श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 784, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १ ] पूर्णकाण्डम् ७६७
चतुर्दशदिनं युद्धं कृतमेभिः सुदारुणम् । अधुना त्वं समायात इवैते स्थास्यन्ति भूतले ॥ ४ ॥
सुषेणस्य वचः श्रुत्वा तमप्याश्वासयन्प्रभुः । अथ रामः स जाह्नव्याश्चोत्तरे परमे तटे ॥ ५ ॥
सेनानिवासमकरोद्ददर्श रिपुवाहिनीम् । तां निशां समतिक्रम्य द्वितीये दिवसे ततः ॥ ६ ॥
चोदयामास युद्धाय वानरान् रघुनन्दनः । ततस्ते वानराः सर्वे जाह्नव्यामवलङ्घयन् च ॥ ७ ॥
रामं सीतां नमस्कृत्य निर्ययुः समरं मुदा । ततस्ते वानराश्चक्रुः सिंहनादान्भयङ्करान् ॥ ८ ॥
वादयामासुर्वाद्यानि ददृशुः शत्रुवाहिनीम् । नलाद्यास्तेऽपि श्रीरामसेनां दृष्ट्वाऽतिविस्मिताः ॥ ९ ॥
चकिता भयभीताश्च निर्ययुः संगरं जवात् । ततस्ते वानराः सर्वे गंगासमुल्लङ्घ्य वेगतः ॥ १०॥
दृषद्भिः पर्वतशृङ्गैः शिलाभिर्विटपैर्द्रुमैः । पदैः निजघ्नुः शत्रुवीरांस्ते कीर्त्तयन्तो रघूत्तमम् ॥११॥
नलवीराश्च ते सर्वे क्षुरैर्वाणैस्तीक्ष्णैः कपीश्वरान् । निजघ्नुः समरे वेगाद्बभूव तुमलो रणः ॥१२॥
अथ तैर्वानरैः सर्वे बलादृक्षैः प्रपीडिताः । पराङ्मुखाः कृताः सर्वे रणे नलसैनिकाः ॥ १३॥
तान् दृष्ट्वा ते नलाद्याश्च रणाद्भीरान् पराङ्मुखान् । निहतान्द्दिपरीतांश्चोदयामासुर्नृपांस्तदा ॥ १४॥
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे जम्बूद्वीपनिवासिनः । तथा द्वीपांतरोद्भूता ये ऽद्यापि पुरोदिताः ॥ १५॥
ययुर्युद्धाय सन्नद्धा नानावाहनसंस्थिताः । तन्समानागतान्दृष्ट्वा ययुः श्रीरामसैनिकाः ॥ १६ ॥
जम्बूद्वीपांतरस्थाश्च तथा द्वीपांतरस्थिताः । पुरातनाश्च नृपाः सर्वे नानावाहनसंस्थिताः ॥ १७॥
सुग्रीवश्वांगदश्चाथ हनुमांश्च विभीषणः । जाम्बवांश्च सुषेणश्च संपातिर्मकरध्वजः ॥ १८॥
गुहको भूरिकीर्तिश्च कंचुकंठः प्रनारदान् । तथाऽन्ये जनकाद्याश्च ययुः संग्रामभूतलम् ॥ १९॥
तदोभयोर्महानासीत्सैन्ययोर्हरिनिःस्वनः । नरवाद्यानि च नेदुरुभयोः सैन्ययोः पृथक् ॥ २०॥
तदा ब्रह्मादयो देवाः शिवेन सहिताश्च खे । सयुधनाथ सोमेन देवेन्द्रेण युता मुदा ॥ २१॥
नानाविमानमारूढा ददृशुर्युद्धकौतुकम् । अथ चन्द्रादयो देवाश्चक्रमंत्र परस्परम् ॥ २२॥
प्रतापसे मैंने चौदह दिनों तक इन लोगोंके साथ भयंकर युद्ध किया है। अब आप भी आगये हैं तो ये दुष्ट बचकर कहाँ जावेंगे ॥ ३ ॥ ४ ॥ सुषेणकी बात सुनकर रामने भी उसे आश्वासन दिया और गङ्गाके उत्तरी तटपर अपना सेनानिवास बनाया ॥ ५ ॥ वहींसे ही शत्रुको सेना देखी। रात बीत जानेपर सवेरे ही रामने वानरोंको युद्धके लिए विदा किया। रामकी आज्ञासे वे लोग सीता तथा रामको प्रणाम करके बड़ी प्रसन्नतासे गंगाजीको पार करके संग्रामभूमिमें जा पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने भयङ्कर सिंहनाद किया, विविध प्रकारके शङ्ख बाजे बजाय और शत्रुको सेनापर धावा बोल दिया। रामकी सेनाको देखकर वे नल आदि राजे बड़े विस्मित हुए ॥ ६-९ ॥ वे तुरन्त अपनी सेनाके साथ युद्धके लिए जा डटे। इसके अनन्तर वे सब वानर पत्थरके बड़े-बड़े खण्ड और वृक्ष ले-लेकर रामचन्द्रजीकी जयजयकार करते हुए शत्रुदलके वीरोंका संहार करने लगे ॥ १० ॥ ११ ॥ उधर नलकी सेनाके भी वीर अपने तीखे शस्त्रोंसे वानरोंको मारने लगे। इस तरह बहु देर तक घमासान युद्ध हुआ और वानरोंने अपनी वृक्ष पाषाणवर्षासे शत्रुओंके छक्के छुड़ा दिये। जिससे नलके सैनिकोंको वहांसे पीछे हटना पड़ा ॥ १२ ॥ १३ ॥ इस तरह अपने वीरोंको भागते देखकर नल आदिने और-और राजाओंको प्रोत्साहित किया ॥ १४ ॥ इससे जम्बूद्वीपके अन्यान्य द्वीपोंके राजे जिनकी गणना पीछे कर आये हैं, वे सब अनेक प्रकारके वाहनोंपर आरुढ़ हो-होकर बड़ी तैयारीके साथ निकल पड़े। उन लोगोंको युद्धभूमिमें उपस्थित देखकर रामके सैनिक जा डटे । १५ ॥ ॥ १६ ॥ उधर जम्बूद्वीप तथा अन्यान्य द्वीपोंके राजे उपस्थित थे। इधर सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान्, विभीषण, जाम्बवान्, सुषेण, सम्पाती मकरध्वज, भूरिकीर्ति, कञ्चुकण्ठ तथा जनक आदिवीर लड़नेके लिए संग्रामभूमिमें डटे हुए थे। उस समय दोनों ओरके सैनिक बहुत जोर-जोरसे सिंहनाद कर रहे थे और विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे ॥ १७-२० ॥ उस समय शिव, बुद्ध, शेष और इन्द्र आदि देवताओंको साथ लेकर