भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 811 में से

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७८आनन्दरामायणे[ सर्ग ८

सीतायुक्तं त्वया पूर्वं क्षणेन रावणेन हि। दत्ताऽभविष्यत्सीताद्य मया तव मया तदा ॥६९॥
अधुना प्रार्थयामि त्वामङ्गदं परिपालय इत्युक्त्वा स तदा वाली जहौ प्राणान् रणाङ्गणे ॥७०॥
अङ्गदेन तदा रामः कारयामास संस्कियाम्। अथ रामं च सुग्रीवो राज्यार्थं प्रार्थयत्तदा ॥७१॥
तमन्तमेव राजानं चकार लक्ष्मणेन सः। अथ वार्षिकमासांश्च वस्तुं रामोऽविचिन्तयत् ॥७२॥
प्रवर्षंणगिरेः प्राप्यशिखरे स्फाटिकोद्भवाम्। रम्यां दृष्ट्वा गुहां रामः पत्रपुष्पसमन्विताम् ॥७३॥
निनाय वार्षिकांन् मासान् चतुरः श्रीरघूद्वहः। एकदा लक्ष्मणः स्नात्वा यावद्रामं समन्ततः ॥७४॥
सात्त्विक्या सीतया युक्तमपश्याद्रामे निर्गतः। सौमित्रिणा वन्दिता सा पुनरंशे लयं ययौ ॥७५॥
एवं नासीत्तदा सीताविप्रयोगो राघवस्य हि। सुग्रीवोऽथ पुरीमध्ये चकार राज्यमुत्तमम् ॥७६॥
एकदा हनुमद्वाक्याद्वानरान् समाह्वयत्। प्रवर्षंणगिरौवसन्तों तांश्च द्वे रामलक्ष्मणौ ॥७७॥
एतस्मिन्नन्तरे रामो दृष्ट्वा प्राप्तं शरद्मृतुम्। क्रोधेन प्रेषयामास सुग्रीवाय लक्ष्मणं च सः ॥७८॥
सोऽपि गत्वाऽथ किष्किन्धां भीषयामास वानरान्। आगतं लक्ष्मणं श्रुत्वा सुग्रीवो भयविह्वलः ॥७९॥
मारुतिं प्रेषयामास सान्त्वनार्थं हि लक्ष्मणम्। स गत्वा तं सान्त्वयित्वा किष्किन्धामानयत्तदा ॥८०॥
एतस्मिन्नन्तरे तारां प्रेषयामास वानरः साऽपि गत्वा मध्यकक्ष्यां प्रस्थितं तं ददर्श ह ॥८१॥
लक्ष्मणं सान्त्वयामास वचोभिर्मधुरैर्निजैः। समाहूतानि सैन्यानि समर्थे प्लवगेन हि ॥८२॥
सुग्रीवे च वृथा कोपो मा कार्याऽद्य हि देवर ततो लक्ष्मणहस्ते सा गृत्वा राजगृहं ययौ ॥८३॥
दृष्ट्वा सुग्रीवराजस्तस्मादासन्त् चचाल सः, सुग्रीवं लक्ष्मणः प्राह विस्मृतोऽपि रघूत्तमम् ॥८४॥
वाली येन हतो वीरः स वाणस्त्वां प्रतीक्षत। त्वमद्य वालिनो मार्गं गमिष्यसि मया हतः ॥८५॥


हाथों मरनेसे आपके सम्बन्धरहित शुभ गतिको प्राप्त हुआ। वालीने फिर कहा-यदि आप मेरे पास आते तो मैं तुरन्त आपका संशाका बना रवाना तथा रावणन संशाको लाकर छीन आपकेम आपको दे देता । ६४-६९ ॥ अपुनु अब में प्रार्थना करता हूँ कि आप अङ्गनदकी रक्षा कीजिएगा। इतना कहकर वालीने उसी समय रणाङ्गणमें प्राण छोड़ दिया ॥ ७० ॥ तदनन्तर रामने अङ्गदसे उसका क्रियाकर्म कराया। बादमें सुग्रीवने रामसे वह राज्य ग्रहण करनेके लिये प्रार्थना की ॥ ७१ ॥ तब रामने लक्ष्मणको भेजकर सुग्रीवको वहाँ- का राजा बना दिया अब राम वरषाऋतुमें कहीं चातुर्मास निवास करनेका विचार करने लगे ॥७२॥ तद्नुसार उन्होंने वहाँ प्रवर्षणगिरिके उस शिखरपर सुन्दर पत्तों-पुष्पोंकी लताओंसे वेष्टित एक रमणीक गुफा देखी ॥ ७३ ॥ बस, राम वहाँ रहकर धोमार्क चार महीने बिताने लगे। एक दिन लक्ष्मण स्नान करके जब आये तो रामको मनोहरायसी सीताके युक्त देखा। लक्ष्मणने उन्हें प्रणाम किया तैसे ही सीता अपने पति रामके वामाङ्गमें विलीन हो गई ॥ ७४-७५ ॥ इस तरह उस समय भी रामसे सीताका वियोग नहीं हुआ था। उधर सुग्रीव अपना पुरमें उत्तम रीतिसे राज्य करने लगा, ॥७६॥ एक बार हनुमान्के कहनेपर सुग्रीवने वानरोंको बुलवाया। उस समय राम-लक्ष्मण प्रवर्षणगिरिपर रहते थे। ॥७७॥ तथा रामने शरदऋतुको प्राप्त देखा तो क्रोधसे लक्ष्मणको सुग्रीवके पास मदयाताका स्मरण दिलाने लिये भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर किष्किन्धाके वानरोंको डराना आरम्भ किया। लक्ष्मणका आय सुनकर सुग्रीव भी भयसे विह्वल हो उठा ॥ ७८ ॥ ७९ ॥ उसने लक्ष्मणको शान्त करनेके लिय हनुमान्‌को भेजा। उन्होन जाकर लक्ष्मणको समझाया और अपने साथ किष्किन्धामें ले आये ॥ ८० ॥ उसी समय वानर सुग्रीवने ताराको भेजा वह जाकर महलके आगेवाले दालानमें बैठ गयीं। इतनेम उसने लक्ष्मणको आत देखा ॥ ८१ ॥ ताराने अपने मधुर वचनोंसे लक्ष्मणको समझाकर शांत करते हुए कहा-हे देवरजी ! वानरोंके राजा सुग्रीवने रामके कामके लिये वानरोंको बुलवा भेजा है। आप कोप न करें। इतना कह तथा लक्ष्मणका हाथ पकड़कर भरम राजा सुग्रीवके पास ले गयी ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ उन्हें देख राजा सुग्रीव सिहासनसे उठकर खड़े हो गये। तब लक्ष्मणने सुग्रीवते कहा कि तुम रघुकुलमें उत्तम