भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

सर्गः ८ ] मारकाण्डेयम् ७७


ईदृशमत्यन्तपरुषं वदन्तं लक्ष्मणं तदा । उवाच हनुमान् वीरः कथमेवं प्रभाषसे ॥८६॥
रामकार्यार्थमनिशं जागर्ति न तु विस्मृतः । इत्युक्त्वा तं पूजयित्वा सुग्रीवेण स मारुतिः ॥८७॥
चकार लक्ष्मणं शांतं सुग्रीवोऽथ ययौ वानरैः । गत्वा स राघवं नत्वा दर्शयामास वानरान् ॥८८॥
राघव न तदा प्राह सुग्रीवं प्लवगाधिपः । देव पश्य समायान्तीं वानराणां महाचमूम् ॥८९॥
अत्र यूथाधिपतयः पञ्चानन्दप्रख्याः स्मृताः । ततो ऽऽज्ञाप्य सीताशुद्ध्यर्थन्तन् दिदेश सः ॥९०॥
दिक्षु सर्वासु विविधान् वानरान् प्रेष्य सत्वरम् । ययौँ दिश जाम्बवन्तंङ्गदं वायुनन्दनम् ॥९१॥
नल सुषेण शरभ मैंदं सम्प्रेषयत्तदा । मासादूर्द्धाद्विनिवर्त्तध्व नाचेद्दण्ड्या भविष्यथ ॥९२॥
ततो रामो मुद्रिकां स्वां ददौ मारुतिसत्करे । मन्नामाक्षरयुक्तेयं सीतायै दीयतां रहः ॥९३॥
ततो रामो निज मन्त्रं ददौ तस्मै हनूमते । तन्मन्त्रस्य लक्षमिते कृत्वा तु जपलेखने ॥९४॥
लब्ध्वासामर्थ्यमतुलं लङ्कां गन्तुं स मर्कटः । नत्वा रामं परिक्रम्य जगाम कपिभिः सह ॥९५॥
वदन्तं राघवः प्राहः चित्रकूटे पुरा कृतम् । मनःशिलायास्तिलकं सीताभाले विनिर्मितम् ॥९६॥
पद्धयोः पद्मवन्त्यादि सीतायै कथयन् रहः । ततस्ते प्रार्थना मन्वे पश्चिमादपु दिक्षु च ॥९७॥
कपयस्ते समायान्ता न दृष्टा सेति ते ब्रुवन् । तथाङ्गदाद्याः प्लवगाः सीतार्थं वभ्रमुर्वने ॥९८॥
अन्विष्य वणथेष्विति राक्षसग्राम्छशोध्यन् । साश्रास्त्यास्तेवराच्छृङ्गैः गुहाद्वारान्निर्गतान् ॥९९॥
जलार्थं प्रप्रविष्टे स्ते गुहायां वानरोत्तमाः । तस्या जान्न गच्छन्तमूष्णों दिनान्यष्टादशैव हि ॥१००॥
तत्रिक्रान्तार्त्तन निस्तर वभ्रमन्तु इतस्ततः । तत्र रत्नमयं दिव्य गेहे दृष्ट्वा स्त्रयं शुभाम् ॥१०१॥


शायद भूल गये हो। =४ । जिस बाणसे तारा मारा गया था, उसी बाण सुग्रीव की प्रतिक्षा कर रहा
है आज मैं तुम्हें मारकर जल का बिम्ब बना दूंगा है जो तुम्हारा मद भंजन दूँगो । लक्ष्मण जब स प्रकार
अत्यन्त कठोर बचन कहन लगे तब हनुमानने कहा कि आप एम कठोर बचन क्यों मुखसे निकाल रहे हैं ?
। ८५ ॥ रामके काजके लिये सुग्रीव रात दिन सचेत रहता है इतना कहकर मारुति रामने लक्ष्मणको पूजा
करवाया और उनका शान्त करवाया। पश्चात् स्वयं वानरोंको लेकर रामके निकट गया । जहाँ जा कर
सुग्रीवने सिरझुकाकर रघुनाथजीके आगे कहा- हे दैव देखिए, वानरगणकी भारी सेना आ रहा है
। ८६ । इसमें अठारह पद्म सेनापति हैं। तदनन्तर राजाज्ञा अनुसार सीताकी खोज करनेके
लिये सब दिशाओमें बहुतसे वानरोंको उसी समय भेज दिया। उनमेंसे जाम्बवान्, अंगद, हनुमान्, नल
व सुषेण तथा मैंदको दक्षिण दिशामें भेजा और कह दिया कि एक मासके भीतर सीताकी सुधि लेकर लौट
आना, नहीं तो तुम सबको भण्ड किया जायगा । ६०-९२ । तब रामचन्द्रजीने हनुमान्‌के हाथमें
मुद्रिका दीया। जिसपर कि राम नाम अंकित अपनी नामके सीताको देना। ९३। बादमें अपना मंत्र
हनूमानको दिया। जिसके कि एक लाख मन्त्र जप तथा लिखकर हनुमान् अतुल सामर्थ्य प्राप्त
करेंगे। पश्चात् हनुमान्ने रामको प्रणाम किया और परिक्रमा करके कपियोंके साथ चल दिये ॥९४।६५ ॥
जाते समय रामने चित्रकूटमें किया हुआ एक चरित्र हनूमान्को बताते हुए कहा कि एक समय मैंने सीताके
कण्ठमें मैनाशिलाका तिलक तथा कागलोचन बकवन्ध्याका उपाय की था। उस बातको तुम सीतासे
एकान्तमें कहना। जिससे कि उनका तुम्हारे विश्वास हो जाय। इसके बाद वानर विभिन्न दिशाओ के
गए दिये । ९६-९७॥ कुछ कालके बाद बहुतसे वानरोने आकर सुग्रीवसे कहा कि हमको सीता
नहीं दिखाई दी, उधर अङ्गदके साथपर भी सीताकी खोजमें ढूंढते वानर इधर-उधर भ्रमण कररहे थे । ९८
उन्होंने शांति खोजनेके बहुतसे पक्षी देखे ॥ ६८ । ९६ । यह देखकर प्यासमें पीडित वानरोंमें उत्तम वे वानर
जलकी अभिलाषासे उस गुफामें घुसे, उसमें जाते जाते उन्हें अठारह दिन बित गये । १०० । वे उस
अन्धकारमें इधर उधर भटकने लगे अचानक वही उन्हे रत्नमय दिव्य दो भवन तथा उनमें एक सुन्दरी स्त्री दिखायी