भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 811 में से

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पृष्ठ 83

सर्गः ७ ] सारकाण्डम् ६७


सीताया गच्छ बंधुं मस्त्रीष्याशु मृगं ययौ । ततः पलायनं चक्रे मृगो रामं विरूपयन् ॥ ९१ ॥
शमबाणेन भिन्नांगः शब्दं दीर्घं चकार सः । हा सौमित्रे रमागच्छ हा हतोऽस्म्यथ कानने ॥ ९२ ॥
इत्युक्त्वा रामवद्वाचा ममार रुधिरं वमन् । तं शब्दं जानकी श्रुत्वा चोदयामास लक्ष्मणम् ॥ ९३ ॥
सोऽप्याह रामवत्तन्न नेदं गीर्न भयं त्यज । ततः सा तं पुनः प्राह जानामि तव चेष्टितम् ॥ ९४ ॥
भरतस्योपदेशेन मृतिं रामस्य वाञ्छसि । अथवा मेऽभिलाषोऽस्ति तर्हि प्राणान् त्यजाम्यहम् ॥ ९५ ॥
तच्छ्रुत्वचनं पश्याः श्रुत्वा वाच्या महद्वचम् जानकीं प्राह सौमित्रिर्मातः शृणु वचो मम ॥ ९६ ॥
रामवाक्यं ह्युरस्कृत्य जनन्याज्ञा मया नया । ताडितं वाक्यशरेणाद्य भेष्यस्यस्याद्यचञ्चलम् ॥ ९७ ॥
तथापि शृणु मद्वाक्यं यन्मयाऽऽरोप्यते हितम् मर्य्या धनुषो रेखा कृतां लक्ष्मणतोऽधुना ॥ ९८ ॥
त्वद्रक्षणार्थं दुष्टानां दुर्लंघ्यां महदापदाम् । मा समुल्लङ्घयस्येनां प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥ ९९ ॥
इत्युक्त्वा धनुषः कोट्या कृत्वा रेखां समंततः । वाष्पदेरो पञ्चवट्याः सौमित्रिः परियोपनाम् ॥ १०० ॥
नत्वा सीतां नमस्कुर्व्या ययौ रामं त्वरान्वितः । एतस्मिन्नन्तरे तत्र रावणो भिक्षुरूपधृक् ॥ १०१ ॥
गत्वा पञ्चवटीद्वारं रेखायाश्च बहिः स्थितः । वाग्यतोऽपि वै चोक्त्वा तूष्णीं तस्थौस राक्षसः ॥ १०२ ॥
तामाज्ञायामयौ सीता भिक्षां तस्मै समर्पयितुम् । ययौ द्वारं दीर्घहस्ता गृहाभ्यन्तरवर्तिनी रम् ॥ १०३ ॥
तदा भिक्षुः पुनः प्राह सीतां पङ्कजलोचनाम् भगिनी गुरोर्यन्तेण भिक्षामेनां त्वयाऽर्पिताम् ॥ १०४ ॥
गार्हस्थ्यं चेट्यधर्माय ग्रसितुं न्व समिच्छामि । तर्हि रेखां समुल्लङ्घ्य मां भिक्षां दातुमर्हसि ॥ १०५ ॥
तद्भिक्षोर्वचनं श्रुत्वा ऽधर्माऽभून्मेति शंकिता रेखाद्वहि सव्यपादं दत्वा दीर्घेणमण्डरा ॥ १०६ ॥
गृहाणैषा वरं भिक्षामिति न प्राह जानकी । ततोऽद्रामध्यस्थां पुन्त्रा भिक्षुरूपं विसृज्य च ॥ १०७ ॥
स्ववाहे रथे सीतां सन्ध्याभ्यामन्ववर्तत अवादूच्छति वेगेन तावदृष्टो जटायुषा ॥ १०८ ॥


नियुक्त करके शीघ्र मृगके पीछे चल दिए । दृष्टिका चञ्चल आगे दौड़ता हुआ उन्हें बहुत दूर जंगलमें दौड़ा ले गया ॥ ९० ॥ ९१ ॥ वहां बाणसे घायल होकर वह श्रीराम नामक स्वरसे चिल्लाने लगा हा लक्ष्मण ! मैं कानन में मारा गया शीघ्र आओ । ९२ । इतना कहकर जानसे वह वमन करता हुआ मर गया । उस शब्दको सुनकर जनकनन्दिनी जानकीने शीघ्र ही ॥ ९३ ॥ लक्ष्मण बोले- हे सीते ! यह रामका वाक्य नहीं है, मत डरो । सीता फिर कहने लगी कि मैं अब तुम्हारे अभिप्रायको जान गयी ॥ ९४ ॥ तुम भरतके कहनेके अनुसार रामका मरण अथवा रामके मर जानेपर मुझे मांगना चाहते हो । परन्तु याद रखो, मैं तुम्हारे उचित या स्त्री नहीं होने की और तथा मर जाऊंगी ॥ ९५ ॥ सीताके इस वचनको सुनकर सुमित्रापुत्र लक्ष्मण जानकी से कहने लगे- हे माता ! मेरी बात सुनो ॥ ९६ ॥ रामकी आज्ञासे तुम्हारी रक्षण रूपान्तर पूर्वक तुमने जो बाणरूपी बाणसे ताड़ित किया है उसका फल तुम शीघ्र पाओगी । ९७ ॥ तो भी मेरे कहे हुए इस हितकारी वचनको सुन लो । धनुषसे तुम्हारे आगे आज यह रेखा खींच रहा हूँ ॥ ९८ ॥ यह दुष्टोंके रक्षाके लिए और दुष्टोंके लिए दुर्लंघनीय तथा महान् भय उत्पन्न करनेवाली होगी । प्राणोंके कण्ठमें आ जानेपर भी तुम इस रेखाका उल्लङ्घन नहीं करना ॥ ९९ ॥ ऐसा कहकर धनुषके अग्रसे लक्ष्मण पञ्चवटीके बाहर खाईकी भांति सीमाकी बाण और रेखा खींच दी ॥ १०० ॥ तदनन्तर सीताको प्रणाम करके लक्ष्मण शीघ्र रामकी ओर चल दिये । उस समय रावण भिक्षुकका रूप धारण करके पंचवटीके द्वारपर जाकर रेखाके बाहर खड़ा हो गया और 'भवति भिक्षान्देहि' कहकर चुप हो रहा । १०१ । १०२ ॥ तब कृपामयी सीता उसको भिक्षा देनेके लिये बाहर आयी और हाथ बढ़ाकर भिक्षुसे 'भिक्षा लो' ऐसा कहा । १०३ । तब कमलके समान नेत्रोंवाली सीतासे भिक्षुने कहा कि मैं रेखाके भीतरसे दी हुई अन्न नहीं लेता ॥ १०४ ॥ यदि तुम गार्हस्थ्य आश्रमकी रक्षा करना चाहती हो तो रेखाके बाहर आकर भिक्षा दो ॥ १०५ ॥ भिक्षुके इस वचनको सुनकर 'कहीं शाप न लगे' इस डरसे बायें पाँवको रेखाके बाहर रख और लम्बा हाथ करके ॥ १०६ ॥ जानकी 'यह भिक्षा लो' ऐसा बोली । तभी रावणने उनको पकड़ लिया और भिक्षुका रूप त्याग तथा सीताको रथोंके ऊपर बिठाकरके पीछे

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