल लो। क्योंकि आज उनके उपयोगका समय आ पहुंचा है ॥ ७-८ ॥ अन्तःपुरकी जितनी स्त्रियां हैं, उनको भी बाहर ले आओ। अग्निहोत्र लेकर सीता भी मेरे साथ चलें ॥ ९ ॥ मेरे जितने खजाने हैं उनको हाथी घोड़े तथा रथकी सहायतासे बाहर ले जाओ ॥१०॥ इस तरह लक्ष्मणजीको आज्ञा देकर मन्त्रियों, विद्वानों तथा वसिष्ठजीसे कहा कि अब मैं सातों द्वीपोंके आधिपत्यके पदपर भरतजीको बिठाऊंगा ! क्योंकि मेरे बिना लक्ष्मण इस भूमण्डल-