भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 785

७६८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

महाभयं समुत्पन्नं प्रलयोऽद्य भविष्यति । ब्रह्मदत्तवराश्चैते सोमवंशोद्भवा नृपाः ॥२३॥ रामो विष्णुरयं साक्षात्कथं जयपराजयौ । भविष्यतः कथं युद्धनिवृत्तिरुभयोरपि ॥२४॥ भविष्यति उपायः कः कार्यो युद्धानिवृत्तये । तदा ब्रह्मा सुरान्प्राह किंचिद्दृष्ट्वा ह्ययं रणम् ॥२५॥ करिष्यामस्तयोः सख्यं रामसोमजयोस्स्विह । इत्युक्त्वा मकलान्वेधा ददर्श रणकौतुकम् ॥२६॥ तयोस्तयोः सैन्ययोश्च बभूवुर्यन्त्रनिःस्वनाः । यन्त्रोत्थवह्निज्वालाभिव्याप्ता दश दिशोऽभवन्॥ २७॥ यन्त्रोत्थनानागुटिकाभिनिजघ्नुस्ते परस्परम् । शतघ्नो सैन्यथा जग्मुः शस्त्रमुख्याश्शिरादगत् ॥२८॥ तथा वीरा निजघ्नन्ते बाणैः खङ्गैः परस्परैः । पट्टशै तोमरैश्च भिंदिपालैश्च मुद्गरैः ॥२९॥ परिघैश्चक्रबाणैश्च कुंतैः शूलैश्च पट्टिशैः । तदा जघान पितरं पुत्रः पुत्रं तथा पिता ॥३०॥ पितामहस्तथा पौत्रं पौत्रश्चापि पितामहम् । अन्योऽन्यं कुलजात्यादिशब्दिका मन्नाम वै मुहुः ॥३१॥ तथा रणे प्रपौत्रं च जघान प्रपितामहः । तथा रणे प्रपौत्रोऽपि जघान प्रपितामहम् ॥३२॥ मातामहं तु दौहित्रस्तदा बाणैरताडयत् । तथा मात महश्चापि दौहित्रं च रणेऽहनत् ॥३३॥ एवं परस्परं घोरमियुद्धं लोमहर्षणम् । तत्र ये ये हता धीरैः सगरे रामसेवकाः ॥३४॥ तान्सर्वान् जीवयामास तदा पवननंदनः द्रोणावत्यौषधीभिश्च वार वारं स्वसैनिकान् ॥३५॥ रिपुसैन्ये मृता ये ते मृता एव तु नोत्थिताः । एव तदा सोमवशेनृपाम्ने क्षीणतां ययुः ॥३६॥ तदा लोहितपूरा सा बभूव सुरनिम्नगा । अर्बुपप्रमिता सेना नलादीनां तदा रणे ॥३७॥ निपातिता शथवीर्येर्नृपैः सा दरसंगरैः । एवं बभूव समरः षण्मासं हस्तिनापुरे । ३८॥ ततस्ते सोमवंशस्था नृपाः किंचिद्बलान्विताः । विषण्णा विगतात्साहा निर्ययुः सगरं स्वयम् ॥३९॥ तानागतांस्तदा वीक्ष्य कुश्याद्या बालकाश्च ते । रामदोर्भा ययुस्सग्रे स्थस्था रणभूतलम् ॥४०।

अपने वाहनपर बैठे हुए ब्रह्माजी आकाशमण्डलमें आ पहुंचे और उन लोगोंका वह भयानक युद्ध देखने लगे । कुछ देर बाद चन्द्रमा आदि देवताओंने आपसमें कहा कि यह बड़ा भयावह समय आ पहुंचा है, ऐसा लगता है कि आज प्रलय हो जायगा । इधर ये सोमवंशी राज ब्रह्मासे वर प्राप्त किये हुए हैं इसलिए किसीसे पराजित नहीं होंगे, उधर रामरूप धारण किये साक्षात् विष्णुभगवान् लड़ने आये हैं। ऐसी अवस्थामें जय-पराजय कस ही सकता है ? और यदि यह झगड़ा है तब उसका विचार किया जाय तो कैसे हां । २१-२४॥ उनकी बात सुनकर ब्रह्माने कहा कि हम यथा दण्डक इनका युद्ध समाप्त इन दोनोंमें सन्धि करवा देंगे । ऐसा कहकर ब्रह्माजी युद्धकौतुक देखने लगे। उस समय दोनों सेनाओंमें तोप बन्दूक आदिकी भयंकर गर्जना सुनायी पड़ रही थी। उन यंत्रोंके मुखसे निकलते अगारोकी लपटों से दशों दिशायें व्याप्त हो गयीं । २५-२७॥ बन्दूकोंकी गोलियोंसे आपसमें एक दूसरेको मार रहे थे। दूसरी ओर बन्दूकोंकी बन्दूकियांपर रक्खी हुई नालें अग्या अगल उगल रही थी । दोनों पक्षके वीर बाणों पट्टिश आदिसे लड़ रहे थे। उस समय युद्धके मदसे मतवाले होकर पिता पुत्रको, पुत्र पिताको, पौत्र पितामहको तथा पितामह पौत्रको अपना ग्राम-कुल आदि बतलाकर मार रहा था, प्रपितामह प्रपौत्रको, प्रपौत्र प्रपितामहको, दौहित्र मातामहको और मातामह दौहित्रको निशङ्कभावसे मार रहा था ॥ २८-३३॥ इस तरह परस्पर लोमहर्षक युद्ध हो रहा था उस समय संग्राम-भूमिमें जो-जो रामके सैनिक मरते थे, उन हनुमान्‌जी द्रोणाचलकी संजीवनी बूटीसे जीवित कर लिया करते थे ॥३४॥ किन्तु शत्रुंकी सेनामें जो मरे, वे मर ही रह गये। इस कारण वे सब सोमवंशी राजे धीरे-धीरे कंवबल हो गये । ३६ । उस संग्राममें रुधिरकी गंगा बह चली और रामके सैनिकोंने नल आदि राजाओंकी बारह पद्म सेनाका संहार कर डाला । इस तरह छह महीने तक हस्तिनापुरीमे बहु महासंग्राम होता रहा । ॥ ३७॥ ३८ ॥ अन्तमें वे सोमवंशी राजे अपनी थोड़ी-सी सेना लेकर स्वयं संग्रामभूमिमें आये ॥ ३९ ॥ उनको आये देखकर कुश आदि बालक रथ-