भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

६८ आनन्दरामायणे [सर्गः ७

चकार तुमुलं युद्धं रावणेन स पक्षिराट् । निजपद्भ्यां मुखेनाथ चूर्णीकृत्य रथोत्तसम् ॥१०९॥ मगवृष्टिं विनिजित्य बभञ्ज तद्धनुर्महत् । मुकुटं न दश मंछिद्य कृत्वा देहं तु जर्जरम् ॥११०॥ मूर्च्छितं रावणं कृत्वा तां सीतां नेन्यवैनयत् । स्वस्थाभूतो दशास्योऽपि ताडयामास तं पदा ॥१११॥ क्रोधेन भृशताविद्धः पक्षिणा जर्जरीकृतः । ततो जटायुः पतितो वमन् रक्तं मुखेन सः ॥११२॥ ततो विहायसा सीतां निनाय रावणः पुनः । रामरामेति जल्पन्ती सीताऽभूम्यस्तलोचना ॥११३॥ उत्ससर्ज वरध्वाध पथि स्वाभरणानि सा । दृष्ट्वाऽधः पर्वते प्रोच्चैः संस्थितान् पञ्च वानरान् ॥११४॥ प्राक्षिपत्कपिमध्येऽथ भूषनानि नृपोत्तमम् । ततो दशास्यस्तां नीत्वा ह्यशोके सन्यवेशयत् ॥११५॥ प्रार्थयामास तां सीतां नोत्तां सा ददौ तदा । तस्याः संरक्षणार्थाय राक्षसीश्च सहस्रशः ॥११६॥ आज्ञापयद्गृहास्वः स स्वयं गेहं विवेश ह । तदेन्द्रो ब्रह्मवाक्येन पायसं वर्षतुष्टिकृत् ॥११७॥ ददौ रहस्य सीतायै तेन तुष्टा बभूव सा । समर्प्य पायसं किंचिद्रामाय लक्ष्मनाय च ॥११८॥ सुरातिथिभ्यो दत्त्वा दत्वा धेनु च खेचरान् । दत्त्वाऽथ त्रिजटां किंचिद्भक्षयामास जानका ॥११९॥ मन्त्र्य रावणेनापि राक्षसांश्च षोडश । प्रैषिता रामघातार्थं ते कबन्धेन भक्षिताः ॥१२०। यत्र यत्र पञ्चवट्यां रामवाणभयान्मृगः । चचार गौतमीतारे सस्थानं तत्र तत्र हि ॥१२१॥ स्थानसङ्ख्यान्यनेकानि जग्रान्ति च पुराणि हि । मृगस्य पतितं यत्र नूपुरं परिधावता ॥१२२॥ नूपुराख्यो महाग्रामः प्रोच्यते गौतमात्तटे । गमबाणप्रहारेण चपलाक्षोऽपतद्भुवि ॥१२३॥ मृगो यत्र महाँस्तत्र चापल्याग्राम इष्यते । गौतमातटे ग्रासभूम्यां रामवाणहतो मृतः ॥१२४॥ पतितो यत्र तच्चिह्ने दृश्यतेऽद्यापि मानवः । सौमित्रिचापजा रेखा पञ्चवट्याः समन्ततः ॥१२५॥

सीता जब भासा जा रहा था, तभी जटायुन उसे देख लिया ॥ १०७ । १०८ ॥ तब पक्षिराज जटायुन रावणके साथ तुमुल युद्ध किया अपने पाँवों और चांचसे मार-मारकर उसके रथका चूर-चूर कर दिया ॥ १०९ ॥ भंडी गदाद्वारा पीठ डाला। उसका बड़ा भारी धनुष तोड़ दिया। मुकुटोंको काट डाला और उसके शरीरको जर्जरित कर दिया ॥ ११० ॥ इतना ही नहीं, रावणको मूर्च्छित करके वह सीताको लौटा लाने लगा। तभी रावण भी स्वस्थ होकर उसको पाँवोंसे मारने लगा ॥ १११ ॥ बड़ा क्रोध करके रावणने पक्षीको और पक्षीने रावणको जर्जर कर दिया, अन्तम जटायु घायल होकर धरनीपर गिर पड़ा ॥ ११२ ॥ तब रावण सीताको लेकर आकाशमार्गसे लङ्काकी ओर लौटपड़ा। अभागी सीता नीचे झाँकती 'हा राम-हा राम' चिल्लाने लगी ॥ ११३ ॥ उसी समय उन्होंने नीचे एक उन्नत पर्वतके शिखरपर बैठे हुए पाँच बन्दर सुग्रीव-हनुमान् आदिको देखा और अपनी साड़ी को फाड़ तथा उसके टुकड़ेमें अपने गहने बांधकर वही गिरा दिये। उधर दश-मुख रावणने सीताजी को जाकर लङ्काके अशोकाटविकामें रखा ॥ ११४ ॥ ११५॥ प्रेम करनेके लिये उसने सीता-से बड़ी प्रार्थना की, परन्तु सीता किसी प्रकार सहमत नहीं हुई और न उसकी बातोंका कुछ उत्तर ही दिया। उनका रक्षाके लिये रावणने वहाँ हजारों राक्षसिय नियुक्त कर दीं ॥ ११६ । उनको रक्षा करनेकी आज्ञा देकर रावण अपने महलमें चला गया। इसी अवसरपर ब्रह्माके कहनेसे इन्द्रने वहाँ जाकर छह भर तक भूखको मिटा-कर सन्तुष्ट रखनेवाला पायस (खीर) एकान्तमें सीता को दिया। इससे सीता बड़ी प्रसन्न हुई। उन्होंने राम तथा लक्ष्मणके नाम उसमेंसे कुछ पायस निकाला ॥ ११७॥ ११८ ॥ कुछ देवताओंको दिया। कुछ गोवो तथा पक्षियोंको खिलाया और थोड़ासा त्रिजटाको देकर बादमें बची हुई थोड़ीसी खीर जानकीने स्वयं खाया ॥११९॥ तदनन्तर रावणने सलाह करके सोलह राक्षसोंको रामको मारनेके लिये भेजा, परन्तु वे सब रास्तेमें ही कबन्ध-के द्वारा खा डाले गये ॥ १२० ॥ उस समय पञ्चवटीमें रामके बाणके भयसे जहाँ-जहाँ मृगरूपी मारीच गया था, गौतमीके किनारे वहाँ सर्वत्र अनेक नामवाले स्थान स्थापित हुए। जिस जगह दौड़ते हुए मृगका नूपुर गिर पड़ा था, वहाँ नूपुरपुर नामका बड़ा भारी गाँव बस गया। रामके बाणके ताड़ित होकर चपल नेत्रोंवाला मृग जहाँ पृथ्वीपर गिर गया था, वहाँ बड़ा भारी चापल्य नामका गाँव अब भी बसा हुआ दीखता है, गोदावरीके किनारे